जमशेदपुर [वीरेंद्र ओझा]। औद्योगिक भारत की नींव जमशेदपुर में ही रखी गई थी। वर्ष 1907 में टाटा कंपनी की स्थापना के साथ जमशेदपुर शहर भी बसना शुरू हो गया था। तब जरूरत के हिसाब से यहां कई भवन, अस्पताल, गोदाम, बाजार आदि विकसित किए गए थे। वक्त के साथ जरूरतें बदलती गईं और पुरानी जगहों पर नई चीजें बनकर खड़ी हो गईं। हमसब के लिए यह जानना बेहद दिलचस्प होगा कि शहर में किस स्थान पर पहले क्या हुआ करता था।

गोपाल मैदान में था बड़ा पहाड़

बिष्टुपुर में आज जहां गोपाल मैदान है, वहां बहुत बड़ा पहाड़ हुआ करता था। बिष्टुपुर निवासी गगन व्यास बताते हैं कि यह कंपनी से सटा था। सुरक्षा के नजरिए से वर्ष 1935 के आसपास कंपनी ने इसे हटाने का निर्णय लिया। बिहार के गया के रहनेवाले अब्दुल रज्जाक खान को इसका ठेका मिला। इसे छेनी-हथौड़ी से काटने में सैकड़ों मजदूर लगे थे, पर पहाड़ खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था। चट्टान हटाते-हटाते यह गड्ढे में तब्दील हो गया। फिर इसे मैदान का रूप दे दिया गया। कंपनी के मुख्य सांस्कृतिक कार्यक्रम जो पहले साकची के बारी मैदान में हुआ करते थे, यहां होने लगे। मैदान बनने से पहले वर्ष 1938 में रीगल बिल्डिंग (भरूचा मेंशन) बन गया था। लिहाजा इसका नाम रीगल मैदान रखा गया। टाटा वर्कर्स यूनियन के अध्यक्ष वीजी गोपाल की हत्या (14 अक्टूबर 1993) के बाद इसका नामकरण गोपाल मैदान हुआ। पहले इसका ज्यादातर उपयोग खेलकूद के लिए होता था। यहां जिम भी है।

साकची सराय ही बन गया होटल केनेलाइट 

साकची की जामा मस्जिद के पास होटल केनेलाइट है। शुरुआती दौर में यहां सराय था, जिसे होटल बनने के पहले तक साकची सराय के नाम से जाना जाता था। पुराने लोग बताते हैं कि यह क्षेत्र धालभूमगढ़ रियासत में आता था। यहां धालभूमगढ़ के अलावा सरायकेला और राजखरसावां के अलावा मयूरभंज रियासत के राजा भी यात्रा के क्रम में ठहरते थे। 60-70 के दशक तक यह ठीक-ठाक स्थिति में था, लेकिन बाद में यह लावारिसों का बसेरा बनने लगा। लंबे समय बाद सराय का अधिग्रहण झारखंड पर्यटन विकास निगम ने कर लिया। पर्यटन निगम के अधीन वर्ष 2016 में होटल केनेलाइट बना। ज्ञात हो कि दो जनवरी 1919 को बंगाल के गवर्नर लॉर्ड चेम्सफोर्ड ने साकची का नामकरण जमशेदपुर किया था।

मद्रासी सम्मेलनी की जगह था अनाज गोदाम

बिष्टुपुर में खरकई लिंक रोड से सटा मद्रासी सम्मेलनी है। कभी यहां अनाज का गोदाम था। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय हर जगह खाद्यान्न जमा किए जा रहे थे। उसी समय भारत सरकार के लिए टाटा स्टील ने यह स्थान उपलब्ध कराया था। लंबे समय तक यह अनाज गोदाम के रूप में ही जाना जाता था। सम्मेलनी के महासचिव जी. शंकर बताते हैं कि अनाज गोदाम की जानकारी उन्हें नहीं है। उन्हें इतना मालूम है कि 1917 में मद्रासी सम्मेलनी का शिलान्यास हुआ था। टीन शेड में समाज की गतिविधियां चलती थीं। वर्तमान भवन 1950 के दशक में बना। 

विशाल गड्ढे में बना गुजराती सनातन समाज

बिष्टुपुर में आज जहां गुजराती सनातन समाज है, वहां कभी बड़ा सा गड्ढा था। वह पूरा इलाका ही गड्ढानुमा था। तुलसी भवन से लेकर गुजराती सनातन समाज और पास के मणि मेला मैदान में साल भर पानी भरा रहता था। बरसात के दिनों में खरकई नदी का पानी यहां तक आ जाता था। लोग बताते हैं कि बरसात के दिनों में अक्सर बच्चे डूबते थे।

