पथरगामा : पथरगामा प्रखंड मुख्यालय से तीन किमी की दूरी पर स्थित बड़ी दुर्गा मंदिर बारकोप राज घराने की ओर से निर्मित ऐतिहासिक मंदिर है। पथरगामा की लखन पहाड़ी पंचायत में स्थित इस मंदिर के प्रति आज भी लोगों की गहरी आस्था है। यहां 13वीं शताब्दी से ही लगातार तांत्रिक पद्धति से देवी भगवती की पूजा अर्चना होती आ रही है। बारकोट राजघराना की देखरेख में प्रत्येक वर्ष यहां शारदीय नवरात्र का अनुष्ठान शुरू किया जाता है। आगामी 17 अक्टूबर को कलश स्थापना के लिए यहां तैयारी शुरू कर दी गई है।

सरकार की गाइडलाइन के अनुरूप मंदिर में चार फिट आकार की प्रतिमा निर्माण का कार्य शुरू कर दिया गया है। इस वर्ष कोरोना महामारी को देखते हुए सरकार के नियम का पालन कर पूजा की तैयारी शुरू की गई है। बड़ी दुर्गा मंदिर में पूजा-अर्चना की विशेषता यह है कि यहां राज परिवार के लोग पूजा अनुष्ठान की सारी तैयारी और खर्च वहन करते हैं। किसी से चंदा या सहयोग लेने की परंपरा नहीं है। राजघराने के लोग ही आपस में सहयोग कर पूजा संपन्न कराते हैं।

बताया जाता है कि बड़ी दुर्गा मंदिर के पुजारी पंडित बबली झा के वंशजों की ओर से यहां पूजा-अर्चना की जा रही है। बारकोप के राजा द्वारा पूजा करने के एवज में पुजारी परिवार को भूमि दान स्वरूप दी गई थी। साथ ही छाग बलि करने वाले को राजघराने की ओर से जमीन दी गई है। यहां सिमरिया निवासी भिखारी राय उर्फ लंबू एवं श्रवण मार्कडेय को भी जमीन दान स्वरूप मिली है। यहां बलि की प्रथा पूर्वजों से चली आ रही है। बलि देने वाले भी एक ही परिवार के सदस्य होते हैं। यहां तक कि मंदिर में फूल लाने वाले माली राजू ठाकुर के परिवार वाले को भी राजघराने की ओर से बतौर पारिश्रमिक जीवन यापन के लिए भूमिदान में दी गई है। एक ही माली परिवार के फूल ही यहां भगवती को चढ़ता है। बारकोट राजवंश के उक्त मंदिर में जन्माष्टमी के दिन हर साल दही कदवा का आयोजन किया जाता है। जिसमें मिट्टी के पात्र में दही-हल्दी मिलाकर मां दुर्गा के मस्तक पर स्पर्श करा कर उसे घर-घर घुमाया जाता है। इस दौरान राजवंश के सभी परिवार इसकी पूजा-अर्चना करते हैं। दशहरा के दौरान मंदिर में एक पूजा से विजयादशमी तक हर दिन बलि दी जाती है। राज परिवार के लोगों के द्वारा यह कार्य सदियों से किया जा रहा है।

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बारकोप स्थित बड़ी दुर्गा मंदिर की पूजा अर्चना सदियों पुरानी है। यहां पूर्वजों के जमाने से चली आ रही परंपरा आज भी जीवित है। पूजा को लेकर सार्वजनिक चंदा नहीं किया जाता है। आपस में सहयोग कर ही अनुष्ठान का पूरा खर्च राज वंश के परिजन ही वहन करते हैं। नवरात्र के दौरान हर दिन बलि देने की प्रथा आज भी अक्षुण्य है।

- ध्रुवज्योति सिंह, बारकोप राज घराना के सदस्य, पथरगामा

Edited By: Jagran