जमशेदपुर, शैलेंद्र महतो। यह उस दौर की बात है, जब ब्रिटिश सरकार की शोषण और दमन नीति के फलस्वरूप जनजाति व्यवस्था को गहरा धक्का लगा। ब्रिटिश व्यवस्था में जमींदार, जागीरदार, साहूकार, महाजन, जो बाहर से आए हुए लोग थे, बिहार (अब झारखंड) के मालिक बन बैठे। मोटेतौर पर ब्रिटिश नीति यह थी कि आदिवासियों को अलग-थलग रखा जाए और यथास्थिति बरकरार रखी जाए।

पुलिस अधिकारी, वन्य अधिकारी और जमींदार सात समुंदर पार इंग्लैंड में बैठे इन पितृसत्तात्मक शासकों के छोटे-छोटे स्थानीय प्रतिनिधि थे। इनके व्यवहार से आदिवासियों को ऐसा लगा कि ये कौवा और मोर की भांति मिथ्यादंभी और नीचता के प्रतीक हैं। आदिवासियों की धारणा में इन महाजनों, ठेकेदारों, साहूकारों की स्थिति सांप (बिंग), जादूगरनी (नाजोम) और आदमखोर (कुला) जैसी थी, जिनकी मिलीभगत से जनजातीय भूमि व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गई थी। बिरसा मुंडा ने अपने संघर्ष के दौरान दो मोर्चों पर लड़ाई लड़ी। पहला, अपने समाज में व्याप्त अंधविश्वास, जादू-टोना, भूत-प्रेत, शराबखोरी समेत अनेक सामाजिक कुप्रथाओं से मुक्ति और दूसरा, अंग्रेजों के पिट्ठू जमींदार, साहूकार के खिलाफ अपने राजनीतिक-सांस्कृतिक अस्तित्व के लिए संघर्ष।

शिक्षा के लिए घूमे गांव-गांव

बिरसा मुंडा का पैतृक गांव उलिहातू है, लेकिन उनका जन्म 15 नवंबर, 1875 को रांची स्थित तमाड़ थाना के चलकद ग्राम में हुआ था, जहां बिरसा के पिता सुगना मुंडा के मामा का घर था। माता का नाम करमी था, जो आयुबहातू की थीं। पिता की गरीबी के कारण बिरसा की प्रारंभिक शिक्षा मामा घर में रहते हुए सलगा गांव के स्कूल में हुई। बालक बिरसा का स्कूल जाना भी चौंकाने वाली घटना थी, क्योंकि उस वक्त आदिवासियों में यही धारणा थी कि पढ़कर बच्चा अधिकारी या दिकू (शोषक) बन जाता है। दो वर्ष की प्रारंभिक शिक्षा के बाद बिरसा की सबसे छोटी मौसी नवमी उन्हें अपने गांव खटंगा ले गईं। मौसी बिरसा को पढ़ाना चाहती थीं, जबकि मौसा इसके खिलाफ थे। बिरसा अपने मौसा के मवेशी चराते हुए भी पढ़ाई में खो जाते थे। फलस्वरूप मवेशी दूसरों के खेत चर जाते और बिरसा को मार पड़ती। मार से आहत होकर एक दिन बिरसा अपने गांव चले आए। यहां नजदीक के बुड़जू गांव स्थित जर्मन ईसाई मिशन स्कूल से प्राइमरी शिक्षा पूरी की। आगे की शिक्षा के लिए तीन दिन पैदल चलकर चाईबासा पहुंचे, जहां उच्च प्राथमिक एसपीजी मिशन स्कूल में वर्ष 1886 में दाखिला मिल गया। यहां इनकी पहचान दाऊद बिरसा पुरती के रूप में थी।

