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    Jharkhand Politics: सूर्य सिंह बेसरा ने नए राज्यपाल रमेश बैस का किया स्वागत, संवैधानिक प्रावधानों पर आकृष्ट किया ध्यान, बताए लंबित मामले

    By Rakesh RanjanEdited By:
    Updated: Wed, 14 Jul 2021 01:23 PM (IST)

    आजसू के संस्थापक व झारखंड पीपुल्स पार्टी के प्रमुख अध्यक्ष पूर्व विधायक सूर्य सिंह बेसरा ने झारखंड के नए राज्यपाल रमेश बैस का स्वागत किया है। इसके साथ ही उन्होंने राज्यपाल को उन संवैधानिक मामलों की जानकारी दी है जो करीब 20 वर्ष से लंबित चल रहे हैं।

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    पूर्व विधायक सूर्य सिंह बेसरा व झारखंड के नए राज्यपाल रमेश बैस । फाइल फोटो

    जमशेदपुर, जासं। आजसू के संस्थापक व झारखंड पीपुल्स पार्टी के प्रमुख अध्यक्ष पूर्व विधायक सूर्य सिंह बेसरा ने झारखंड के नए राज्यपाल रमेश बैस का स्वागत किया है। इसके साथ ही उन्होंने राज्यपाल को उन संवैधानिक मामलों की जानकारी दी है, जो करीब 20 वर्ष से लंबित चल रहे हैं। बेसरा ने उन्हें बताया है कि ये मामले कौन-कौन से हैं और उन्हें किस तरह निष्पादित किया जा सकता है।

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    झारखंड गठन से लेकर अब तक के लंबित मामले

    •  भारत का संविधान अनुच्छेद-3(क) के तहत देश के 28वें राज्य के रूप में 15 नवंबर 2000 में यानी भगवान बिरसा मुंडा को आदर्श का प्रतीक मानकर उनकी जयंती के पुनीत अवसर पर झारखंड की स्थापना हुई थी।
    •  झारखंड आदिवासी बहुल राज्य है, जिसके अंतर्गत 24 जिले हैं। इनमें से 13 जिले संपूर्ण रूप से तथा 3 जिले का कुछ भाग संविधान की पांचवीं अनुसूची क्षेत्र अधिसूचित है, जहां अनुच्छेद- 244(1) का प्रावधान है।
    • झारखंड देश के उन 10 राज्यों में से एक है, जहां संविधान का पांचवीं अनुसूची क्षेत्र है। विडंबना यह है कि संसद द्वारा गठित "दिलीप सिंह भूरिया कमेटी" की अनुशंसा पर संविधान के 73वें संशोधन के बाद "पंचायत उपबंध-(अनुसूचित क्षेत्र पर विस्तार अधिनियम) 1996 अर्थात पेसा कानून-96 झारखंड में आज तक लागू नहीं हुआ, क्यों। 
    • संविधान की पांचवीं अनुसूची अनुच्छेद-244 (1) के तहत अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण के बारे में उपबंध है। तदनुसार राष्ट्रपति के निर्देश से जनजाति सलाहकार परिषद स्थापित की जाएगी, जो 20 से अधिक सदस्यों से मिलकर बनेगी। इसमें तीन चौथाई सदस्य आदिवासी प्रतिनिधि होंगे। जनजाति सलाहकार परिषद का यह कर्तव्य होगा कि वह उस राज्य की आदिवासियों के कल्याण और उन्नति संबंधित ऐसे विषयों पर सलाह दे, जो उनको राज्यपाल द्वारा निर्दिष्ट किए जाएं। परंतु वर्तमान राज्य सरकार ने संविधान में प्रावधानों के प्रतिकूल जनजाति सलाहकार परिषद का गठन कर लिया है, जो सरासर असंवैधानिक है। इसे रद करने की जरूरत है। 
    • झारखंड राज्य में झारखंडी बच्चे मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने से वंचित हैं। उन्हें मातृभाषा के प्रतिकूल हिंदी पढ़ने पर बाध्य किया जाता है, जबकि संविधान के अनुच्छेद- 350(क) में प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की पर्याप्त सुविधाओं की व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रपति का सभी राज्यों को निर्देश है।

