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    जयंती पर याद किए गए भाऊराव देवरस, झारखंड-बिहार व उप्र में आरएसएस का कार्य बढ़ाने में रही महत्वपूर्ण भूमिका

    By Sujeet Kumar SumanEdited By:
    Updated: Fri, 20 Nov 2020 07:20 AM (IST)

    RSS News एकल विद्यालय का एक स्कूल एक शिक्षक का अभियान उन्हीं की प्रेरणा से शुरू की गई जो आज देश के एक लाख से अधिक गांवों में चल रहा है। वनवासी कल्याण केंद्र की स्थापना उन्होंने ही करवाई।

    राष्ट्रीय स्वयंसेवक सघ के सह सरकार्यवाह रहे भाउराव देवरस।

    रांची, [संजय कुमार]। राष्ट्रीय स्वयंसेवक सघ (आरएसएस) के सह सरकार्यवाह रहे भाउराव देवरस की आज जयंती है। उन्‍हें संघ से जुड़ लोग याद कर रहे हैं और उनकी उपलब्धियों को साझा कर रहे हैं। देवरस का उत्तर प्रदेश, बिहार व वर्तमान के झारखंड के इलाकों में संघ का कार्य बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। वनवासियों के बीच काम करने के लिए वनवासी कल्याण केंद्र की स्थापना उन्होंने ही करवाई। एकल विद्यालय का एक स्कूल, एक शिक्षक का अभियान उन्हीं की प्रेरणा से शुरू की गई जो आज देश के एक लाख से अधिक गांवों में चल रहा है।

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    राष्ट्रीय सेवा भारती के पदाधिकारी व आरएसएस के वरिष्ठ प्रचारक गुरुशरण प्रसाद अपना संस्मरण सुनाते हुए कहते हैं कि जब मैं पलामू का जिला प्रचारक था तब लातेहार के गारू में वे प्रवास पर आए थे। बैठक में आसपास के लोग आए थे। ग्रामीणों ने उनकी बात सुनने के बाद कहा कि हमलोग जंगलों में रहते हैं। शेर-भालू आदि जानवरों से डर नहीं लगता है। डरता हूं तो केवल मलेरिया व डायरिया से। इसलिए दवाइयों की व्यवस्था करवा दीजिए। केवल मेरे बच्चों के लिए शिक्षा की व्यवस्था करवा दीजिए। उसके बाद ही वनवासी कल्याण केंद्र व एकल अभियान की स्थापना की गई।

    बड़े भाई संघ के तीसरे सरसंघचालक थे

    उप्र में यूं तो संघ की शाखा सर्वप्रथम काशी में भैयाजी दाणी द्वारा प्रारंभ की गई थी, पर संघ के काम को हर जिले तक फैलाने का श्रेय मुरलीधर दत्तात्रेय (भाऊराव) देवरस को है। उनका जन्म 19 नवंबर, 1917 (देवोत्थान एकादशी) को नागपुर के इतवारी मोहल्ले के निवासी एक सरकारी कर्मचारी दत्तात्रेय देवरस के घर में हुआ था। वे पांच भाई थे तथा उनसे दो वर्ष बड़े मधुकर दत्तात्रेय (बालासाहब) देवरस भी संघ के प्रचारक बनकर अनेक दायित्व निभाते हुए संघ के तीसरे सरसंघचालक बने।

    उन दोनों भाइयों की जोड़ी बाल-भाऊ के नाम से प्रसिद्ध थी। संघ की स्थापना होने पर पहले बाल और फिर 1927-28 में भाऊ भी शाखा जाने लगे। डा. हेडगेवार के घर में खूब आना-जाना होने से दोनों संघ और उसके विचारों से एकरूप हो गए। 1937 में भाऊराव ने स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की। अब डा. हेडगेवार ने उन्हें उप्र जाने के लिए कहा। अतः भाऊराव ने लखनऊ विवि में बीकाम तथा एलएलबी में प्रवेश ले लिया। उन दिनों वहां दो वर्ष में डबल पोस्ट डिग्री पाठ्यक्रम की सुविधा थी। भाऊराव ने दोनों विषयों में स्वर्ण पदक प्राप्त किए। लखनऊ में वे संघ के साथ स्वाधीनता आंदोलन में भी सक्रिय रहे। उनके प्रयास से वहां सुभाष चंद्र बोस का एक भव्य कार्यक्रम हुआ।

