खालसा का सृजन दिवस बैसाखी धूमधाम के साथ मना
ककसंवाद सहयोगीरामगढ़ श्री गुरुद्वारा साहिब में रविवार को साध-संगत ने खालसा का 320वां सृजन दिवस बड़े ही श्रद्धा भक्ति एवं उत्साह के साथ मनाया। इस दौरान अलवर वाले डॉ. हरबन सिंह ने बैसाखी के इतिहास एवं गुरुवाणी की व्याख्या बड़े ही सरल शब्दों में कर संगत को निहाल किया। इधर इतिहास की जानकारी देते हुए महासचिव जगजीत सिंह सोनी ने बताया कि श्री गुरु गोविद सिंह जी ने 1675 में पिता गुरु तेगबहादुर की शहादत के बाद एक सोची समझी योजना के तहत अपने शिष्यों को लगागतार 24 वर्षां तक युद्ध कला की हर विद्या जिसमें तलवार बाजी घुड़सवारी आत्मरक्षा जैसे अनेक विद्याओं में परांगत कर एक अनोखी खालसा फौज को धरती पर अवतृत किया। जिसकी विशेषता थी कि यह जाति पाति एवं क्ष्ज्ञेत्रवाद से उपर था। इनके नामों में भी एक संदेश है। भाई दया सिंह भाई धरम सिंह भाई मोहकम सिंह भाई हिम्मत सिंह एवं भाई साहिब सिंह। अर्थात खालसे में दया धर्म मोह कम हिम्मत के गुणों से ही यह साहिब बनता है। इस अवस
रामगढ़ : श्री गुरुद्वारा साहिब में रविवार को साध-संगत ने खालसा का 320वां सृजन दिवस बड़े ही श्रद्धा, भक्ति एवं उत्साह के साथ मनाया। इस दौरान अलवर वाले डॉ. हरबन सिंह ने बैसाखी के इतिहास एवं गुरुवाणी की व्याख्या बड़े ही सरल शब्दों में कर संगत को निहाल किया। इधर इतिहास की जानकारी देते हुए महासचिव जगजीत सिंह सोनी ने बताया कि श्री गुरु गोविद सिंह जी ने 1675 में पिता गुरु तेगबहादुर की शहादत के बाद एक सोची समझी योजना के तहत अपने शिष्यों को लगागतार 24 वर्षां तक युद्ध कला की हर विद्या जिसमें तलवार बाजी, घुड़सवारी, आत्मरक्षा जैसे अनेक विद्याओं में परांगत कर एक अनोखी खालसा फौज को धरती पर अवतृत किया। जिसकी विशेषता थी कि यह जाति, पाति एवं क्ष्ज्ञेत्रवाद से उपर था। इनके नामों में भी एक संदेश है। भाई दया सिंह, भाई धरम सिंह, भाई मोहकम सिंह, भाई हिम्मत सिंह एवं भाई साहिब सिंह। अर्थात खालसे में दया, धर्म, मोह, कम, हिम्मत के गुणों से ही यह साहिब बनता है। इस अवसर पर विशेष तौर पर बरनाला वाले जत्थे भाई जसविदर सिंह जी ने मनमोहक कीर्तन हर सच्चे तख्त, रचाया सति संगत मेला..वाहो, वाहो गोविद सिंह आप गुरु चेला.., अमृत नाम निधान है, मिल पिओ भाई.., वैसाख भला साखा वस करे..आदि बोल से संगत को निहाल कर रहे थे। रात के दिवान में उक्त जत्थों के अलावा विशेष ढाढी जत्थे भाई मुक्तसर वाले भाई सुरेंद्र सिंह जी ने अपने अनोखे अंदान मेंमें वीर रस के शब्दों का गायन कर संगत में अनोखा समां बांध दिया। हजूरी रागी भाई तीरथ सिंह जी, बाबा गुजीत सिंह, ज्ञानी निरंजन सिंह जी एवं स्त्री संगत संग बीबीओ ने भी गुरुवाणी गायन एवं इतिहास का वर्णन किया।
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जलिया वाले बाग की खूनी बैसाखी के शताब्दी वर्ष को याद किया आजादी की लड़ाई में अपने आप को होम कर देने वाले भारत माता के वीर सपूतों के लिए अरदास की गई। जलियावाला बाग की खूनी बैसाखी के शताब्दी वर्ष में संगत ने उनकी शहादत को शतशत नमन कर उनकी महान कुर्बानी को याद किया।
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ये लोग थे मौजूद
प्रधान रमिदर सिंह गांधी, महासचिव जगजीत सिंह सोनी, डॉ. नरेंद्र सिंह, प्रीतम सिंह कालरा, रघुवीर सिंह छाबड़ा, जगदीप सिंह छाबड़ा, सुरेंद्र सिंह होरा, इंद्रपाल सिंह सैनी, तेजिदर सिंह सोनी, गुरविदर सिंह कालरा, मनपाल सिंह, बिट्टू सिंह चंडोक, गुरप्रीत सिंह सलूजा, गुरजीत सिंह सलूजा, पप्पू जस्सल, बलविदर सिंह पवार, परमदीप सिंह कालरा, मंजीत सिंह गांधी, इंद्रजीत सिंह कालरा, नरेंद्र सिंह गांधी, लवली गांधी, नरेश सैनी, डॉ. मनवीर कौर, रमन गांधी, विक्की लांबा, पम्मी गांधी, पिकी सलूला, गुरविदर कौर कालरा, महेंद्र कौर अरोड़ा, जसप्रीत कौर जॉली, नीलम अरोड़ा, रंजू अरोड़ा, जसमीत कौर सोनी, विमला मेहरा, पम्मी कालरा, ट्विकल छाबड़ा आदि मौजूद थे।
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