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मैक्लुस्कीगंज के हेसालौंग में 22 अक्टूबर को सजेगा 'भूत मेला', ऐतिहासिक पारंपरिक मेले की तैयारियां जोरों पर

Published: Fri, 16 Oct 2026 11:17 AM (GMT+05:30)

मैक्लुस्कीगंज के हेसालौंग गांव में 22 अक्टूबर को ऐतिहासिक 'भूत मेला' का आयोजन किया जाएगा। यह मेला क्षेत्र की गहरी धार्मिक आस्था, लोक-परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है।

मैक्लुस्कीगंज में 22 अक्टूबर को सजेगी भूत मेला की भव्य रौनक। (तस्वीर: एआई जेनरेटेड)

मैक्लुस्कीगंज में 22 अक्टूबर को सजेगी भूत मेला की भव्य रौनक। (तस्वीर: एआई जेनरेटेड)

HighLights

  1. मैक्लुस्कीगंज में 22 अक्टूबर को होगा ऐतिहासिक भूत मेला।

  2. हेसालौंग गांव में लोक-परंपरा और आस्था का प्रतीक।

  3. व्यापार और सामाजिक मेल-मिलाप का बड़ा केंद्र।

डिजिटल डेस्क, मैक्लुस्कीगंज/रांची। झारखंड के मिनी लंदन कहे जाने वाले मैक्लुस्कीगंज क्षेत्र के इतिहास और लोक-परंपरा में विशेष स्थान रखने वाला ऐतिहासिक “भूत मेला” इस बार 22 अक्टूबर को पूरी भव्यता के साथ आयोजित किया जाएगा।

मेले की तिथि को लेकर बना असमंजस अब पूरी तरह दूर हो चुका है, जिसके बाद ग्रामीणों और मेला समिति ने आपसी विचार-विमर्श के बाद सर्वसम्मति से इस तारीख पर मुहर लगा दी है। आयोजन की तैयारियों को लेकर स्थानीय स्तर पर सरगर्मी काफी तेज हो गई है।

क्या है इस मेले की खासियत?

मैक्लुस्कीगंज थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले हेसालौंग गांव में यह मेला हर साल दशहरा के ठीक बाद (एकादशी तिथि के आसपास) पारंपरिक रूप से आयोजित किया जाता है। हालांकि इसे स्थानीय और लोक-भाषा में भूत मेला (जतरा) के नाम से जाना-बुलाया जाता है, लेकिन यह मुख्य रूप से क्षेत्र की गहरी धार्मिक आस्था, लोक-परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का एक अनूठा प्रतीक है।

वर्षों से चली आ रही इस परंपरा का गवाह बनने के लिए न सिर्फ हेसालौंग और खलारी कोयलांचल, बल्कि दूर-दराज के इलाकों और अन्य जिलों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु, पर्यटक और ग्रामीण पहुंचते हैं।

व्यापार और सामाजिक मेल-मिलाप का बड़ा केंद्र

यह मेला सिर्फ आस्था का केंद्र नहीं है, बल्कि यह स्थानीय आर्थिकी और सामाजिक सौहार्द का भी एक बड़ा माध्यम है। मेले में खिलौने, मिठाइयां, श्रृंगार सामग्री, दैनिक उपयोग की वस्तुएं और पारंपरिक खान-पान की दर्जनों दुकानें सजती हैं, जिससे स्थानीय कारोबारियों और व्यापारियों को अच्छा व्यापारिक अवसर मिलता है। 

खलारी और मैक्लुस्कीगंज के इस पारंपरिक आयोजन में आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों का मिलना-जुलना होता है, जो आपसी भाईचारे और सांस्कृतिक ताने-बाने को मजबूत करता है।

मेक्लुस्कीगंज क्यों प्रसिद्ध है?

  • एंग्लो-इंडियन कम्युनिटी का 'प्रॉमिस्ड लैंड': 1930 के दशक में ब्रिटिश काल के दौरान, कलकत्ता (अब कोलकाता) के एक व्यवसायी एर्न्स्ट टिमोथी मेक्लुस्की ने रातु के महाराजा से यहां लगभग 10,000 एकड़ जमीन पट्टे पर ली थी। उनका उद्देश्य एंग्लो-इंडियन समुदाय के लोगों के लिए एक अलग और स्वतंत्र आवास बसाना था।
  • मिनी लंदन या 'लिटिल इंग्लैंड': एक समय पर यहाँ सैकड़ों एंग्लो-इंडियन परिवार आकर बसे। यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता, घने जंगल, नदियां और विशेष कॉलोनियल (अंग्रेजी) शैली के बड़े-बड़े बंगले इस जगह को 'मिनी इंग्लैंड' या 'द गंज' के रूप में पहचान दिलाते थे। 
  • ऐतिहासिक और कॉलोनियल बंगले: यहां बने ब्रिटिश वास्तुकला वाले पुराने और आलीशान कॉटेज आज भी सैलानियों को आकर्षित करते हैं। हालांकि, समय के साथ आजीविका और शिक्षा के अवसरों की कमी के कारण अधिकांश एंग्लो-इंडियन परिवार यहाँ से विदेश या देश के दूसरे हिस्सों में चले गए। 
  • फिल्मों की शूटिंग: बॉलीवुड और बंगाली सिनेमा में इस जगह को लेकर काफी क्रेज रहा है। मशहूर निर्देशक कोंकणा सेन शर्मा की समीक्षकों द्वारा सराही गई फिल्म 'ए डेथ इन द गंज' की शूटिंग यहीं के पुराने बंगलों में हुई थी।

जोर-शोर से चल रही हैं तैयारियां

मेले को ऐतिहासिक, भव्य और पूरी तरह व्यवस्थित बनाने के लिए ग्रामीण और मेला समिति के सदस्य दिन-रात जुटे हुए हैं। समिति ने क्षेत्र के सभी नागरिकों, प्रबुद्ध जनों और आसपास के गांवों के लोगों से अपील की है कि वे अधिक से अधिक संख्या में पहुंचकर इस पारंपरिक और सांस्कृतिक आयोजन को सफल बनाएं।

हेसालौंग गांव में आयोजन को सफल बनाने में कुलदीप साहू, अनिल प्रसाद साहू, मनोज प्रसाद साहू, शिवदेव प्रसाद साहू, पंकज प्रसाद साहू, महेश प्रसाद साहू, संजय प्रसाद साहू, राजू प्रसाद साहू, सूरज प्रसाद साहू, विवेक साहू समेत क्षेत्र के कई गणमान्य ग्रामीण सक्रिय रूप से अपनी भूमिका निभा रहे हैं।

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