JSSC CGL विवाद: 'क्या सिर्फ आंदोलन के दबाव में रद की परीक्षा?', हेमंत सरकार के फैसले पर HC की टिप्पणी
झारखंड हाई कोर्ट में जेएसएससी-सीजीएल सहित अन्य नियुक्ति परीक्षाओं को रद करने के राज्य सरकार के आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई जारी है।

'क्या सिर्फ आंदोलन के दबाव में रद की परीक्षा?', हेमंत सरकार के फैसले पर HC की टिप्पणी
HighLights
हाई कोर्ट में जेएसएससी-सीजीएल परीक्षा रद्द करने पर सुनवाई जारी।
अदालत ने सरकार के फैसले को आंदोलन प्रेरित बताया।
सरकार ने परीक्षा में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं का हवाला दिया।
राज्य ब्यूरो, रांची। झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस दीपक रोशन की अदालत में जेएसएससी-सीजीएल सहित अन्य नियुक्ति परीक्षाओं को रद करने के राज्य सरकार के आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर मंगलवार को सुनवाई हुई।
सुनवाई के दौरान प्रार्थियों, हस्तक्षेपकर्ताओं और राज्य सरकार की ओर से विस्तृत बहस की गई। राज्य सरकार ने अदालत में मामले की जांच से संबंधित सीलबंद रिपोर्ट भी पेश की।
रिपोर्ट दाखिल होने के बाद अदालत ने मामले की सुनवाई गुरुवार को भी जारी रखने की बात कही। अदालत ने मौखिक कहा कि सरकार के जवाब को देखकर प्रतीत होता है कि आंदोलन के दबाव में परीक्षा रद करने का निर्णय लिया गया है।
राज्य सरकार की ओर से वरीय अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा और महाधिवक्ता रोहिताश्य राय ने सीजीएल परीक्षा रद करने के निर्णय को उचित ठहराया। उन्होंने अदालत को बताया कि परीक्षा में बड़े पैमाने पर अनियमितता और वित्तीय लेन-देन के तथ्य सामने आए हैं।
जांच में इसकी पुष्टि हो रही है। मामले में अब तक 28 से अधिक लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है और जांच आगे बढ़ने के साथ गिरफ्तारियों की संख्या बढ़ सकती है। सरकार की ओर से कहा गया कि अनुसंधान अभी जारी है। ऐसी स्थिति में दोषी और निर्दोष अभ्यर्थियों को अलग-अलग करना संभव नहीं है।
अदालत ने कहा कि जांच पर सुनवाई नहीं हो रही है, बल्कि एक आदेश से 2700 की नौकरी समाप्त कर दिया गया है। यह गंभीर मामला है और अदालत सिर्फ सरकार के आदेश की वैधता की जांच करना चाह रही है।
प्रार्थियों ने कहा- प्रश्नपत्र लीक का कोई प्रमाण नहीं
प्रार्थियों की ओर से वरीय अधिवक्ता राजीव रंजन ने कहा कि सीजीएल परीक्षा में प्रश्नपत्र लीक होने का कोई मामला सामने नहीं आया है। किसी भी परीक्षा केंद्र से प्रश्नपत्र लीक होने का प्रमाण नहीं मिला है। उन्होंने इसे संभावित प्रश्नों को पहले से उपलब्ध कराए जाने का मामला बताया।
उन्होंने कहा कि नेपाल में 28 अभ्यर्थियों को संभावित प्रश्नों को रटाया गया था। इनमें से 10 अभ्यर्थी परीक्षा में सफल हुए। इन 10 अभ्यर्थियों का रिजल्ट जारी नहीं करने का आदेश हाई कोर्ट ने दिया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी सही ठहराया है। ऐसे में पूरी परीक्षा रद करना उचित नहीं है।
प्रार्थियों ने अदालत को बताया कि हाई कोर्ट के पूर्व आदेश के अनुसार एसआईटी की जांच के अंतिम नतीजे के आधार पर अभ्यर्थियों की नियुक्ति प्रभावित हो सकती है। ऐसे में सरकार द्वारा पूरी पूरी सीजीएल परीक्षा रद करना उचित नहीं है।
उन्होंने कहा कि एसआईटी की जांच दो साल से अधिक समय से चल रही है, लेकिन अभी तक आरोप पत्र दाखिल नहीं हुआ है। जांच एजेंसी को अभी यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि कौन अभ्यर्थी दोषी है और कौन निर्दोष। ऐसे में पूरी परीक्षा को एक साथ रद करने का औचित्य नहीं बनता।
पहले के आदेशों का हवाला, कहा- नियुक्ति रद करना अवमानना
प्रार्थियों की ओर से वरीय अधिवक्ता गोपाल शंकर नारायण, अधिवक्ता इंद्रजीत सिन्हा और अधिवक्ता अमृतांश वत्स ने भी पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि सीजीएल से संबंधित मामला हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में पहले ही निष्पादित हो चुका है।
अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि दोषी और निर्दोष अभ्यर्थियों के बीच अंतर किया जाए तथा नियुक्ति का मामला आपराधिक अभियोजन के परिणाम पर निर्भर रहेगा।
इसके बाद भी सरकार ने दोबारा पूरे नियुक्ति प्रक्रिया को रद कर दिया। यह पूर्व में दिए गए न्यायिक आदेशों की अवहेलना है। सुप्रीम कोर्ट भी इस संबंध में दिशा-निर्देश दे चुका है। प्रार्थियों ने आरोप लगाया कि सरकार ने आंदोलन कर रहे छात्रों को संतुष्ट करने के लिए सीजीएल सहित अन्य परीक्षाओं को रद करने का निर्णय लिया है।
जांच के आधार पर परीक्षाएं रद
सीआईडी जांच में सामने आए तथ्यों के आधार पर राज्य सरकार ने 18 अगस्त की देर रात उन सभी परीक्षाओं को रद करने की घोषणा की थी, जिनमें टीडीपीएल की भूमिका सामने आई थी। इसके साथ ही वर्ष 2014 से आयोजित नियुक्ति परीक्षाओं में संभावित अनियमितताओं की जांच कराने की भी घोषणा की गई थी।
