Dhanbad Durga Puja: ढाक बजी, मां आईं… हर थाप में देवी के आगमन का संदेश
Durga Puja में ढाक वादन का विशेष महत्व है, जो मां दुर्गा के आगमन का आह्वान करता है। धनबाद में ...और पढ़ें

धनबाद के तेतुलतल्ला में ढांक बजाते मुर्शिदाबाद से आए वादक। (फोटो जागरण)
HighLights
दुर्गा पूजा में ढाक वादन का विशेष महत्व है।
बंगाल से आए ढाकी धनबाद में देते हैं प्रस्तुति।
यह परंपरा रोजगार और सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण करती है।
जागरण संवाददाता, धनबाद। Durga Puja 2026: ढाक बजी, मां आईं…। जी, हां ढांक वादन का दुर्गा पूजा में बड़ा ही महत्व है। ढाक की गूंज के साथ ही मां दुर्गा के आगमन का आह्वान शुरू हो जाता है।
पश्चिम बंगाल और झारखंड में दुर्गापूजा के दौरान ढाक की थाप का विशेष महत्व है। इसकी गूंज वातावरण में भक्ति, उत्साह और उल्लास का संचार करती है। ढाक बजते ही लोगों के मन में मां दुर्गा के स्वागत की उमंग जाग उठती है।
दुर्गापूजा के पंडालों में ढाक की थाप एक अलग ही आध्यात्मिक अनुभूति कराती है। ढाकियों की लयबद्ध प्रस्तुति पूजा के माहौल को जीवंत बना देती है। मानो इसकी हर थाप मां दुर्गा को धरती पर आने का निमंत्रण देती है।
षष्ठी तिथि को ढांक की गूज से होता मां का ‘बोधन’
ढाक वादन के साथ मां दुर्गा का आह्वान मुख्य रूप से महालय के दिन किया जाता है। बंगाली परंपरा में महालय पितृपक्ष के अंत और देवी पक्ष की शुरुआत का प्रतीक है। इस दिन चंडीपाठ और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों के जरिए मां दुर्गा को धरती पर आने का निमंत्रण दिया जाता है।
हालांकि, दुर्गापूजा में षष्ठी तिथि को ‘बोधन’ के साथ मां दुर्गा की पूजा की औपचारिक शुरुआत होती है। बंगाल की परंपरा में ढाक की गूंज देवी के स्वागत और पूजा के माहौल का अभिन्न हिस्सा है।
बंगाल से आते हैं ढांक वादक
पश्चिम बंगाल से लगे होने के कारण झारखंड के धनबाद कोयलांचल में भी दुर्गा के अवसर पर ढांक वादन की परंपरा है। इस समय दुर्गा पूजा के तमाम पंडाल ढांक वादन से गूंज रहे हैं। ढाक और ढोल की गूंज भक्तों को अपनी ओर आकर्षित कर रही है।
ढांक की पारंपरिक धुन पर लोग थिरकने को मजबूर हो जाते हैं। पूजा पंडालों में ढाक की आवाज उत्सव के उल्लास को और बढ़ा देती है। यहां पर ज्यादातर ढांक बजाने वाले बंगाल से आते हैं।
चार पीढियों से जुड़ा है मुर्शिदाबाद का दास परिवार
धनबाद के तेतुलतल्ला में भी इन दिनों मुर्शिदाबाद से आए 11 सदस्यीय टीम अपनी प्रस्तुति से लोगों का मन मोह रही है। टीम के सदस्य प्रतिदिन हिंदी, बांग्ला और नागपुरी गीतों की धुन पर ढोल-ढाक बजाकर पूजा की रौनक बढ़ा रहे हैं।
टीम के सदस्य चंदन दास ने बताया कि उनका परिवार चार पीढ़ियों से इस पारंपरिक पेशे से जुड़ा हुआ है। विभिन्न प्रकार की पूजा, त्योहार और शादी-विवाह जैसे आयोजनों में ढोल-ढाक बजाकर लोगों का मनोरंजन करते हैं।
हालांकि, साल के अन्य दिनों में वे खेती-बाड़ी का काम करते हैं। दुर्गा पूजा के दौरान संगीत की यह परंपरा उनके लिए रोजगार के साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने का माध्यम भी है।
18 वर्षों से तेतुलतल्ला में दे रहे प्रस्तुति
चंदन दास ने बताया कि उनकी टीम पिछले 18 वर्षों से दुर्गा पूजा के अवसर पर तेतुलतल्ला आती रही है। यहां पूजा के दौरान पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन प्रस्तुत करना उनकी परंपरा का हिस्सा बन चुका है।
हर वर्ष की तरह इस बार भी टीम के सदस्य अलग-अलग धुनों से श्रद्धालुओं को आकर्षित कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि इस बार उनका 10 वर्षीय बेटा रोहित दास भी टीम के साथ आया है। इससे परिवार की अगली पीढ़ी को इस पारंपरिक कला को सीखने का अवसर मिल रहा है।
कुड़कुड़ी धुन पर मोहित हुए लोग
टीम के सदस्य अभिजीत दास ने बताया कि अशोक दास, कृष्ण दास और भास्कर दास मुख्य रूप से गीत-संगीत की प्रस्तुति देते हैं। टीम की विशेष कुड़कुड़ी धुन लोगों को खास तौर पर आकर्षित करती है।
पारंपरिक संगीत की इसी प्रस्तुति से प्रभावित होकर गोपाल चक्रवर्ती और भरत प्रसाद ने टीम के सदस्यों को सम्मानित किया। ढोल-ढाक की गूंज के बीच कलाकारों की यह प्रस्तुति दुर्गा पूजा के माहौल में लोक संस्कृति और परंपरा के रंग भर रही है।
