प्रदीप सिंह, रांची : जनगणना में झारखंड के आदिवासियों को अलग से धर्म कोड नहीं दिया जा सकता। उन्हें अभी तक निर्धारित छह धर्म कोड में से ही किसी एक को चुनना होगा। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्य के विविध आदिवासी व सामाजिक संगठनों की उस मांग को ठुकरा दिया है जिसमें आदिवासियों के लिए इससे इतर धर्म कोड की मांग की गई है। रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया ने इससे इन्कार करते हुए कहा है कि फिलहाल पृथक धर्म कोड, कॉलम या श्रेणी बनाना व्यावहारिक नहीं होगा। आदिवासी सरना महासभा को प्रेषित पत्र में रजिस्ट्रार जेनरल ऑफ इंडिया, नई दिल्ली के सहायक निदेशक सी टोप्पो ने आशंका व्यक्त की है कि अगर छह धर्म के कॉलम के अतिरिक्त नया कॉलम या धर्म कोड आवंटित किया गया तो बड़ी संख्या में पूरे देश में ऐसी और मांगें उठेंगी। हालांकि इस मसले पर यह आश्वासन दिया गया है कि 2021 में होने वाली जनगणना के पहले यह मामला रजिस्ट्रार जेनरल ऑफ इंडिया की तकनीकी सलाहकार समिति के समक्ष रखा जाएगा। यह भी स्पष्ट किया गया है कि धर्म कोड का आवंटन कई अन्य विशेषताएं स्थापित करने की अपेक्षा सुविधाजनक गणना के प्रयोजन में अधिक होता है। सुविधा की दृष्टि से छह बड़े धर्मो के कोड अनुसूची में दर्शाए गए हैं। पृथक कोड आवंटित किए गए धर्म को कोई लाभ अथवा विशेष सुविधा प्राप्त नहीं होती है।

आगे क्या

अब 'आदिवासी' धर्म कोड की होगी कवायद

सरना धर्म कोड को मान्यता देने से इन्कार के बाद नए सिरे से आदिवासी संगठन, बुद्धिजीवी और विविध राजनीतिक दल एकजुट होंगे। पूर्व विधायक सह आदिवासी सरना महासभा के संयोजक देव कुमार धान समेत बिरेंद्र भगत, शिवा कच्छप आदि ने रणनीति बनाने की तैयारी शुरू कर दी है। पूर्व विधायक देव कुमार धान ने 'जागरण' के साथ बातचीत में बताया कि तकनीकी दृष्टिकोण से सरना को मान्यता देने से इन्कार करने के बाद अब आदिवासी धर्म कोड की मांग तेज की जाएगी। इसमें देशभर में फैले हुए तमाम जनजातीय आदिवासी समुदाय की भागीदारी होगी। इस सिलसिले में आगामी तीन-चार दिसंबर को नई दिल्ली में देशभर के तमाम जनजातीय समुदायों के प्रतिनिधियों का महाजुटान होगा। यह कार्यक्रम महात्मा गांधी पीस फाउंडेशन में होगा। चार मार्च, 2017 को आदिवासी धर्म कोड की मांग को लेकर देशभर के आदिवासी संसद का घेराव करेंगे।

मान्यता मिलने तक हर साल दिल्ली में होगा जुटान

तय हुआ कि हरेक वर्ष मार्च माह के पहले सप्ताह में तब तक दिल्ली में देशभर के आदिवासियों की रैली होगी जबतक आदिवासी धर्म कोड को मान्यता नहीं मिल जाती। देशभर के अलग-अलग हिस्सों में बसे जनजातीय समुदाय की जनसंख्या 12 करोड़ से ज्यादा है। अगर सभी एक साथ मिलकर आदिवासी धर्म कोड के लिए दबाव बनाएंगे तो बेहतर परिणाम आएगा।

जनगणना में पूरे देश में 40,75,246 लोगों ने अपना धर्म सरना दर्ज कराया। सर्वाधिक झारखंड में 34,50,523, ओड़िशा में 3,53,520, पश्चिम बंगाल में 2,24,704, बिहार में 43,342, छत्तीसगढ़ में 2450 और मध्य प्रदेश में 50 लोगों ने खुद को सरना धर्म का बताया।

झारखंड से राजस्थान, अंडमान से अरुणाचल तक फैले हैं ये आदिवासी

संताल, मुंडा, उरांव, बिरहोर, मीणा, भील, गोंड, बैगा, अबोर, आदी, अनगामी, एओ, अपातानी, बडागास, भोटिया, भूटिया, बोड़ो, चेनचुस, चूटिया, डांग, गड्डीस, गारोस, ग्रेट अंडमानी, इरूलस, जैनटिएस, जरावास, कचारिस, कानिस, कार्बी, खंपी, खासी, खोंड, कोल, कोटस, कुकी, लेपचास, लुसिएस, मैतिएस, मिसिंग, ओंगस, रबहास, रेंगमा, रोंगपा, सेमा, सेनटीनिलिस, सोमपेनस, तगिन, तोदास, यूरेलिस, जिलिंग आदि।