जमशेदपुर, जासं। ओलिंपिक का जलवा एक बार फिर खेलप्रेमियों के सिर चढ़कर बोल रहा है। अब सिर्फ यही चर्चा होती है कि कौन खिलाड़ी इसमें जा रहा है। किसने कौन सा पदक जीता, आदि। लेकिन आपको इसका इतिहास भी जानना चाहिए कि भारत ने कबसे और कैसे ओलिंपिक में भाग लेना शुरू किया। सचमुच इसकी कहानी रोचक है।

एथलीटों के प्रदर्शन से प्रभावित हो ओलिंपिक में टीम भेजने को सोचा

बात 1919 की है, जब पुणे में डेक्कन जिमखाना की एक स्पोर्ट्स मीट हुई थी। टाटा समूह के पूर्व चेयरमैन दोराबजी टाटा एथलीटों के प्रदर्शन से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अगले साल एंटवर्प खेलों के लिए अपने खर्च पर खिलाड़ियों को भेजने की घोषणा कर दी। उन्होंने ऐसा किया भी। एक नई किताब "टाटा स्टोरीज : 40 टाइमलेस टेल्स टू इंस्पायर यू" में इस बात की चर्चा है कि भारत ने अपनी ओलंपिक यात्रा कैसे शुरू की।

पहली बार किसान एथलीटों को भेजा ओलिंपिक में

पुस्तक के लेखक हरीश भट्ट के अनुसार टाटा समूह के दूसरे चेयरमैन दोराबजी टाटा डेक्कन जिमखाना के वार्षिक खेल समारोह में मुख्य अतिथि थे। उन्होंने देखा कि अधिकांश एथलीट यूरोपीय मानकों के करीब थे।

यहां तक ​​​​कि जब उन्होंने पुणे में इन किसान एथलीटों को देखा, तो वह एक भारतीय टीम को ओलंपिक में भाग लेते देखने की इच्छा से भर गए। उनके आग्रह पर, मुंबई के गवर्नर सर लॉयड जॉर्ज ने इसकी मंजूरी दे दी। उस समय एक आधिकारिक भारतीय ओलंपिक निकाय मौजूद नहीं था, टाटा समूह के संस्थापक जमशेदजी टाटा के बड़े बेटे दोराबजी ने भारत की आजादी से 27 साल पहले एंटवर्प ओलंपिक-1920 के लिए पहली भारतीय टीम को पहली बार भेजा। छह सदस्यीय टीम में सभी पुरुष थे। इनमें चार एथलीट पीएफ चौगुले, ए दत्तार, के कैकडी और पुरमा बनर्जी के अलावा दो पहलवान जी नवाले और एन शिंदे शामिल थे।पहली भारतीय टीम ने ओलंपिक में कोई पदक नहीं जीता, लेकिन इसने खेलों में गर्व और मजबूती से देश का झंडा फहराया। इसके बाद उन्होंने वाइएमसीए के भौतिक निदेशक डॉ ए. नोहेर्न को देश के हर हिस्से का दौरा करने और खेल और एथलेटिक्स का प्रचार करने के लिए भेजा।

चार साल बाद फिर खिलाड़ियों को भेजा

चार साल बाद दोराबजी ने एक बार फिर 1924 के पेरिस ओलंपिक में भारतीय टीम को भेजा। तब तक देश में ओलंपिक भावना ने जोर पकड़ लिया था। राष्ट्रीय टीम का खर्च दोराबजी के अलावा अन्य राज्यों ने भी उठाया। इस बार सात खिलाड़ी थे। एंटवर्प के सात साल बाद 1927 में भारतीय ओलंपिक संघ का गठन हुआ, जिसके पहले अध्यक्ष दोराबजी और सचिव नोहेर्न बनाए गए। इन दोनों 1928 के एम्स्टर्डम ओलिंपिक के लिए भारतीय खिलाड़ियों का चयन किया, जिसमें भारतीय हॉकी महासंघ द्वारा चैंपियन देश की पहली ओलिंपिक स्वर्ण पदक विजेता पुरुष हॉकी टीम शामिल थी।

भारत सरकार ने पहली बार 1948 में उठाया खर्च

पुस्तक भारत की स्वतंत्रता के ठीक बाद 1947 के एक प्रकरण को साझा करती है, जब दोराबजी के भतीजे नवल टाटा, आइएचएफ के तत्कालीन अध्यक्ष ने भारत के पहले प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू को 1948 के लंदन ओलंपिक खेलों में हॉकी टीम की भागीदारी के लिए धन देने के लिए राजी किया।

वर्तमान टाटा संस के मानद चेयरमैन रतन टाटा के पिता, नवल टाटा 1948 के ओलिंपिक में नव स्वतंत्र भारत की हॉकी टीम भेजने के इच्छुक थे, लेकिन उन्हें धन जुटाने में मुश्किल हो रही थी। गवर्नर जनरल और पूर्व वायसराय लॉर्ड लुइस माउंटबेटन ने सुझाव दिया कि नवल को इस मामले को नेहरू के सामने उठाना चाहिए। नेहरू ने नवल से पूछा, क्या होगा अगर हमने अपनी टीम को इसमें नहीं भेजा। नवल ने सहमति व्यक्त की कि टीम भेजना जरूरी नहीं था। लेकिन क्या यह भाग्य की विडंबना नहीं होगी कि हमारी राष्ट्रीय सरकार की शुरुआत में हम अपनी टीम को अपने विश्व खिताब की रक्षा के लिए नहीं भेजते हैं।

भारत 1932 व 1936 में हॉकी चैंपियन बना

किताब में कहा गया है कि नेहरू के रवैये में तेजी से बदलाव आया। उन्होंने टीम की भागीदारी के लिए उस समय एक लाख रुपये, जो उस समय अपेक्षाकृत बड़ी राशि थी, मंजूरी दे दी। उन्होंने एक स्पोर्ट्स मीट की भी सुविधा दी, जिससे बाकी आवश्यक धनराशि जुटाई जा सके। टीम ने निराश नहीं किया। भारतीय हॉकी टीम ने 1932 और 1936 में चैंपियन का खिताब जीता। 1948 में स्वतंत्र भारत ने लंदन ओलिंपिक में हॉकी में अपना पहला स्वर्ण पदक जीता और अगले दो ओलिंपिक में लगातार स्वर्ण पदक जीतकर सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए।

Edited By: Jitendra Singh