जितेंद्र सिंह, जमशेदपुर। फ्लाइंग सिख के नाम से मशहूर मिल्खा सिंह ने वैसे तो कई अंतरराष्ट्रीय पदक जीते थे। उन्होंने एशियाई खेलों में चार स्वर्ण व कॉमनवेल्थ गेम्स में एक गोल्ड अपने नाम किए थे। लेकिन जब भी उनकी चर्चा होती है, उनकी जीतों से ज्यादा कहीं उनकी एक हार की चर्चा होती है।

 

 प्रतियोगिता में भाग लेते मिल्खा सिंह। 

दिल टूटने की कहानियां, जीत की कहानियों से ज्यादा ताकतवर

ऐसा नहीं है कि मिल्खा सिंह पहले शख्स थे, जिन्हें ओलंपिक में हार का सामना करना पड़ा था। केडी जाधव, राज्यवर्धन राठौड़, पहलवान सुशील कुमार, योगेश दत्त, निशानेबाज अभिनव बिंद्रा जैसे दर्जनों खिलाड़ियों ने भारत को ओलंपिक में पदक दिला चुके हैं। लेकिन 1960 के रोम ओलंपिक में मिल्खा सिंह का पदक चूकने की कहानी आज भी याद की जाती है। शायद हम यही कह सकते हैं, दिल टूटनेे की कहानियां, जीत की कहानियों से ज्यादा ताकतवर होती है। 

 

 अपनी पत्नी निर्मल कौर के साथ मिल्खा सिंह। 

80 में से 77 दौड़ में हासिल की थी जीत

रोम ओलंपिक जाने से पहले ही मिल्खा सिंह को पदक विजेता माना जाने लगा था, क्योंकि उन्होंने कार्डिफ के कॉमनवेल्थ गेम्स में विश्व रिकार्डधारी मेल स्पेंस को हराकर स्वर्ण पर कब्जा जमाया था। मिल्खा सिंह में मीडिया से बातचीत में बताया था, रोम ओलंपिक पहुंचने के पहले मैं दुनिया भर के 80 प्रतियोगिता में भाग ले चुका था। इस 80 प्रतियोगिताओं में 77 में जीत हासिल की, जिसमें एक कीर्तिमान भी बन गया था। पूरी दुनिया में लोग यह मानने लगे थे कि 400 मीटर रेस में ओलंपिक में कोई गोल्ड जीतेगा तो वह मिल्खा सिंह ही है। और सचमुच वह दौड़ ऐतिहासिक हो गया। इस दौड़ में पहले चार एथलीटों ने ओलंपिक रिकॉर्ड तोड़े वहीं बाकी के दो एथलीटों ने कीर्तिमान की बराबरी की। इतना रिकॉर्ड टूटना अपने आप में बड़ी बात थी।

रोमवासियों ने पहली बार किसी सरदार को देखा था

रोम ओलंपिक के पांचवीं हीट में मिल्खा सिंह दूसरे स्थान पर आए थे। क्वार्टर फाइनल व सेमीफाइनल में वह दूसरे स्थान पर थे। लेकिन सुकून की बात थी कि उन्हें दर्शकों का भरपूर समर्थन मिल रहा था। वह याद कर कहते थे, जब भी मैं स्टेडियम में प्रवेश करता था, मेरा नाम से हर कोना गूंज उठता था। लोग तो यहां तक कहते थे कि यह साधु है। क्योंकि इससे पहले रोम में किसी ने सरदार को नहीं देखा था। लोग कहा करते थे, इसके सिर पर जूड़ा है, साधुओं की तरह रहता है।

फाइनल से पहले दबाव में आ गए थे मिल्खा

आमतौर पर सेमीफाइनल दौड़ के दूसरे ही दिन फाइनल होती है, लेकिन 1960 के रोम ओलंपिक में 400 मीटर दौड़ दो दिन बाद हुई। लेकिन मिल्खा के लिए यही माइनस प्वाइंट हो गया। वह फाइनल दौड़ के बारे में सोचने लगे और दबाव में आ गए। स्थिति यह थी कि वह नर्वस होकर कमरे में ही तेज-तेज चलने लगते। अपनी अात्मकथा 'रेस ऑफ माई लाइफ' में उस परिस्थिति के बारे में बयां करते हुए मिल्खा ने लिखा है, मेरा दरवाजा अचानक किसी ने खटखटाया। दरवाजा खोला तो सामने मैनेजर उमराव सिंह थे। वह मुझे टहलने लगे। वह मुझसे पंजाबी में बात करते और सिख गुरुओं की बहादुरी की कहानियां सुनाते, ताकि अगले दिन होने वाले मुकाबले में मैं ज्यादा ध्यान केंद्रित कर सकूं।

