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    क्‍या पार्टी में नेताओं की आवाजाही देती है मजबूती की गारंटी? चुनाव के समय इसलिए पाला बदलते हैं अधिकतर नेता

    Updated: Mon, 22 Apr 2024 12:29 PM (IST)

    Lok Sabha Election 2024 चुनाव से पहले नेताओं की पार्टी से आवाजाही मजबूती की कोई गारंटी नहीं देती है। जबकि हकीकत तो यह है कि अधिकतर नेताओं की आवाजाही टिकट को लेकर हो रही है। कई बार चुनाव में हार मिलने पर नेताओं का उस पार्टी से कोई नाता नहीं रहता है और ये दूसरी पार्टी की सदस्‍यता ग्रहण कर लेते हैं।

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    मजबूती की गारंटी नहीं नेताओं की आवाजाही- जागरण।

    नीरज अम्बष्ठ, रांची। Lok Sabha Election 2024: चुनावी बयार में नेताओं की ‘आवाजाही’ से यह मत समझ लीजिए कि दूसरे दलों के नेताओं के आने से कोई पार्टी मजबूत हो रही है। या किसी पार्टी से किसी नेता के दूसरी पार्टी में चले जाने से पहली वाली पार्टी कमजोर हो रही है। हकीकत तो यह है कि वर्तमान में अधिसंख्य नेताओं की आवाजाही टिकट को लेकर हो रही है।

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    चुनाव के बाद पार्टी में रहने की नेताओं की नहीं कोई गारंटी

    चुनाव के बाद नई पार्टी से उनकी निष्ठा रह पाएगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है। नेता उस पार्टी में बने रहेंगे, इसका भी दावा नहीं किया जा सकता। टिकट के इंतजार में कोई नेता सुबह में अपनी पार्टी के दफ्तर में बैठा है तो शाम में वह दूसरी पार्टी के दफ्तर में पाया जाता है।

    कई बार तो नेता सीधे सदस्यता ग्रहण कर टिकट लेकर लौटते हैं। चुनाव में हार हुई तो फिर उस पार्टी से उनका कोई नाता नहीं रहता। यदि उसी पार्टी में बने भी रहे हैं तो उनकी सक्रियता पार्टी में नहीं रहती।

    हार के बाद पार्टी से नहीं रहता कोई नाता

    झारखंड में ददई दूबे, प्रदीप बलमुचू, राधाकृष्ण किशोर, नागमणि, नियेल तिर्की, ताला मरांडी आदि कई नेताओं के उदाहरण भरे पड़े हैं। कांग्रेस नेता चंद्रशेखर दूबे उर्फ ददई दूबे वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में टिकट नहीं मिलने पर अपनी पार्टी से नाता तोड़कर तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए थे।

    हार के बाद इस पार्टी से उनका कोई संपर्क नहीं रहा। बाद में कांग्रेस में उनकी वापसी हुई। वर्ष 2019 के विधानसभा चुनाव में ये कांग्रेस के टिकट पर विश्रामपुर से चुनाव भी लड़े, लेकिन उन्हें जीत नहीं मिल सकी।

    वर्ष 2014 के ही लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के नियेल तिर्की ने भी टिकट नहीं मिलने पर आजसू के टिकट पर चुनाव लड़ा था। हार के बाद उनका भी आजसू से कोई नाता नहीं रहा।

    हार के बाद दूसरी पार्टियों में होते हैं शामिल

    वर्ष 2019 के विधानसभा चुनाव में टिकट नहीं मिलने पर राधाकृष्ण किशोर भाजपा छोड़ आजसू में चले गए थे। उन्होंने स्वयं कहा था कि वे फूल (कमल) छोड़कर अब फल (केला) में आ गए हैं। चुनाव में जीत तो नहीं मिली, लेकिन चुनाव के बाद आजसू से उनका कोई नाता भी नहीं रहा। वर्तमान में वे राजद में हैं।

    महागठबंधन के तहत घाटशिला सीट झामुमो के कोटे में चले जाने के कारण टिकट से वंचित कांग्रेस के प्रदीप बलमुचू भी आनन-फानन में आजसू में शामिल हो गए। उन्हें टिकट भी मिला। हार के बाद ये कभी भी आजसू में सक्रिय नहीं रहे। बाद में कांग्रेस में वापसी कर गए।

    भाजपा से टिकट नहीं मिलने पर ताला मरांडी भी आजसू में शामिल हो गए थे। हार के बाद इनकी भी भाजपा में वापसी हो गई। अकील अख्तर जैसे नेता अभी भी आजसू में मजबूती से बने हुए हैं।

    वर्ष 2019 के विधानसभा चुनाव में महागठबंधन में सीट कांग्रेस के कोटे में चले जाने के कारण ये आजसू में शामिल हुए थे। कभी आजसू में रहे प्रवीण प्रभाकर ने नेशनल पीपुल्स पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा था। हार के बाद ये भाजपा में शामिल हो गए।

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