जासं, धनबाद: धनबाद में कभी हार्डकोक उद्योग उफान पर रहता था मगर आज कोयला नहीं मिलने के कारण कई उद्योग बंदी के कगार पर आ गए है। यह बातें इंडस्ट्रीज एंड कामर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष बीएन सिंह ने कही है। शुक्रवार को इंडस्ट्रीज एंड कामर्स एसोसिएशन का 89वां वार्षिक सम्मेलन है। इसमें सबसे बड़ा मुद्दा बीसीसीएल व इसीएल के द्वारा हार्डकोक उद्योग को कोयला नहीं देना ही होगा।

130 से 70 हो गए हार्डकोक इंडस्ट्रीज: धनबाद में कभी हार्डकोक इंडस्ट्रीज उफान पर था। मगर बीसीसीए इसीएल के रवैये से धनबाद के हार्डकोक उद्योग भी बेजार हो गए हैं। ना ही उन्हें कोयला मिल रहा है और ना ही हार्ड कोक बेचने के लिए बाजार। ऐसे में पिछले दो वर्षों में कई हार्डकोक उद्योग पर ताला लटक गया है। इसमें प्रभु कोक, हिंदुस्तान, अलका, मुग्मा, रामाकृष्णा, पाटलीपुत्र हार्ड कोक आदि शामिल हैं। इसके कारण तीन हजार मजदूरों का रोजगार छीन गया।

तीन लाख टन की जगह एक लाख टन कोयला: हार्डकोक इंडस्ट्रीज को धनबाद में लिंकेज के जरीए हर माह तीन लाख टन कोयला बीसीसीएल के द्वारा देना है मगर मात्र एक लाख टन कोयला ही हार्डकोक इंडस्ट्रीज को मिल रहा है। कोयला मिलने के बाद यह लोग आपस में इसे बांट लेते है जिसके बाद इनकी इंडस्ट्रीज चलती है। कोयले की कमी होने के कारण कई बार हार्डकोक इंडस्ट्रीज को दूसरे देशों से कोयला मंगाना पड़ता है जो काफी मंहगा होता है। जिसके बाद इनका आगे का माल बिकने में काफी कठिनाई होती है।

रंगदारी भी बनी समस्या : धनबाद हार्डकोक उद्योगों का कब्रगाह बन रहा है। इसके पीछे जहां आर्थिक मंदी है तो वहीं दूसरी ओर रंगदारी को भी कारण माना जा रहा है। उद्योगपति मानते हैं कि बाघमारा क्षेत्र में कोयला उठाव करने में उनकी कोई रूचि नहीं। कारण साफ है कि इस क्षेत्र में रंगदारी जबदस्त है। जिस क्षेत्र में रंगदारों का वर्चस्व नहीं, वहां का कोयला काफी मंहगा बिक रहा है। इस कारण धनबाद के हार्डकोक उद्यमी दोहरी मार का सामना कर रहे हैं।

Edited By: Atul Singh

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