जमशेदपुर, जासं। प्रत्येक वर्ष मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन पूर्वजों को मुक्ति देने वाली श्री दत्तात्रेय या दत्त जयंती मनाई जाती है। यह उत्सव महाराष्ट्र के बाहर भी मनाया जाता है। आनंद के वातावरण में मनाए जाने वाले इस त्योहार में कुछ जगहों पर जन्मोत्सव मनाने की परंपरा है। कहीं-कहीं दत्त यज्ञ का आयोजन किया जाता है।

दत्त जयंती के अवसर पर कई भक्त गुरुचरित्र का पाठ करते हैं। यह दत्त जयंती के महत्व को रेखांकित करता है। इस वर्ष दत्त जयंती 18 दिसंबर को है।  हिंदू जनजागृति समिति के सदस्य सुदामा शर्मा बताते हैं कि दत्त जयंती के बारे में समिति ने विस्तार से बताने के लिए आलेख जारी किया है। इसमें कहा गया है कि संतों के कहे अनुसार नाम संकीर्तन साधना आसान है, इससे जन्म-जन्मांतर के पाप जल जाते हैं। नाम स्मरण के महत्व को ध्यान में रखते हुए ऐसा करने का प्रयास हो, ऐसे श्री दत्त गुरु के चरणों में प्रार्थना है। वर्तमान लेख में दत्त देवता का इतिहास और दत्त जयंती मनाने की पद्धति के बारे में जानकारी देने का प्रयास किया गया है।

मार्गशीर्ष पूर्णिमा में हुआ था दत्त का जन्म

मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन शाम को मृग नक्षत्र में दत्त का जन्म हुआ था, इसलिए उस दिन सभी दत्त क्षेत्रों में दत्त जयंती मनाई जाती है। दत्त जयंती के दिन दत्त तत्व सामान्य से 1000 गुना अधिक पृथ्वी पर कार्यरत रहता है। इस दिन दत्त का नाम जप आदि उपासना करने से दत्त तत्व का अधिकतम लाभ मिलता है। दत्त जयंती मनाने की कोई शास्त्रोक्त विशिष्ट विधि नहीं है। इस त्योहार से पहले सात दिनों तक गुरुचरित्र का पाठ करने की प्रथा है। इसे गुरुचरित्र सप्ताह कहा जाता है। भक्ति के प्रकार जैसे भजन, पूजन और विशेष रूप से कीर्तन आदि प्रचलन में हैं। महाराष्ट्र में जैसे औदुंबर, नरसोबा की वाडी, गाणगापुर आदि स्थानों पर इस पर्व का विशेष महत्व है। दत्त जयंती तमिलनाडु में भी मनाई जाती है। कुछ स्थानों पर इस दिन दत्त यज्ञ किया जाता है। दत्त यज्ञ में, पवमान पंचसूक्त संस्करण (जप) और उसके दशमांश या एक तिहाई घी और तिल से हवन करते हैं। दत्त यज्ञ के लिए किए जाने वाले जपों की संख्या निश्चित नहीं है। स्थानीय पुजारियों के आदेश के अनुसार जप और हवन किया जाता है।

