दिनेश शर्मा, चक्रधरपुर: कोल्हान के चक्रधरपुर की धरती ने भारतवर्ष ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व को एक से एक नायाब हीरे दिए। इन हीरों ने हर क्षेत्र में अपनी चमक बिखेरी। क्षेत्र चाहे स्वतंत्रता संग्राम का हो, खेल का हो अथवा साहित्य का। कालातर में झारखंड के पश्चिम सिंहभूम के चक्रधरपुर में हीरों की चमक कम तो हुई, लेकिन ऐसे हजारों-हजार हृदय हैं, जिन्होंने इन हीरों की चमक अपने हृदय में बसाए रखी। ऐसे ही एक नायाब हीरे का नाम है पंडित रामचीज सिंह वल्लभ। जिन्होंने साहित्य की दुनिया को प्रथम ¨हदी जेबी कोष (पॉकेट डिक्शनरी) का उपहार दिया एवं अपना नाम साहित्य के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज करा लिया। इसके बावजूद ¨हदी के कर्णधारों व सरकारी पैसों से ¨हदी दिवस मनाने वालों ने कभी वल्लभ जी को याद करने की रस्म निभाने की भी जहमत नहीं उठाई। पंडित रामचीज सिंह वल्लभ सन 1910 के आसपास स्थानीय रेलवे मिडिल स्कूल में ¨हदी शिक्षक के रूप में आए थे। उन्होंने ¨हदी साहित्य की दुनिया को पहली बार ¨हदी जेबी कोष (पॉकेट डिक्शनरी), ¨हदी मुहावरे जेबी कोष एवं ¨हदी लोकोक्ति जेबी कोष परिचित कराया। वर्तमान समय में ¨हदी जेबी कोष साधारण सी बात है, लेकिन उस जमाने में वल्लभ जी द्वारा जेबी कोष की उपयोगिता समझते हुए अपनी परिकल्पना को मूर्त रूप दिया गया। उस वक्त सिंहभूम ¨हदी भाषियों का क्षेत्र नहीं माना जाता था। इस क्षेत्र में आदिवासियों के अलावा अन्य लोगों में ओड़िया एवं बंगला का ही विशेष प्रभाव था। वल्लभ जी द्वारा कोषों की रचना के साथ-साथ 'वल्लभ साहित्य कुटीर' नामक प्रकाशन संस्था की भी स्थापना की गई। उस वक्त अविभाजित सिंहभूम जिले में कोई मुद्रणालय नहीं था। वल्लभ जी को जेबी कोषों के प्रकाशन हेतु कलकत्ता, मुम्बई आदि महानगरों की दौड़ लगानी पड़ी। अपने जेबी कोष रूपी असाधारण सूझ को मूर्त रूप देने के लिए उन्हें खासी मशक्कत करनी पड़ी थी।

¨हदी जेबी कोषों के प्रकाशित होते ही हिन्दी साहित्य की दुनिया में तहलका मच गया। देशभर की तत्कालीन पत्र पत्रिकाओं ने वल्लभ जी के इस नवीन प्रयास की मुक्तकंठ से सराहना की। भारत-मित्र, शुभचिंतक,अभ्युदय, बंगवासी आदि पत्र-पत्रिकाओं ने वल्लभ जी के जेबी कोषों की सराहना करते हुए लेख लिखे। देशरत्‍‌न डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने भी जेबी कोष पर अपना अभिमत दिया था। राजेंद्र बाबू ने कहा 'शब्द सागर जैसा वृहद कोष सुगमता से हरेक को उपलब्ध नहीं हो सकता। बाबू रामचीज सिंह वल्लभ ने ऐसे कोष की रचना कर हिन्दी साहित्य की बड़ी सेवा की है।'

राजेन्द्र बाबू का यह अभिमत वर्ष 1916 का है। ¨हदी जगत के लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकार आचार्य शिवपूजन सहाय से इस क्षेत्र के जाने-माने साहित्यकार आचार्य शशिकर की एक सम्मेलन में वर्ष 1954 में मुलाकात हुई। आचार्य शशिकर ने अपनी शका निवारण के लिए ¨हदी जेबी कोष एवं ¨हदी मुहावरे जेबी कोष उनके सम्मुख प्रस्तुत किए। आचार्य शिवपूजन सहाय ने भी इन्हें ¨हदी जगत के निर्विवाद रूप से प्रथम जेबी कोष करार देते हुए वल्लभ जी की प्रशसा की। रामचीज सिंह वल्लभ ने कोष के अलावा 'राजपूती ज्ञान', 'ललिता' एवं 'उमाशकर' नामक तीन उपन्यास भी लिखे। महाकवि हरिऔध द्वारा खड़ी बोली में श्री गणेश किए गए कविता आदोलन में भी वल्लभ जी ने सक्रिय भूमिका निभाई। वल्लभ जी द्वारा 'भाग्य-चक्र' नाम से कविता पुस्तक लिखी गई थी। रामचीज सिंह वल्लभ का बहुआयामी व्यक्तित्व पोड़ाहाट नरेश राजा नरपत सिंह के चक्रधरपुर स्थित राजमहल में नगरवासियों को देखने को मिलता था।

राजा नरपत सिंह के यहा नाटकों के मंचन एवं निर्देशन हरिप्रसाद चौरसिया के सहयोग से वल्लभ जी द्वारा किया जाता था। वल्ल्भ जी द्वारा एक प्रहसन पुस्तक 'बीसवीं सदी की शादी उर्फ हड़पफड़प' लिखी गई। उन्होंने 'सुबोध-वर्णमाला' के नाम से बच्चों के लिए नर्सरी पद्धति से पुस्तक रचना भी की। यह पुस्तक भी अपने ढंग की सम्पूर्ण भारतवर्ष में पहली बताई जाती है। इनके अलावा उन्होंने मिडिल स्तर तक के लिए हिन्दी की पाठ्यपुस्तकें भी तैयार की थी।

Posted By: Jagran

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