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Sudamdih Mine Disaster: 50 साल बाद भी नहीं भूले 43 खनिकों की शहादत, आंखों में आज भी जिंदा है उस भयावह हादसे का दर्द

Published: Sun, 04 Oct 2026 07:38 PM (IST)

भारत के कोयला उद्योग के इतिहास में 4 अक्टूबर 1976 को हुए सुदामडीह शाफ्ट माइंस हादसे की 50वीं बरसी पर मृत खनिकों को श्रद्धांजलि दी गई।

सुदामडीह शाफ्ट माइंस हादसे में शहीद श्रमिकों को श्रद्धांजलि देते बीसीसीएल अधिकारी-कर्मचारी व स्वजन। (फोटो जागरण)

सुदामडीह शाफ्ट माइंस हादसे में शहीद श्रमिकों को श्रद्धांजलि देते बीसीसीएल अधिकारी-कर्मचारी व स्वजन। (फोटो जागरण)

संवाद सूत्र, चासनाला (धनबाद)। भारत के कोयला उद्योग के इतिहास में 4 अक्टूबर 1976 की तारीख काले अक्षरों में दर्ज है। रविवार को बीसीसीएल की ऐतिहासिक और वर्तमान में बंद सुदामडीह शाफ्ट माइंस हादसे की 50वीं बरसी पर उस भयानक त्रासदी की यादें एक बार फिर जीवंत हो उठीं।

खदान परिसर के समीप स्थित बलिदान वेदी को फूलों से सजाया गया था। आयोजित सर्वधर्म प्रार्थना सभा में मृत खनिकों को नम आंखों से श्रद्धांजलि दी गई।

पांच दशक बीत जाने के बाद भी यहां का माहौल गमगीन था और पीड़ितों के चेहरों पर अपनों को खोने का दर्द साफ झलक रहा था। पूर्वी झरिया क्षेत्र के महाप्रबंधक तूनेश्वर पासवान ने वेदी पर पुष्पचक्र अर्पित कर अमर शहीदों को नमन किया।

इसके बाद बीसीसीएल के वरिष्ठ अधिकारियों, श्रमिक संघों के प्रतिनिधियों और स्थानीय लोगों ने दो मिनट का मौन रखकर मोमबत्तियां जलाईं।

महाप्रबंधक ने कहा कि सुदामडीह शाफ्ट माइंस का इतिहास और अमर खनिकों का बलिदान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा और सतर्कता का प्रतीक रहेगा। उनकी स्मृति को संजोए रखने के लिए जल्द ही यहां कोल नीर प्रोजेक्ट की शुरुआत की जाएगी।

बीसीकेयू के संयुक्त महामंत्री निताई महतो ने तत्कालीन बीसीसीएल अध्यक्ष के वादे को याद दिलाते हुए खदान को आधुनिक तकनीकों के साथ पुनर्जीवित करने की मांग उठाई।

मौके पर क्षेत्रीय प्रबंधक सुधांशु महाजन, एजीएम अभिषेक झा, पीओ अरुण कुमार, प्रबंधक पीके पटनायक, अभियंता ए चंद्रा, बीसीकेयू से निताई महतो, पार्षद बीरेंद्र कुमार, भामसं नेता अरिंजय श्रीवास्तव, सुभाष तिवारी, राजेंद्र सोनार, जमसं से रतनपाल सिंह, राजेश सिंह, बीरेंद्र रवानी, रामविनय सिंह, संजय सुपकार थे।

पिता को सिर्फ तस्वीरों और यादों में देखा

हादसे के पांच दशक बाद भी प्रभावित परिवारों की जिंदगी से वह खौफनाक दिन मिट नहीं सका है। इस हादसे ने कई अजन्मे बच्चों और दुधमुंहा शिशुओं के सिर से पिता का साया छीन लिया था।

डंपर ऑपरेटर सुदामा गड़ेरिया बताते हैं कि पिता स्व. तीर्थराज गड़ेरिया शाफ्ट माइंस में पीसरेट मजदूर थे। जब यह हादसा हुआ, तब मैं अपनी मां के गर्भ में महज तीन माह का था।

मैंने कभी अपने पिता का चेहरा तक नहीं देखा। सिर्फ मां के आंसुओं और संघर्षों के जरिए ही पिता के अस्तित्व को महसूस किया।

नगीना हरिजन ने बताया कि पिता स्व. रामधनी हरिजन की मौत के उनकी उम्र महज छह महीने थी। परिवार में सिर्फ एक बड़ी बहन और मां बची थीं। हादसे में जान गंवाने वाले स्व. बरातू राम धोबी के पुत्र कीर्तन लाल धोबी उस समय केवल डेढ़ वर्ष के थे।

हादसे के बाद तीनों विधवा माताओं को बीसीसीएल में नियोजन मिला। वर्षों तक संघर्ष कर बच्चों को पालने-पोसने के बाद, बेटों के बालिग होने पर माताओं ने अनुकंपा के आधार पर अपनी नौकरी उन्हें सौंप दी।

आज तीनों बेटे उसी संस्थान में कार्यरत हैं। जहां उनके पिताओं ने अंतिम सांस ली थी। वे रुंधे गले से कहते हैं कि मां जब उस दिन का मंजर सुनाती हैं तो रूह कांप उठती है।

सुबह 8:40 बजे और 15 नंबर सीम में गूंजती मौत की चीखें

4 अक्टूबर 1976 की सुबह पहली पाली का काम सामान्य रूप से शुरू हुआ था। सुबह करीब 8:40 बजे, खदान के 15 नंबर सीम हॉरिजन में अचानक एक भीषण और बहरा कर देने वाला धमाका हुआ।

जांच रिपोर्ट के अनुसार, हादसे से ठीक पहले लगातार चार दिनों का अवकाश था। इस दौरान खदान का वेंटिलेशन सिस्टम (हवा निकासी और संचार प्रणाली) ठप पड़ गया था। यांत्रिक पंखे बंद रहने से खदान के भीतर अत्यधिक ज्वलनशील मीथेन गैस और कोल डस्ट का खतरनाक जमाव हो गया।

काम शुरू होते ही एक चिंगारी ने विकराल आग और विस्फोट का रूप ले लिया। धमाके के साथ ही पूरी खदान में घना जहरीला धुआं और धूल भर गई। खदान के अंदर मौजूद 43 श्रमिकों को संभलने का मौका तक नहीं मिला।

बचाव दल जब अंदर पहुंचा, तो क्षत-विक्षत और जले हुए शव देखकर हर किसी का दिल दहल गया। बाहर स्वजनों की चीख-पुकार से चासनाला-सुदामडीह का समूचा क्षेत्र दहल उठा था।

विडंबना यह रही कि 43 जिंदगियों के लील जाने और उच्चस्तरीय जांच बैठ जाने के बावजूद किसी भी जिम्मेदार पर ठोस दंडात्मक कार्रवाई नहीं हो सकी।

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