पहले थी आटा चक्की, अब बना बारी मैदान क्लब हाउस

टाटा स्टील नागरिक सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए कई काम करती थी। कर्मचारियों को जलावन के लिए कोयला तक उपलब्ध कराया जाता था, तो जूट-केरोसिन आदि भी दिए जाते थे। इसी उद्देश्य से कंपनी ने साकची में आटा चक्की लगाई थी, जहां लोग गेहूं पिसाने आते थे। बाद में कई इलाकों में चक्की खुलने लगी, तो कंपनी ने इसे बंद कर दिया। साकची में आज भी एक सड़क का नाम फ्लावर मिल रोड है, जो बोधि मंदिर और राजेंद्र विद्यालय के पीछे पड़ता है। यह सड़क उस स्थान तक जाती है, जहां आज बारी मैदान क्लब हाउस बन गया है।

होटल जिंजर की जगह कभी हुआ करता था कांजी हाउस

बिष्टुपुर मेन रोड पर जहां होटल जिंजर है, वहां पहले कांजी हाउस था। वोल्टास बिल्डिंग के सामने इस स्थान पर सड़क पर घूम रहे लावारिस गाय-भैंस को पकड़कर रखा जाता था। जब इसके मालिक ढूंढते हुए आते थे, तो जुर्माना चुकाकर अपनी गाय-भैंस ले जाते थे। पहले इसका संचालन जिला प्रशासन खुद करती थी, बाद में इसे जमशेदपुर अधिसूचित समिति करने लगी। 90 के दशक तक निजी एजेंसी के माध्यम से कांजी हाउस चलता था। बाद में यहां टाटा स्टील का पावर सबस्टेशन बन गया, तो बाकी हिस्से में होटल जिंजर का निर्माण हो गया। अब शहर में कहीं भी कांजी हाउस नहीं है। 

बालीचेला विद्यालय के पास बालू से निकलता था सोना

सोनारी में बालीचेला विद्यालय है। इसका नामकरण बालू चालने की वजह पहले बालीचाला था। दरअसल स्वर्णरेखा नदी के बालू से सोना निकलता था। यहां के आदिवासी-मूलवासी नदी किनारे एक लकड़ी का बड़ा सा पटरा लेकर बैठे रहते थे। उसमें बालू रखकर पानी के साथ खास तरीके से चालते थे, जिससे सोना निकलता था। इसी वजह से यहां काफी संख्या में सोनार बस गए, जिससे इलाके का नाम सोनारी पड़ गया। जहां बालीचेला स्कूल है, वहां बालू जमा किया जाने लगा। सोनार नदी की बजाय यहीं बालू चालते थे। खर्च की तुलना में अपर्याप्त उपलब्धता की वजह से यह बंद गया। नब्बे के दशक तक नदी किनारे बालू चालते हुए लोग दिख जाते थे।

   

पत्थर स्कूल हुआ करता था जमशेदपुर वीमेंस कालेज

बिष्टुपुर स्थित जमशेदपुर वीमेंस कालेज आज जहां है, वहां कभी पत्थर स्कूल था। कालेज के मुख्यद्वार पर आज भी पहाड़ जैसा बड़ा-सा पत्थर मौजूद है। पत्थर स्कूल में लड़के-लड़की साथ पढ़ते थे, लेकिन माध्यमिक कक्षा तक ही पढ़ाई होती थी। शहर के शिक्षाविद एमडी मदन व एसके बागची ने कुछ अन्य लोगों के साथ लड़कियों के लिए स्कूल और कालेज खोलने की पहल की। घर-घर जाकर एक-एक रुपये चंदा लिया गया। इस प्रयास का नतीजा रहा कि 1953 में जमशेदपुर वीमेंस कालेज खुल गया। इसकी संस्थापक प्राचार्य गीता सान्याल थीं।

यूनाइटेड क्लब में पहले बना था रेडियो स्टेशन

बिष्टुपुर स्थित यूनाइटेड क्लब अपने अंदर कई इतिहास समेटे हुए है। शहर के सबसे पुराने इस क्लब परिसर में गांधीजी ने 1934 में जनसभा को संबोधित किया था। इसके बाद टाटा स्टील ने यहां रेडियो स्टेशन भी खोला, जिसका प्रसारण शहर के विभिन्न इलाकों में होता था। आज भी शहर के कई मोहल्ले में रेडियो मैदान मिल जाएंगे। सत्तर के दशक में यहां एमजीएम मेडिकल कालेज की पढ़ाई भी होती थी, जब मानगो का भवन नहीं बना था।

 

बाघाकुदर तालाब से बना जुबिली लेक 

जुबिली पार्क के अंदर जो बड़ा सा तालाब है, वह 1956 तक बाघाकुदर तालाब के नाम से ही जाना जाता था। वर्ष 1957 में टाटा स्टील की स्थापना के 50 वर्ष पूरे होने पर तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने जुबिली पार्क का उदघाटन किया था। इसके साथ ही इस तालाब का नाम जुबिली लेक या जयंती सरोवर हो गया। गगन व्यास बताते हैं कि तालाब के बीच में जो टापू या आइलैंड वहां पहले संस्थापक दिवस पर आतिशबाजी होती थी। लोग लेक के चारों ओर जमा होकर आतिशबाजी देखते थे। 

Posted By: Rakesh Ranjan

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