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    चासनाला खान में जलप्लावन की घटना से जब दहल उठा था देश

    By JagranEdited By:
    Updated: Sun, 26 Dec 2021 07:46 PM (IST)

    वर्ष 1975 का 27 दिसंबर का दिन। जब जलप्लावन की घटना से कोयला जगत ही नहीं पूरा देश दहल उठा था।

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    चासनाला खान में जलप्लावन की घटना से जब दहल उठा था देश

    संस, चासनाला : वर्ष 1975 का 27 दिसंबर का दिन। जब जलप्लावन की घटना से कोयला जगत ही नहीं पूरा देश दहल उठा था। इस्को की चासनाला कोलियरी के डीप माइंस में दिल दहला देनेवाली घटना हुई थी। प्रथम पाली में कार्य पर गए 375 खनिकों ने कोयला खनन करते हुए अपनी शहादत दे दी थी। खान दुर्घटना में कई मां की गोद सूनी हो गई तो कई सुहागिनों की मांग का सिदूर उजड़ गया। कई बहनों का भाई उनसे छिन गया। कई के सिर से पिता का साया उठ गया। सोमवार को चासनाला के उन अमर शहीदों की 46वीं बरसी है। चासनाला स्थित शहीद स्मारक की शहीद वेदी के पास सर्वधर्म सभा कर व पुष्प अर्पित कर सेल के अधिकारी, शहीद के स्वजन, यूनियन के लोग श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे।

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    चासनाला खान दुर्घटना एशिया की सबसे बड़े खदान हादसों के तौर पर इतिहास के पन्नों में काला अध्याय के रूप में लिखा गया है। यहां की घटना पर कई वर्षों के बाद काला पत्थर नामक फिल्म भी बनी। यह फिल्म काफी मशहूर हुई थी। कई साल तक जांच में पता चला कि अधिकारियों की लापरवाही से दुर्घटना हुई थी। खदान में रिसने वाले पानी को जमा करने को यहां बड़ा बांध बनाया गया था। हिदायत दी गई थी की बांध के 60 मीटर की परिधि में ब्लास्टिग नहीं की जाए, लेकिन अधिकारियों ने इन निशानों को नजरअंदाज कर हैवी ब्लास्टिग कर दी। इसी लापरवाही की वजह से 375 खनिकों ने जल समाधि ले ली। दुर्घटना के बाद कई महीनों तक खदान से पानी निकालने का कार्य हुआ। इसमें पोलैंड, रूस के वैज्ञानिकों से भी मदद ली गई थी।

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    कई माह तक हुआ था शवों का अंतिम संस्कार

    चासनाला में हुई खान दुर्घटना के बाद महीनों तक पानी में रहने के कारण शव सड़ चुके थे। ज्खदान से शव निकालने के बाद मृतक की पहचान लैंप (बैटरी वाली बत्ती), टोपी, कपड़े आदि से की गई थी। कई माह तक दामोदर नदी के किनारे शवों का अंतिम संस्कार चलता रहा।

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    न्यायाधीश एसएन सिन्हा ने की थी खान दुर्घटना की जांच

    दुर्घटना की जांच न्यायाधीश एसएन सिन्हा को सौंपी गई थी। जांच में सुरक्षा नियमों की अनदेखी करने का मामला सामने आया था। इस रिपोर्ट को श्रम विभाग को सौंप दिया गया। तत्कालीन परियोजना पदाधिकारी, प्रबंधक, सेफ्टी अधिकारी व अन्य अधिकारी को दुर्घटना के लिए दोषी मानकर बर्खास्त कर दिया गया था।