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    Jharkhand Sthaniya Niti: झारखंड में कब-कब हुआ जमीन सर्वे, 1932 खतियान के बारे में विशेषज्ञों की राय

    By Jagran NewsEdited By: M Ekhlaque
    Updated: Sat, 12 Nov 2022 06:44 PM (IST)

    Jharkhand Sthaniya Niti झारखंड में हेमंत सोरेन सरकार ने 1932 का खतियान लागू करने के लिए विधानसभा से विधेयक पास कर दिया है। इस पर कानून के विशेषज्ञों की अपनी-अपनी राय है। वहीं यह जान लेना भी जरूरी है कि झारखंड के किस जिले में कब-कब सर्वे हुआ था।

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    Jharkhand Sthaniya Niti: झारखंड के किस जिले कब हुआ जमीन सर्वे।

    रांची, राज्य ब्यूरो। Jharkhand Sthaniya Niti, झारखंड में जमीन का अंतिम सर्वे वर्ष 1932 में हुआ था। 1972 से 1982 के सर्वे को वर्ष 1982 में तत्कालीन बिहार सरकार ने रद कर दिया था। आजादी के बाद राज्य में अंतिम सर्वे सेटलमेंट सिर्फ सिंहभूम क्षेत्र में 1960 से 1964 के बीच हुआ था। अन्य क्षेत्रों में 1932 से पहले ही सर्वे सेटलमेंट हुआ था। आजादी के पहले पश्चिमी सिंहभूम में 1913 से 1919 तक के बीच पहला रिवीजन सर्वे हुआ था। इसके बाद रांची, खूंटी, सिमडेगा, गुमला और लोहरदगा में 1927 से 1935 के बीच रिवीजन सर्वे हुआ। पूर्वी सिंहभूम में 1934 से 1938, सरायकेला-खरसावां (तब पश्चिमी सिंहभूम) में 1958 से 1995 के बीच तथा हजारीबाग, चतरा, कोडरमा, गिरिडीह और रामगढ़ में वर्ष 1995 में पहला रिवीजन सर्व हुआ था। राज्य के छह जिले हजारीबाग, चतरा, कोडरमा, गिरिडीह, रामगढ़ और सरायकेला-खरसावां में दूसरा रिवीजन सर्वे अबतक नहीं हुआ है। वहीं, पूर्वी सिंहभूम और पश्चिमी सिंहभूम में 1958 से 1995 के बीच दूसरा रिवीजन सर्वे हुआ। रांची, खूंटी, सिमडेगा, गुमला और लोहरदगा में वर्ष 1975 में सेकेंड रिवीजन सर्वे हुआ था।

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    स्थानीय नीति पर कानून के जानकारों की अलग-अलग राय

    झारखंड विधानसभा ने 1932 खतियान 1932 Khatian Jharkhand आधारित स्थानीय नीति को पारित कर दिया गया है। इस मुद्दे पर कानूनविदों की अलग-अलग राय है। हाई कोर्ट के अधिवक्ता अभय कुमार मिश्रा ने कहा कि वर्ष 1932 खतियान आजादी से पहले का निर्धारण है। ऐसे में आजादी के बाद बने पाकिस्तान और बांग्लादेश गए निवासी भी झारखंड के स्थानीय माने जा सकते हैं, क्योंकि बंटवारे के बाद यहां के लोग भी पलायन किए हैं। उन्होंने रांची गैजेटियर हवाला देते हुए कहा गया है कि वर्ष 1893 में यहां के लोगों के दो तिहाई आबादी को असम के चाय बागानों में काम कराने के लिए ले जाया गया था। उन्हें असम का स्थानीय निवासी होने के साथ-साथ अब वे भी 1932 के खतियान के आधार पर यहां के स्थानीय माने जाएंगे। ऐसा करना संवैधानिक रूप से गलत है। उन्होंने नौवीं अनुसूची में इसे रखने से संबंधित सवाल पर कहा कि यह पूरी तरह से केंद्र सरकार पर निर्भर करता है। क्योंकि यह कानून राज्य के लिए बना है। जबकि नौवीं अनुसूची में रखने के लिए संविधान में संशोधन जरूरी है।