    घर की स्थिति बहुत सामान्य थी

    भाऊराव के घर की स्थिति बहुत सामान्य थी। वे अपनी शिक्षा के बल पर आसानी से कहीं भी डिग्री काॅलेज में प्राध्यापक बन सकते थे, पर उन्हें तो उप्र में संघ का काम खड़ा करना था। अतः वे यहीं डट गए। एमएससी के छात्र बापूराव मोघे भी उनके साथ थे। घर वालों ने पैसे भेजना बंद कर दिया था। अतः ट्यूशन पढ़ाकर तथा एक समय भोजन कर वे दोनों शाखा विस्तार में लगे रहे।

    भाउराव ने गुब्बारे बेचकर अपना खर्च चलाने का प्रयास किया

    उन दिनों नागपुर में मार्तंडराव जोग का गुब्बारे बनाने का कारखाना था। भाऊराव ने लखनऊ में गुब्बारे बेचकर कुछ धन का प्रबंध करने का प्रयास किया, पर यह योजना सफल नहीं हुई। 1941 में उन्होंने काशी को अपना केंद्र बना लिया। क्योंकि वहां काशी हिंदू विवि में पढ़ने के लिए देश भर से छात्र आते थे। वहां दत्तराज कालिया की हवेली में उन्होंने अपना ठिकाना बनाया। यद्यपि उनका पूरा दिन छात्रावासों में ही बीतता था। उन छात्रों के बल पर क्रमशः उप्र के कई जिलों में शाखाएं खुल गईं। दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी, रज्जू भैया जैसे श्रेष्ठ छात्र उन दिनों उनके संपर्क में आए, जो फिर संघ और अन्य अनेक कामों में शीर्षस्थ स्थानों पर पहुंचे।

    विद्या भारती की शुरुआत उन्हीं की प्रेरणा से हुई

    उप्र में संघ का कार्य करते हुए भाऊराव का ध्यान और भी कई दिशाओं में रहता था। इसी के परिणामस्वरूप 1947 में लखनऊ में ‘राष्ट्रधर्म प्रकाशन’ की स्थापना हुई। इसके माध्यम से राष्ट्रधर्म मासिक, पांचजन्य साप्ताहिक तथा तरुण भारत जैसे दैनिक पत्र प्रारंभ हुए। आज ‘विद्या भारती’ के तहत देश भर में लगभग 24 हजार से अधिक सरस्वती विद्या मंदिर चल रहे हैं। उसे आगे बढ़ाने में इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। झारखंड बिहार के क्षेत्र सचिव मुकेश नंदन का कहना है कि इन विद्यालयों में 34 लाख से अधिक बच्चे पढ़ रहे हैं। 1.75 लाख शिक्षक हैं। वे  वर्षों तक विद्या भारती के संरक्षक थे।

    सह सरकार्यवाह रहते हुए पूरे देश में प्रवास किया

    उप्र में संघ कार्य को दृढ़ करने के बाद भाऊराव क्रमशः बिहार, बंगाल और पूर्वोत्तर भारत के क्षेत्र प्रचारक तथा फिर सह सरकार्यवाह बनाए गए। इन दायित्वों पर रहते हुए उन्होंने पूरे देश में प्रवास किया। फिर उनका केंद्र दिल्ली हो गया। यहां रहते हुए वे विद्या भारती तथा भारतीय जनता पार्टी के कामों की देखरेख करते रहे। व्यक्ति पहचानने की अद्भुत क्षमता के कारण उन्होंने जिस कार्यकर्ता को जिस काम में लगाया, वह उस क्षेत्र में यशस्वी सिद्ध हुआ। धीरे-धीरे उनका शरीर थकने लगा। फिर भी उनकी मानसिक जागरूकता बनी रही। 13 मई, 1992 को दिल्ली में ही उनका देहांत हुआ।