कभी गुलजार था कोकर का औद्योगिक क्षेत्र
रांची : एचईसी की स्थापना के बाद कोकर इंडस्ट्रियल इस्टेट की स्थापना की गई थी। इनमें कई छोटी-बड़ी कंपनि
रांची : एचईसी की स्थापना के बाद कोकर इंडस्ट्रियल इस्टेट की स्थापना की गई थी। इनमें कई छोटी-बड़ी कंपनियां खुलीं। यहां सबसे बड़ी कंपनी ब्रिटिश की मिनीमैक्स और डकबैक कंपनी थी। डकबैक को बिहार रबर कंपनी के नाम से जानते हैं। मिनीमैक्स फायर बिग्रेड और फायर एक्सटिंग्यूसर बनाया करती थी। भारत की यह प्रमुख कंपनी थी, लेकिन यह कंपनी यहां दो साल ही चली। ट्रेड यूनियन के चलते कंपनी को अपना बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ा। उस कंपनी में करीब एक हजार लोग काम करते थे। सिर्फ एक कंपनी में इतने लोग कार्यरत थे। इसके बाद भी यहां लगातार तरह-तरह के उद्योग स्थापित होते रहे। इनमें रबर, रेनकोट, प्रिंटिंग प्रेस, फैंसी कागज व बोर्ड, मेडिसिन व आयुर्वेद दवाएं, फूड प्रोडक्ट, पैक रसगुल्ला व मिष्ठान्न, ब्रेड, लकड़ी के खिलौने व फर्नीचर, प्लास्टिक कंघी और अन्य सामान, बिजली बल्ब, मोटर बाइंडिंग, प्लास्टिक रबर होस पाइप, चमड़ा जूता, गारमेंट्स, कालीन, इलेक्ट्रिक एवं इलेक्ट्रानिक सामान, सीमेंट ह्यूम पाइप, मोम, चूना पाउडर, चूर पत्थर, मिट्टी की प्रतिमाएं, लोहा का बेलचा-फावड़ा, रेल का चक्का, गाड़ी की स्प्रिंग पत्ती, बस-ट्रक बॉडी बिल्डिंग, रेडिएटर, गाड़ी बैट्री, लोहे के टेबल-चेयर, आलमारी, ग्रिल आदि के कारखाने थे।
यहां के पुराने प्रिंटिंग प्रेस के मालिक ध्रुव मित्र ने बताते हैं कि 80 के दशक के मध्य तक इन सभी कारखानों में दिन-रात उत्पादन होता था। हजारों कर्मचारी-अधिकारी यहां कार्यरत थे। चहल-पहल और खुशहाली थी। इस अवधि के बाद तत्कालीन बिहार सरकार की उदासीनता, इंस्पेक्टर राज, भ्रष्टाचार, कमीशनखोरी, लालफीताशाही, उद्यमियों को परेशान करने की नीति और कार्यादेश के अभाव के कारण 90 दशक के अंत तक अधिकतर कारखानों में ताले लटक गए। झारखंड राज्य के गठन के बाद यहां केवल कुछ ही कारखाने अपने बल पर चलते रहे और ये आज भी चल रहे हैं।
अब राज्य बन गया है। सरकार भी यहां विकास को लेकर संजीदा है। औद्योगिक विकास के लिए बड़े उद्योगों के साथ-साथ कुटीर व लघु उद्योग और विशेष रूप से चालू उद्योगों पर भी ध्यान केंद्रित करना पड़ेगा। कुटीर व लघु उद्योग के क्षेत्र में अपार संभावनाएं हैं। छोटे उद्योगों में उत्पादन तुरंत प्रारंभ होता है। अप्रत्यक्ष रूप से भी रोजगार का सृजन होता है।
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कोट-
कोकर औद्योगिक क्षेत्र में अभी 140 कंपनियां कार्यरत हैं, लेकिन इनमें सर्विस सेंटर ज्यादा हैं। पहले मैन्युफैक्च¨रग का काम होता था तो लोगों को रोजगार मिलता था, लेकिन रोजगारपरक कंपनियां बंद होती चली गईं। बिहार रबर भी अब केवल नाम का बचा है। यह अब गाड़ियों का यार्ड बन गया है।
लाल बाबू सिंह, उपाध्यक्ष, कोकर औद्योगिक क्षेत्र इंडस्ट्रीज एसोसिएशन
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