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    बेदाग छवि व सरल स्वभाव के कारण सिसई के गांधी कहे जाते थे ललित उरांव

    By JagranEdited By:
    Updated: Sun, 13 Dec 2020 09:06 PM (IST)

    संवाद सूत्र गुमला खेती किसानी से राजनीति के शिखर तक पहुंच कर समाज में अलग पहचान बनाने वा

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    बेदाग छवि व सरल स्वभाव के कारण सिसई के गांधी कहे जाते थे ललित उरांव

    संवाद सूत्र, गुमला : खेती किसानी से राजनीति के शिखर तक पहुंच कर समाज में अलग पहचान बनाने वाले राजनेता ललित उरांव को उनकी ईमानदारी, शालीनता और बेदाग छवि के कारण ही उन्हें सिसई का गांधी भी कहा जाता है। ललित उरांव का जन्म सिसई के एक छोटे से गांव पोटरो में हुआ था। उनका बचपन का नाम लोहरा उरांव था। उनके पिता का एतवा और माता का नाम दशमी देवी था। खेती किसानी का काम उन्हें विरासत में मिली थी इसके बावजूद वे पढ़ने में काफी तेज थे। इंटर के बाद पढ़ाई छोड़ दी और समाज सेवा के क्षेत्र में जुड़ गए। इस कार्य में उन्हें अच्छे लोगों का साथ मिला। आदिम जनजाति सेवा मंडल द्वारा बिशुनपुर में संचालित स्कूल में ललित उरांव शिक्षक के पद पर कार्य करने लगे। जंगल और पहाड़ के बीच पांच रुपये में बच्चों को शिक्षा का ज्ञान बांटने लगे। गुरु के रूप में उनकी ख्याति बढ़ गई। विदेश से लौटने के बाद कार्तिक उरांव ने 1962 के लोकसभा का चुनाव लड़ना था, तभी विधान सभा चुनाव के लिए ललित उरांव को राजी किया था। ललित उरांव को कांग्रेस रास नहीं आया और 1965 में जनसंघ पार्टी के नाम पर जागरण रैली किया गया। 1966 में वे सिसई विधान सभा से चुनाव लड़े। इस बार भी उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा। उसके बाद 1969 में मध्यवधि चुनाव हुए तो ललित उरांव चुनाव जीत गए। 1975 में जब देश में आपात काल घोषित हुआ तब लोकतंत्र बचाने के लिए जेपी के नेतृत्व में आंदोलन में कूद गए। जिसमें ललित उरांव भी शामिल थे। इसके बाद 1977 तथा 1980 के विधानसभा चुनाव में लगातार जीत हासिल की। 1969 में वे बिहार सरकार में आदिवासी कल्याण मंत्री तथा फिर 1977 में वन मंत्री बनाए गए। वर्ष 1991 और 1996 में वे लोहरदगा सीट से सांसद निर्वाचित हुए। राजनीति जीवन में इनकी बेदाग छवि और सरल व्यवहार के कारण ललित उरांव से लोगों के लिए ललित बाबा बन गए। ललित उरांव का निधन 27 अक्टूबर 2003 को हो गया। क्षेत्र की जनता आज भी उनकी ईमानदारी व काम करने के तरीके को याद करती है।

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