झारखंड की बिजली यात्रा: 26 सालों में चार गुना बढ़ी खपत, उत्पादन बढ़ा; आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ता राज्य
झारखंड ने 26 वर्षों में बिजली क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है, जहाँ खपत चार गुना बढ़कर 26,300 GWH हो ...और पढ़ें

बिजली की खपत चार गुना बढ़ गई, सालाना खपत वृद्धि में भी आगे।
HighLights
26 वर्षों में बिजली की खपत चार गुना बढ़ी।
राज्य अब बिजली उत्पादन में आत्मनिर्भरता की ओर।
ग्रामीण क्षेत्रों में 18-20 घंटे बिजली आपूर्ति सुनिश्चित।
अश्विनी रघुवंशी, रांची। झारखंड की यात्रा 26 साल हो चुकी है। 15 नवंबर 2000 को अलग प्रदेश बना था तो सुदूर गांवों तक बिजली नहीं थी। शहरों में भी कब बिजली आएगी और कब गुल हो जाएगी? कोई ठिकाना नहीं। राज्य बना तो स्थिति सुधरी। पिछले दस सालों में बिजली व्यवस्था में व्यापक बदलाव हुआ। अब झारखंड में बिजली का उत्पादन और वितरण व्यवस्थित हुआ है।
आधारभूत संरचना भी सबल हुई है। सिर्फ बकाया के लेन देन का मसला ऐसा है जो सुगम और समयबद्ध नहीं हो सका है। यह होगा तो झारखंड की बिजली वाकई बमबम हो जाएगी। अभी झारखंड में बिजली उपभोक्ताओं की संख्या 53.7 लाख है। बिहार से अलग होकर झारखंड बना था तो उत्पादन, वितरण से लेकर पूरी व्यवस्था में झोल था।
खूब बिजली चोरी होती थी। बिल की वसूली भी शहरों तक सीमित थी। राष्ट्रीय औसत में सबसे निचले पायदान पर थे। सरकारी आंकड़ों की माने तो 2002 में झारखंड में बिजली की कुल खपत मात्र 6,778 गीगा वाट प्रति घंटा (जीडब्ल्यूएच) थी। वर्ष 2023:24 में यह आंकड़ा चार गुना से अधिक बढ़ कर 26,300 जीडब्ल्यूएच हो चुका है।
जहां राष्ट्रीय स्तर पर प्रति व्यक्ति बिजली की औसत खपत लगभग 1,255-1,300 यूनिट (किलो वाट प्रति घंटा) के आसपास है, वहीं झारखंड में यह आंकड़ा 800 से 900 यूनिट के बीच बना हुआ है। झारखंड का औद्योगिक क्षेत्र जैसे जमशेदपुर, बोकारो और धनबाद भारी मात्रा में बिजली की खपत करता है, लेकिन पूरे प्रदेश के मामले में झारखंड अब भी राष्ट्रीय औसत से पीछे है।
इसका मुख्य कारण ग्रामीण और शहरी घरेलू उपयोग में भारी अंतर होना है। नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक 2004 से 2015 के बीच दिल्ली, पंजाब जैसे भारत के उच्च विद्युतीकृत राज्यों में बिजली खपत की सालाना वृद्धि दर 6 से 8 प्रतिशत थी, तो झारखंड जैसे कम विद्युतीकृत राज्य में बिजली की सालाना खपत की दर 11 से 16 प्रतिशत रही है।
बिजली की जितनी आवश्यकता है, वो अवश्य मिल जाएगी
नया झारखंड बना था तो झारखंड के हिस्से बिजली उत्पादन करने वाली अधिक इकाई नहीं आई थी। अभी झारखंड में स्थापित इकाइयों की कुल विद्युत उत्पादन क्षमता 3,877.85 मेगावाट तक पहुंच चुकी है। इनमें केंद्रीय ग्रिड से 2,472.26, निजी ग्रिड से 855.54 और राज्य के पूर्ण स्वामित्व के यंत्र से 550.05 मेगावाट बिजली उपलब्ध है।
अभी झारखंड में जितनी इकाई स्थापित है या सूबे की हिस्सेदारी है, उनमें 3,421.28 मेगावाट तापीय (थर्मल), 176.98 मेगावाट जल विद्युत और 279.59 मेगावाट नवीकरणीय ऊर्जा (सोलर आदि) से मिल रहे हैं। पतरातू सुपर थर्मल पावर प्रोजेक्ट की उत्पादन क्षमता 4,000 मेगावाट करने का लक्ष्य है। टीवीएनएल के विस्तार की परियोजना पर भी कदमताल शुरू हो चुका है।
निकट भविष्य में झारखंड बिजली उत्पादन के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर हो जाएगा। अभी झारखंड अपनी दैनिक औसत मांग 2500 मेगावाट का 70 प्रतिशत हिस्सा नेशनल ग्रिड और केंद्रीय समझौतों के जरिए पूरा करता है। संचरण की व्यवस्था भी मजबूत हुई है।