1960 रोम ओलंपिक में दौड़ लगाते मिल्खा सिंह।

जर्मन एथलीट को देख दौड़ का लगा लिया गलत अंदाजा

रोम ओलंपिक में 400 मीटर दौर का फाइनल का दिन। पूरा स्टेडियम खचाखच भरा था। पहली लेन कार्ल कॉफमैन को दी गई। अमेरिका के ओटिस डेविस दूसरे लेन में थे। मिल्खा सिंह को पांचवी लेन मिला। उनकी बगल की लेन में एक जर्मन धावक था, जो सबसे कमजोर था। इस जर्मन एथलीट को मिल्खा कई बार हरा चुके थे। लेकिन यही एथलीट मिल्खा के लिए काल बन गया। उन्होंने दौड़ को गलत जज कर लिया। जैसे ही स्टार्टर ने आवाज लगाई, ऑन योर मार्क। मिल्खा घुटनों के बल बैठ गए और धरती मां से प्रार्थना की, सिर नीचा किया और लंबी सांस ली। जैसे ही पिस्टल से फायर हुआ, वह सरपट भागने लगे।

रोम ओलंपिक में चौथे स्थान पर रहे मिल्खा सिंह।

पीछे मुड़कर देखते ही भारत के हाथ से गिर गया मेडल

मिल्खा सिंह ने बताया था, मैं 250 मीटर तक बढ़त बनाए हुए था। तभी मैंने खुद से पूछना शुरू किया, इतनी तेज क्यों भाग रहे हो। हो सकता है यह दौड़ पूरा नहीं कर पाओ। यह सोच जिस गति से मैं दौड़ रहा था, वह कम कर दिया। जब मैंने अंतिम कर्व खत्म कर अंतिम 100 मीटर पर आया तो देखा, तीन-चार लड़के जो पीछे दौड़ रहे थे, अचानक वह आगे निकल गए। मैंने उन्हें पकड़ने की कोशिश की। लेकिन तीन-चार गज आगे निकल जाने के बाद उन्हें पकड़ना मुश्किल होता है। उस एक गलती से किस्मत का सितारा के साथ-साथ भारत का मेडल भी हाथ से गिर गया। मिल्खा सिंह कहा करते थे, मेरी एक सबसे खराब आदत थी, चाहे वह एशियाई खेल हो या राष्ट्रमंडल खेल, मैं पीछे मुड़कर हमेशा देखा करता था कि दूसरा खिलाड़ी कितना पीछे हैं। रोम में भी मैंने यही किया।

 

फोटो फिनिश से लेना पड़ा विजेता का फैसला

400 मीटर का यह दौड़ काफी नजदीकी था, जहां पहले चार स्थानों का फैसला फोटो फिनिश के जरिए करना पड़ा। डेविस, स्पेंस, मिल्खा व कॉफमैन चारों ने 45.9 सेकेंड का पुराना रिकॉर्ड को ध्वस्त कर दिया। कॉफमैन का भी समय 44.9 था, लेकिन फोटो फिनिश के बाद उन्हें दूसरा स्थान मिला। स्पेंस का समय 45.5 था, जिन्हें कांस्य पदक मिला। मिल्खा सिंह का समय 45.6 था, जो उस समय के ओलंपिक रिकॉर्ड से अच्छा था।

मिल्खा सिंह को अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित करते तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद

पाकिस्तानी राष्ट्रपति ने दी थी फ्लाइंग सिख की उपाधि

मिल्खा सिंह को फ्लाइंग सिख के नाम से जाना जाता है। क्या आपको पता है कि उन्हें यह उपाधि किसने दी। मिल्खा सिंह को यह उपाधि पाकिस्तान के राष्ट्रपति फील्ड मार्शल अयूब खां ने दी थी, जब उन्होंने लाहौर में आयोजित एक टूर्नामेंट में पाकिस्तान के लोकप्रिय धावक अब्दुल खालिक को मात दी थी। पुरस्कार वितरण समारोह में अयूब खां ने मिल्खा को संबोधित करते हुए कहा था, मिल्खा आज तुम दौड़े नहीं उड़े हो। इसलिए हम तुम्हें फ्लाइंग सिख के खिताब से नवाज रहे हैं। इसी के बाद से मिल्खा सिंह को फ्लाइंग सिख कहा जाने लगा।

 

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Edited By: Jitendra Singh