    स्थानीय नीति लागू करने की बजाय केंद्र को भेजना सिर्फ राजनीति

    पूर्व महाधिवक्ता अजीत कुमार का कहना है कि हाई कोर्ट के आदेशानुसार स्थानीय नीति बनाना राज्य सरकार का अधिकार है। कानून बनाने के दौरान उसे लागू करने की तिथि भी बताई जाती है, लेकिन सरकार ने सिर्फ राजनीति के लिए ऐसा किया है और इस नीति को केंद्र के पाले में डाल दिया है। जबकि राज्य सरकार चाहती, तो इसे लागू करने के बाद भी नौ अनुसूची में शामिल करने के लिए केंद्र को प्रस्ताव भेज सकती थी। वर्ष 2007 में पारित आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि सिर्फ और सिर्फ नौवीं अनुसूची में किसी कानून को शामिल करने देने से उसकी समीक्षा नहीं किया जा सकता है, ऐसा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट किसी भी कानून की समीक्षा कर सकती है। स्थानीय नीति को लागू नहीं करने से राज्य को लोगों को कोई फायदा नहीं होने वाला है। राज्य सरकार इस नीति को केंद्र के पाले डालकर राजनीतिक रूप से लाभ उठाने का प्रयास कर रही है।

    2002 में पांच जजों की पीठ ने कर दिया था निरस्त

    झारखंड हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस वीके गुप्ता की अध्यक्षता वाली पांच जजों की पीठ ने स्थानीय नीति को अगस्त 2002 में असंवैधानिक बताते हुए निरस्त कर दिया था। अदालत ने कहा था कि स्थानीय नीति के तहत राज्य में तृतीय या चतुर्थ वर्ग के पदों पर बाहरी व्यक्तियों को नियुक्ति से नहीं रोक सकते हैं। सरकार इसमें स्थानीय लोगों को भाषा और रीति रिवाज के आधार पर प्राथमिकता दे सकती है। अदालत ने स्थानीय निवासी की परिभाषा को संविधान की धारा 14 और 16 का उल्लंघन बताया था। हालांकि अदालत ने अपने आदेश में सरकार को इसकी छूट प्रदान की है कि सरकार चाहे तो फिर से स्थानीय निवासी को परिभाषित कर सकती है, लेकिन उसे पूर्व से रहने वाले लोगों, जो यहां की भाषा, रीति रिवाज और रहन-सहन में बस गए हैं, भले ही वह बाहरी हों, उन्हें शामिल कर सकती है।

    वर्ष 2002 में झारखंड हाई कोर्ट ने कही थी यह बात

    राज्य में 1932 के खतियान के आधार पर स्थानीय निवासी तय करने और 50 फीसदी से अधिक आरक्षण दिए जाने के झारखंड सरकार के निर्णय को हाई कोर्ट ने वर्ष 2002 में ही असंवैधानिक करार दिया है। संवैधानिक पीठ ने कहा था कि सरकार की यह नीति आम लोगों के हित में नहीं है। इस नीति से वैसे लोग स्थानीय होने के दायरे से बाहर हो जाएंगे जिन्हें देश के विभाजन के बाद रांची में बसाया गया था। ऐसे लोग लंबे समय से झारखंड में रह रहे हैं और उन्हें स्थानीय के दायरे से बाहर किया जाना उनके साथ भेदभाव पूर्ण होगा। अदालत ने अपने आदेश में कहा था कि राज्य के हर इलाके में सर्वे भी नहीं हुए हैं। ऐसे में किसी एक सर्वे को ही आधार माना जाना उचित नहीं है और यह दूसरे लोगों के साथ भेदभावपूर्ण होगा।