पुराणों के अनुसार जन्म का इतिहास

अत्रि ऋषि की पत्नी अनुसूया एक पतिव्रता स्त्री थी। पतिव्रता होने कारण उनके पास बहुत ही सामर्थ्य था, जिसके कारण इन्द्रादि देव घबरा गए थे और ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास जाकर उन्होंने कहा की सती अनसूया के वरदान के कारण किसी को भी देवता का स्थान प्राप्त हो सकता है इसलिए आप कुछ उपाय करें अन्यथा हम उनकी सेवा करेंगे, यह सुनकर त्रिमूर्ति बोले कि वह कितनी बड़ी पतिव्रता और सती है वह हम देखेंगे। एक बार अत्रि ऋषि अनुष्ठान के लिए बाहर गए, तो त्रिमूर्ति एक अतिथि के रूप में आए और अनुसूया से भीख मांगने लगे। अनुसूया ने उत्तर दिया, "ऋषि अनुष्ठान के लिए बाहर गए हैं। उनके आने तक रुको।" तब त्रिदेव ने अनुसूया से कहा, "ऋषि को लौटने में समय लगेगा। हम बहुत भूखे हैं। हमें तुरंत भोजन दो, नहीं तो हम कहीं और चले जाएंगे। हमने सुना है कि आश्रम में आने वाले अतिथियों को आप इच्छानुसार भोजन देती हैं, इसलिए हम यहां इच्छित भोजन करने आए हैं। और वे भोजन करने बैठ गए। जैसे ही भोजन आया, उन्होंने कहा, "आपकी सुंदरता को देखते हुए, हम चाहते हैं कि आप हमें विवस्त्र होकर भोजन कराएं।" मेरा मन शुद्ध है, तो कामदेव की क्या बात है? ऐसा विचार करके उसने अतिथियों से कहा, "मैं विवस्त्र हो कर आप को भोजन कराऊंगी।" आप आनंद से खाना। ”फिर वह रसोई में गई और अपने पति का चिंतन करके प्रार्थना कर के सोचा, मेहमान मेरे बच्चे हैं और नग्न होकर भोजन परोसने आई। उन्होंने मेहमानों के स्थान पर तीन बच्चों को रोता हुआ देखा। वह उन्हें एक ओर ले गई और स्तनपान कराया। बच्चों ने रोना बंद कर दिया। अत्रि ऋषि आए। उसने उन्हें सारी कहानी सुनाई। उन्होंने कहा, "स्वामी देवेन दत्त।" इसका अर्थ है - "हे स्वामी, ईश्वर द्वारा दिए हुए बच्चे (बच्चे)।" इसलिए अत्रि जी ने बच्चों का दत्त नामकरण किया। बच्चे पालने में रहे और ब्रह्मा, विष्णु और महेश उनके सामने खड़े हो गए और प्रसन्न होकर वर मांगने के लिए कहा। अत्रि और अनुसूया ने, "बच्चे हमारे घर में रहने चाहिए, वर मांगा। बाद में ब्रह्मा से चंद्रमा, विष्णु से दत्त और शंकर से दुर्वासा हुए। तीनों में से, चंद्र और दुर्वासा तपस्या के लिए जाने की अनुमति लेकर क्रमशः चंद्रलोक की ओर तीर्थक्षेत्र गए। तीसरे, दत्त विष्णुकार्य के लिए पृथ्वी पर ही रहे।

भ्रमण करते थे दत्त भगवान

दत्त भगवान प्रतिदिन बहुत भ्रमण करते थे। वे स्नान करने वाराणसी जाते थे, चंदन लगाने के लिए प्रयाग जाते थे। प्रतिदिन भिक्षा कोल्हापुर, महाराष्ट्र में मांगते थे। दोपहर के भोजन पंचालेश्वर, महाराष्ट्र के बीड जिले के गोदावरी के पात्र में लेते थे। पान ग्रहण करने के लिए महाराष्ट्र के मराठवाड़ा जिले के राक्षसभुवन जाते हैं, जबकि प्रवचन और कीर्तन बिहार के नैमिषारण्य में सुनने जाते थे। निद्रा करने के लिए माहुरगड़ और योग गिरनार में करने जाते थे।

दत्त जयंती उत्सव को भावपूर्ण करने के प्रयास

महिलाएं साड़ी पहन सकती हैं और पुरुष सात्विक वस्त्र जैसे धोती, कुर्ता पहन सकते हैं। सात्विक वेशभूषा से भक्तों को अधिक लाभ हो सकता है। 'श्रीदत्तात्रेय कवच' का पठन करने के साथ-साथ दत्त नाम का जप विद्यार्थियों के लिए लाभकारी हो सकता है। उत्सव स्थल पर ऊंची आवाज में संगीत नहीं बजना चाहिए, रज तम निर्माण करने वाली बिजली की रोशनी ना करें। दत्त जयंती के जुलूस में ताल, मृदंग जैसे सात्विक वाद्य यंत्रों का प्रयोग करना चाहिए।

Edited By: Rakesh Ranjan