Unique History: पाकिस्तान से रांची आए शरणार्थियों ने 1948 में विजयदशमी पर शुरू की रावण दहन की परंपरा
India Pakistan Partition पाकिस्तान से रांची आए शरणार्थी आर्थिक के साथ सांस्कृतिक विकास की भी अहम कड़ी साबित हुए। वर्ष 1948 में रावण दहन की जो परंपरा शुरू की आज भव्य रूप ले चुकी है। 65 फीट ऊंचे रावण के पुतले का दहन देखने बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं।

रांची, {आरपीएन मिश्र}। Independence Day India देश विभाजन के वक्त घर-बार, व्यापार और अपने पीछे पूरी दुनिया छोड़ आए शरणार्थियों ने मेहनत और संकल्प के दम पर नया संसार बसाया। बहुत कुछ पीछे छूट गया, लेकिन जहां भी रहे आस्था और परंपरा की डोर थामे रहे। यही वजह है कि वह जगह-जगह सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने के भी सारथी बने। रांची में रावण दहन की परंपरा शुरू करने का श्रेय शरणार्थियों को ही जाता है। पाकिस्तान के कबायली इलाकों नार्थ फ्रंटियर औऱ बन्नू से आए शरणार्थियों ने रांची में 1948 में दशहरा मनाया तो यहां के लोगों ने पहली बार रावण दहन का आयोजन देखा। इसके बाद इस परंपरा का लगातार विस्तार होता गया।
पहले गधे जैसा होता था रावण का मुखौटा
बन्नुवाल रिफ्यूजियों (शरणार्थियों) के मुखिया स्व. लाला खिलंदा राम भाटिया ने इसकी शुरुआत की थी। स्व.लाला मनोहर लाल नागपाल,स्व. कृष्ण लाल नागपाल,स्व.अमिर चंद सतीजा, स्व.टहल राम मिनोचा, शादीराम भाटिया और स्व.किशन लाल शर्मा ने अपने हाथों से 12 फीट ऊंचा रावण का पुतला बनाया था। पंजाबी और कबायली ढोल-नगाड़े के बीच लगभग 400 लोग इस आयोजन के गवाह बने थे। उसके बाद से आज तक यह परंपरा जारी है और लगातार भव्य होती जा रही है। रावण के पुतले की ऊंचाई भी साल-दर साल बढ़ती गई। रांची सहित पंजाब के तमाम शहरों में तब रावण का मुखौटा गघे का होता था। 1953 के बाद रावण के पुतले का मुखौटा मानव मुख जैसा बनने लगा। इस बीच आयोजनस्थल में भी कई बार बदलाव हुए। पुतला निर्माण का खर्च स्व. मनोहर लाल,स्व. टेहल राम मिनोचा तथा स्व. अमीर चंद सतीजा वहन करते थे। लाला खलिदा राम भाटिया के निधनकेबाद स्व. अशोक नागपाल आगे आए। 10-12 वर्षों तक अशोक नागपाल खुद अपने हाथों से रावण के पुतले का निर्माण किया करते थे। 1960 से पंजाबी-ङ्क्षहदू बिरादरी ने इसके आयोजन की जिम्मेदारी संभाली।
अब भव्य रूप ले चुका है आयोजन
रांची में रावण दहन का आयोजन अब भव्य रूप ले चुका है। रांची के मोरहाबादी मैदान में पंजाबी-हिंदू बिरादरी की ओर से इसका आयोजन किया जाता है। कार्यक्रम में 60-65 फीट ऊंचे रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले जलाए जाते हैं। रावण दहन के साथ ही पंजाब की आधा दर्जन से अधिक नृत्य मंडलियों की आकर्षक प्रस्तुति और सुंदर व शानदार आतिशबाजी देखने यहां दूर-दूर से लोग आते हैं। मुख्यमंत्री इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि होते हैं। राम के रूप में वही तीर चलाकर रावण का वध करते हैं।
कारोबार में भी बड़ा नाम
शरणार्थियों के मन में कुछ बड़ा करने का जज्बा था। उन्हें अपनी मेहनत पर पूरा भरोसा था। यही वजह है कि वह रांची आने के बाद भी असहाय बनकर नहीं रहे, बल्कि अपना कारोबार खड़ा किया और जल्दी ही धन व प्रतिष्ठा हासिल कर समाज में नाम कमाया। होटल कैपिटल हिल, पंजाब स्वीट हाउस, कावेरी रेस्टोरेंट आदि प्रतिष्ठानों के संचालक भाटिया परिवार ने जहां होटल-रोस्टोरेंट व्यवसाय में अपनी धमक स्थापित की, वहीं कपड़ा, ट्रांसपोर्ट, आटो पाट््र्स समेत अन्य व्यवसाय में भी शरणार्थियों ने अपना दबदबा बनाया। रांची में कपड़े की प्रसिद्ध दुकान फिरायालाल का संचालक मुंजाल परिवार भी 1947 में शरणार्थी बनकर रांची आया था। अशोक नागपाल के परिवार का ट्रांसपोर्ट का व्यवसाय है। उनके पुत्र संदीप नागपाल इसका संचालन करते हैं।
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