सभी विधानसभा क्षेत्रों में कम से कम पांच पावर सब स्टेशन बनेंगे
झारखंड बिजली वितरण निगम लिमिटेड ने हर विधानसभा क्षेत्र में कम से कम पांच नए पावर सब स्टेशन बनाने की महत्वाकांक्षी योजना पर काम शुरू किया है। कुछ साल लगेंगे। उसके बाद लो वोल्टेज की समस्या का बहुत हद तक समाधान हो जाएगा।
वैसे, अलग राज्य बनने के बाद पूरे झारखंड में सैकड़ों 132/33 केवी और 220/132 केवी के बड़े ग्रिड सब-स्टेशन तथा हजारों की संख्या में 33/11 केवी के वितरण सब-स्टेशन बनाए गए हैं। झारखंड ऊर्जा संचरण निगम लिमिटेड द्वारा केवल पिछले कुछ वर्षों के भीतर ही 11 से अधिक बड़े ग्रिड सब-स्टेशनों को चालू किया गया है।
इससे डीवीसी कमांड एरिया पर राज्य की निर्भरता कम हुई है। चतरा, लातेहार, बड़कागांव में बिजली पहुंचाने के लिए मेधा इंजीनियरिंग और वर्ल्ड बैंक समर्थित झारखंड पावर सिस्टम इम्प्रूवमेंट प्रोजेक्ट के तहत उच्च क्षमता वाली 220 केवी ट्रांसमिशन लाइनें बिछाई गई हैं।
कोई गांव ऐसा नहीं बचा है, जहां बिजली के तार नहीं गए हो
झारखंड बना था तो सिर्फ 45 प्रतिशत गांवों तक बिजली पहुंची थी। तब ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली केवल कुछ घंटों के लिए ही मिल जाय तो बड़ी बात होती थी। केंद्र सरकार की ''दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना और राज्य सरकार के प्रयासों से अब झारखंड में कोई ऐसा गांव नहीं बचा है जहां बिजली के तार नहीं पहुंचे हो। अब ग्रामीण क्षेत्रों में भी औसतन 18 से 20 घंटे तक विद्युतापूर्ति हो रही है।
घोटाले, लाइन लास जैसी चुनौती से उबरना होगा तभी स्थायित्व
झारखंड की बिजली व्यवस्था में कुछ ऐसे छेद भी है जिन्हें तेजी से भरना होगा। ऐसा नहीं हुआ तो बिजली आपूर्ति की व्यवस्था को लगातार बेहतर बनाए रखना आसान नहीं होगा। झारखंड बिजली वितरण निगम लिमिटेड का तकनीकी और वाणिज्यिक नुकसान लगभग 28.19 प्रतिशत है, जबकि राष्ट्रीय औसत करीब 15-20 प्रतिशत है।
इसके अलावा ऊर्जा विभाग में घोटाले को रोकना भी बड़ा काम है। वर्ष 2012-13 में सिकिदिरी हाइडल प्रोजेक्ट घोटाला सामने आया था। जेएसइबी अध्यक्ष एस एन वर्मा आरोपित हुए। सीबीआइ जांच हुई।
2024 से 26 के बीच झारखंड ऊर्जा उत्पादन निगम और बिजली विभाग के बैंक खातों से जालसाजी कर राशि की निकासी हुई। सीआइडी और प्रवर्तन निदेशालय ने धनशोधन का केस किया।
कोहिनूर पावर पर आरोप लगा कि 66 मेगावाट के बिजली संयंत्र के लिए बैंक से 290 करोड़ का कर्ज लेकर सही इस्तेमाल नहीं किया गया। प्रवर्तन निदेशालय जांच कर रहा है। घोटाले रुकने का पुख्ता प्रबंध हो तो बिजली व्यवस्था और बेहतर होती जाएगी।
न सिर्फ आत्मनिर्भर होंगे बल्कि दूसरे प्रदेशों को भी झारखंड देगा बिजली
अगर 2040 में झारखंड की बिजली व्यवस्था को देखना चाहे तो हम राष्ट्रीय स्तर पर शीर्ष पर दिखेंगे। बिजली के मामले में झारखंड तेजी से आत्मनिर्भर हो रहा है। निकट भविष्य में हम न आत्मनिर्भर होंगे अपितु दूसरे सूबों को भी बिजली देने की हालत में होंगे। उत्पादन बढ़ाने के लिए बहुत कुछ हुआ है। इसके बेहतर नतीजे दिखने लगे हैं। बिजली वितरण में भी सकारात्मक बदलाव हुआ है। निकट भविष्य में सभी विधानसभा क्षेत्रों में पांच सब स्टेशन बनाए जाने का लक्ष्य है। सभी शहरों में बिजली तार भूमिगत होंगे। सौर और जल ऊर्जा को और बढ़ावा दिया जाएगा।
-के श्रीनिवासन, सचिव, ऊर्जा विभाग
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