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चिरकुंडा की 200 साल पुरानी दुर्गा पूजा: जंजीरों में बंधी मां, भक्तों की हर मुराद होती है पूरी

Published: Thu, 15 Oct 2026 07:04 PM (IST)

चिरकुंडा के लायकपाड़ा में 200 साल से भी अधिक पुरानी मां दुर्गा की पूजा अपनी अनोखी परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है, जहां प्रतिमा को चेन से बांधकर रखा जाता है।

चिरकुंडा के लायकपाड़ा मंदिर में जंजीर से बंधी मां दुर्गा की प्रतिमा।

चिरकुंडा के लायकपाड़ा मंदिर में जंजीर से बंधी मां दुर्गा की प्रतिमा।

HighLights

  1. चिरकुंडा में 200 साल से अधिक पुरानी दुर्गा पूजा।

  2. अष्टमी-नवमी पर कंपन के कारण प्रतिमा को चेन से बांधा जाता है।

  3. मां दुर्गा भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करती हैं।

भगवान मालवीय, चिरकुंडा (धनबाद)। पश्चिम बंगाल की सीमा से लगे झारखंड के चिरकुंडा नगर परिषद क्षेत्र के नेहरू रोड स्थित लायकपाड़ा में हो रही मां दुर्गा की पूजा पूरे कोयलांचल की सबसे प्राचीन पूजाओं में से एक मानी जाती है। स्थानीय लोगों के अनुसार 200 वर्षों से भी अधिक समय से मां दुर्गा की पूजा होती आ रही है।

यहां पूजा के दौरान माता की प्रतिमा को चेन से बांधकर रखने की परपंरा अपने आप में अद्भुत और अनूठी है। मान्यता है कि यहां दर्शन करने से मां सभी भक्तों की मनोकामना पूरी करती हैं। दूर-दराज से लोग यहां पूजा करने आते हैं।

अष्टमी-नवमी को प्रतिमा में होता है कंपन

लोगों का कहना है कि अष्टमी और नवमी के दिन मां दुर्गा की प्रतिमा में हल्का कंपन होने लगता है। इसी कारण सुरक्षा के लिए प्रतिमा को चेन से बांधकर रखा जाता है। एक और विशेष परंपरा है कि अष्टमी के दिन ढोल-नगाड़ा नहीं बजाया जाता। अष्टमी की पूजा खड़की पूजा से शुरू होती है और नवमी प्रवेश करते ही पात्र की बलि दी जाती है।

स्वप्न में दिया था मां ने आदेश 

पूजा से जुड़ी किंवदंती काफी रोचक है। कहा जाता है कि बहुत साल पहले लायक पाड़ा के स्व. दक्षिण राय लायक को मां दुर्गा ने स्वप्न दिया था कि वे बच्चों के रूप में यहीं भटक रही हैं, तुम मेरी स्थापना कर पूजा-पाठ प्रारंभ करो। मैं तुम्हारी और पूरी बस्ती की रक्षा करूंगी।

स्वप्न के बाद दक्षिणेश्वर लायक ने रामकुमार लायक और केशोराम लायक के साथ विचार-विमर्श किया और बस्ती वालों को इस बारे में बताया। सभी ने मिलकर सर्वप्रथम चारों तरफ बांस गाड़कर चौताल बनाया और उसमें मां की प्रतिमा स्थापित कर विधिवत पूजा प्रारंभ की। धीरे-धीरे भव्य मंदिर का निर्माण हुआ। वर्तमान मंदिर करीब 150 वर्ष पुराना बताया जाता है।

वर्तमान में पुजारी कमल चक्रवर्ती हैं। उनके पूर्वज भी यहां पूजा कराते आ रहे हैं। लोगों का मानना है कि मां की स्थापना के बाद से लायकपाड़ा में कभी कोई महामारी नहीं फैली और हर विपदा में मां ने लोगों की रक्षा की है। मन्नत पूरी होने पर लोग यहां पात्र की बलि देने भी आते हैं। पूजा देखने धनबाद, कतरास और सिलीगुड़ी तक से श्रद्धालु आते हैं।

पूजा को सफल बनाने में कमेटी अध्यक्ष प्रशांत लायक, सचिव कन्हाई लायक, कोषाध्यक्ष अभिजित दास के अलावे कार्यकारिणी सदस्य संजय लायक,अ जय लायक विद्यापति लायक, संजीव लायक,नंटू लायक,बबन लायक,विकाश लायक, बिनू लायक, कौशिक लायक, स्वरूप भट्टाचार्य, कदम धीबर, रिन्टु लायक चुने गए।

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