जमशेदपुर (अमित तिवारी)। पोटका स्थित हल्दीपोखर निवासी गुरुपदो मोदो (53) नामक मजदूर की सांस थम रही थी। उसके पास इलाज कराने को पैसे नहीं थे। कोलकाता से दिल्ली तक चक्कर लगाया, लेकिन हर जगह पैसे से हार गया। इस हालत में बचने की आस धूमिल हो रही थी कि उसे आयुष्मान भारत योजना के तहत गोल्डन कार्ड मिला। नए सिरे से कोशिश शुरू हुई। उसका मुफ्त इलाज शुरू हुआ। सर्जरी कर डॉक्टरों ने सीने से दो किलो का ट्यूमर निकाला।  उसकी जान बच गई।

चिकित्सकों का दावा है कि बिहार-झारखंड में इस तरह का यह पहला मामला है, जिसकी सर्जरी संभव हो सकी। अब मरीज स्वस्थ है। आयुष्मान योजना उनके लिए वरदान साबित हुई। गुरुपदो कहते हैं कि दो साल पूर्व ही छाती के बायी ओर ट्यूमर होने की पुष्टि हुई थी। पैसे ही नहीं थे जो इलाज करा पाते। कोल्हान के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल महात्मा गांधी मेमोरियल (एमजीएम) मेडिकल कॉलेज चिकित्सा संस्थान गए तो वहां पर इलाज की सुविधा नहीं होने की बात कही गई। इसके बाद रांची रिम्स भी गए पर वहां भी इलाज नहीं हुआ। फिर कोलकाता-दिल्ली तक दौड़ लगाई। दो से ढाई लाख रुपये खर्च बताया गया। इतनी बड़ी रकम सुनकर उम्मीद ही छोड़ दी कि अब ठीक होंगे। वापस लौट आए। इसी दौरान घर प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत योजना के तहत गोल्डन कार्ड संजीवनी बनकर पहुंचा। सहिया ने उन्हें समझाया कि इस कार्ड पर पांच लाख रुपये तक मुफ्त में इलाज होगा। यह सुनकर एक नई उम्मीद जगी। कार्ड लेकर ब्रह्मïानंद अस्पताल पहुंचे। कैंसर सर्जन डॉ. आशीष कुमार से मिले तो उन्होंने बताया कि सर्जरी हो जाएगी लेकिन काफी जोखिम भी है। मरीज ने धरती के भगवान कहे जाने वाले डॉक्टर पर भरोसा किया। आखिर डॉक्टरों ने उसकी जान बचा ली।

फेफड़े काम करना कर दिया था बंद, सांस लेने में हो रही थी परेशानी

गुरुपदो मोदो श्वानोमा ट्यूमर से ग्रस्त था, जो बढ़कर दो किलो का हो गया था। एक हजार में एक-दो मरीज को ही इस तरह की समस्या होती है। ट्यूमर का आकार बड़ा होने की वजह से मरीज के  एक फेफड़े ने काम करना बंद कर दिया था। इससे सांस लेने में काफी परेशानी हो रही थी। गला भी फूल गया था। मरीज के हार्ट व फेफड़ा को खतरा था। 

छह डॉक्टरों की टीम ने तीन घंटे तक किया ऑपरेशन

मरीज के ऑपरेशन के लिए पांच चिकित्सकों की एक टीम बनाई गई थी। इसमें कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. परवेज आलम, कैंसर रोग सर्जन डॉ. आशीष कुमार, एनेस्थेटिक डॉ. विजय, डॉ. राहुल, डॉ. रामानुज व डॉ. उमेश शामिल थे। ऑपरेशन तीन घंटे तक चला।

यह बड़ी उपलब्धि है। मरीज गंभीर अवस्था में पहुंचा था। वह बीते डेढ़ साल से सीने में दो किलो का ट्यूमर लेकर इलाज के लिए भटक रहा था। उसकी जान को खतरा था। इस तरह के मरीज को बेहोश करना जोखिम भरा होता है। इसके लिए चार एनेस्थेसिया विशेषज्ञों की टीम लगी हुई थी।

- डॉ. आशीष कुमार, कैंसर रोग सर्जन।

 

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Posted By: Rakesh Ranjan