     

  • झारखंड राज्य में 9 झारखंडी भाषा (संताली, मुंडारी, हो कुरुख, खड़िया, नागपुरी, कुरमाली, खोरठा व पंचपरगनिया) में रांची विश्वविद्यालय के अंतर्गत जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग द्वारा स्नातकोत्तर की पढ़ाई 1980 से संचालित है। 2012 में 9 झारखंडी भाषाओं के अतिरिक्त बांग्ला, उड़िया और उर्दू को संविधान के अनुच्छेद-343 ,346 व 347 में प्रावधानों के अनुसार तत्कालीन राज्य सरकार ने मान्यता प्रदान की है। इसके बावजूद आज तक राज्य सरकार की उदासीनता क्यों।
  • भारत सरकार ने 22 दिसंबर 2003 में संथाली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कर लिया है। इसके बावजूद झारखंड में आज तक 11 बार सरकार बनी, फिर भी संथाली भाषा को लागू करने में राज्य सरकारें विफल साबित हुई हैं। सराहनीय विषय तो यह है कि भाजपा के रघुवर दास के मुख्यमंत्रित्व काल में संथाली भाषा की लिपि ओल चिकी से राजभवन से लेकर पंचायत भवन तक और तो और स्कूलों कॉलेजों सहित सभी सरकारी कार्यालयों में लिखवा दिया गया है। विडंबना यह है कि वर्तमान सरकार में संथाल मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन सत्ता में आसीन हैं, फिर भी अपनी मातृभाषा के प्रति क्यों उदासीन हैं। 
  • भारत का संविधान अनुच्छेद-16(3) में प्रावधानों के तहत अनुच्छेद- 371(डी) में आंध्र प्रदेश के लिए विशेष प्रबंध किया गया है। उसी की तर्ज पर 1932 के खतियान के आधार पर स्थानीय नीति का निर्धारण करने के लिए विशेष उपबंध क्यों नहीं बनाया जा सकता है। 
  • अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन निवासी (वन पर आश्रित) अधिकारियों की मान्यता अधिनियम-2006, आज तक झारखंड राज्य में क्यों लागू नहीं की गई है। यह सर्वविदित है कि भाजपा की रघुवर सरकार ने छोटनागपुर संथाल परगना अधिनियम-1908 तथा संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम-1949 को संशोधित करने का असफल प्रयास किया गया था। यह दोनों कानून संविधान की नौवीं अनुसूची अनुच्छेद-31 (ख)में सूचीबद्ध हैं। अवलोकन के लिए सन 2007 में नौवीं अनुसूची पर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के नौ जजों के ऐतिहासिक फैसले को देखा जा सकता है।
  • झारखंड अलग राज्य मांग का आंदोलन पांच दशक पुराना है। निरंतर जन संघर्ष, त्याग और बलिदान के परिणाम स्वरुप झारखंड राज्य का निर्माण हुआ है। यह अलग राज्य की उपलब्धि तभी संभव हो सकी है, जब 50,000 से भी ज्यादा आंदोलनकारी सेनानियों ने सब कुछ त्याग दिया था। तत्कालीन राज्य सरकार 2012 में झारखंड आंदोलनकारी चिन्हितिकरण आयोग का गठन हुआ था। इस आयोग का कार्यकाल 8 अगस्त 2019 को समाप्त हो चुका है। वर्तमान में आयोग के समक्ष करीब 50,000 आंदोलनकारियों के आवेदन लंबित हैं। उन्हें पहचान पत्र देना और पेंशन देने की लड़ाई सड़क से लेकर संघर्ष तक जारी रखे हैं।

  • आशा है नए राज्यपाल उपर्युक्त ज्वलंत मुद्दों पर विशेष ध्यान देंगे। राज्यपाल संविधान के अनुच्छेद 154, 163, 167, 175 के मद्देनजर झारखंडी जनाकांक्षा के अनुरूप ऐतिहासिक कदम उठाएंगे।