धर्म के नाम पर मिला धोखा

पढ़ाई के साथ-साथ स्कूल में धार्मिक प्रवचन भी दिए जाते थे, जिसमें ईसाइयत और राजभक्ति की भी अनवरत प्रेरणा दी जाती थी। डा. नोट्रोट धार्मिक प्रवचनों के दौरान वादा करते कि यदि वे ईसाई बने रहें और उनके अनुदेशों का पालन करते रहें तो शासन या महाजनों द्वारा छीनी गई उनकी जमीन वापस दिला देंगे। उन दिनों जर्मन लूथरन और रोमन कैथोलिक ईसाई किसानों का भूमि आंदोलन चल रहा था। इन ईसाई किसानों को सरदार कहा जाता था। जमीन ही झारखंड के लोगों की मुख्य समस्या थी। दरअसल, झारखंड में आने के बाद अंग्रेजी हुकूमत यहां के विद्रोह करने वाले आदिवासियों की जमीन छीन लेती थी। प्रवचनों में इन्हीं छीनी गई जमीनों को वापस दिलाने के वादे से आकर्षित होकर काफी संख्या में लोग ईसाई बन गए। राजधर्म में आ जाने और पादरियों के वादों के कारण उन्होंने सशस्त्र क्रांति का मार्ग त्यागकर कानूनी रास्ता अपना लिया था। अब लोग तीर, बल्लम, कटार आदि छोड़कर अदालतों के चक्कर लगाते। लगभग 30 वर्ष का लंबा सफर बीत चुका था, लेकिन मुकदमों की अंतहीन कहानी समाप्त होने के दूर-दूर तक आसार नजर नहीं आ रहे थे। अब ईसाई किसान सरदारों में कुछ निराशाजनक प्रतिक्रिया भी दिखाई देने लगी थी। इसके बाद मिशनरियों को छोड़ने की हवा बह चली।

बचपन से ही रहे स्वाभिमानी

एक दिन पादरी डा. नोट्रोट ने अपने धर्मोपदेश के दौरान झारखंड के लोगों को अकृतज्ञ और बेईमान तक कह दिया। वहां उपस्थित सारे लोग चुपचाप सिर झुकाकर सुनते रहे, लेकिन बिरसा से रहा नहीं गया। ‘यह झूठ है’, कहते हुए बिरसा चीख उठे। ‘बेईमान मुंडा नहीं, तुम अंग्रेज हो। यहां के लोगों ने कोई धोखा नहीं दिया, बल्कि तुम गोरों ने हमेशा हम लोगों को धोखा दिया है।’ बिरसा के इस गुस्से से मानो आसमान फट पड़ा। शासक वर्ग के लोगों को धोखेबाज कहने वाले बिरसा उन्हें इतनी खरी बात कह दें और वे उन्हीं के स्कूल में शिक्षा भी ग्रहण करें, यह कैसे संभव था। बिरसा को स्कूल से निकाल दिया गया। बिरसा का यह विद्रोह मुखर अवश्य था, लेकिन पहला विद्रोह नहीं। इसके पहले भी उन्होंने विद्रोह किया था, जब वह बचपन में बुड़जू गांव के प्राइमरी स्कूल में पढ़ते थे। उन दिनों भी मुंडा से ईसाई बने एक धर्म प्रचारक के कथनों का बिरसा ने जमकर विरोध किया था। तब बिरसा यद्यपि बालक ही थे, किंतु विरोध उन्होंने वयस्क की तरह किया था। इसी स्वाभिमान की भावना ने दाऊद बिरसा को भगवान बिरसा की मंजिल तक पहुंचाया।

विद्रोही रहे जीवनभर

स्वाभिमानी बिरसा जीवनभर विद्रोही बने रहे। अपने जिस उलगुलान के लिए आज बिरसा सारे संसार में जाने जाते हैं, उस उलगुलान का शब्दिक अर्थ भी ‘विद्रोह’ ही है। वर्ष 1890 में जब बिरसा को चाईबासा छोड़ना पड़ा, तब उन्होंने एक बार फिर विद्रोह किया और जर्मन मिशन की सदस्यता ग्रहण कर ली। यहां भी दाऊद बिरसा पुरती ने अनुभव किया कि ‘साहब-साहब एक टोपी’ ही है और ईसाई धर्म से भी विद्रोह कर अपने पुराने आदिवासी सरना धर्म में लौट आए। उसी के साथ उनके परिवार के सभी लोग सरना धर्म में लौट आए।

(लेखक जमशेदपुर लोकसभा क्षेत्र के पूर्व सांसद हैं)

Edited By: Rakesh Ranjan