'खतरनाक बागियों' के शहीद स्थल पर उपेक्षा की गर्द
तरुण बागी रामगढ़ देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में छोटानागपुर के अग्रणी योद्धा व अंग्रेजों क

तरुण बागी, रामगढ़ : देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में छोटानागपुर के अग्रणी योद्धा व अंग्रेजों के लिए 'खतरनाक बागी' रहे टिकैत उमराव सिंह और शेख भिखारी को आठ जनवरी 1858 को चुटूपालू घाटी मेंबरगद के पेड़ पर फांसी दे दी गई थी। आज भी वह बरगद का विशालकाय पेड़ (फांसी बड़) सलामत है। लेकिन उपेक्षा के कारण इस ऐतिहासिक फांसी बड़ का अस्तित्व अब खतरे में है।
करीब पांच साल पहले तक चुटूपालू घाटी के मनोरम वादियों से होकर गुजरने के दौरान सड़क किनारे इस शहीद स्थल फांसी बड़ पर सबकी नजरें पड़ती थी। लेकिन घाटी को फोरलेन बन जाने के बाद अब फांसी बड़ पर किसी की नजर नहीं पड़ती। हर साल आठ जनवरी को झारखंड के मंत्री, सांसद, विधायक, नेता आदि यहां शहादत दिवस मनाने आते हैं और इसे पर्यटक स्थल के रूप में विकसित करने का घोषणा कर चले जाते हैं। 2013 में भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय द्वारा शहीद टिकैत उमरांव सिंह व शहीद शेख भिखारी शहीद स्थल को मेगा टूरिस्ट सर्किट के अंतर्गत विकसित करने के लिए योजना भी स्वीकृति हुई। इसका शिलान्यास भी सात सितंबर 2013 में पूर्व केंद्रीय पर्यटन मंत्री व रांची के तत्कालीन सांसद सुबोध कांत सहाय ने किया लेकिन आज तक यह योजना आकार नहीं ले सकी।
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कौन थे टिकैत उमराव सिंह व शेख भिखारी
जंग-ए-आजादी 1857 की क्रांति के महानायक अमर शहीद टिकैत उमरांव सिंह व शेख भिखारी ओरमांझी प्रखंड के रहने वाले थे। टिकैत उमरांव बंदगांव राजपरिवार से संबंधित थे और खटंगा सहित बारह गांवों के जमिंदार थे। वहीं शेख भिखारी छोटानागपुर के राजा ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव के दरबार में दीवान थे। दोनों युद्ध कौशल में माहिर थे। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के समय अंग्रेज छोटानागपुर पर चढ़ाई करने चल पड़े। ठाकुर विश्वनाथ ने टिकेत उमरांव और खोख भिखारी को उन्हें रोकने चुटूपालू घाट में मोर्चा संभालने को कहा। यहां पहाड़ी पर मैकडोनाल्ड की सेना से उनका मुकाबला हुआ। अंत में गोला-बारूद की कमी होने पर वे अंग्रेजों के हाथ लग गए। कहा जाता है कि उनकी तलवार में इतनी ताकत थी कि अंग्रेज कमिश्नर मैकडोनाल्ड ने इसका गजट में जिक्र किया था और उन्होंने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में खतरनाक बागी करार दिया गया था। अंग्रेजों से लड़ाई करते हुए इन दोनों को 6 जनवरी 1858 को घेरकर गिरफ्तार कर लिया गया था। सात जनवरी 1858 को चुटूपालू घाटी के घनघोर जंगल के बीच विशालकाय बरगद पेड़ के नीचे फौजी अदालत लगाकर उनकी वीरता च साहस से भयभीत अंग्रेजों ने अदालती कार्रवाई पूरे किए बिना दोनों वीरों को फांसी का फैसला सुनाया। उसके बाद आठ जनवरी 1858 को आजादी के दीवाने टिकैत उमराव सिंह व शेख भिखारी को इसी बरगद के पेड़ से लटका कर फांसी दे दी गई।
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