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'गरीबों का दर्द समझे न्यायपालिका', देवघर में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत का बड़ा संदेश

Published: Mon, 02 Nov 2026 11:04 PM (IST)

CJI सूर्यकांत ने देवघर में कहा कि न्यायपालिका को गरीबों की पीड़ा समझनी चाहिए और कानूनी सहायता उन तक पहुंचनी ...और पढ़ें

देवघर में राज्यस्तरीय विधिक सेवा सह सशक्तीकरण शिविर में भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और अन्य अतिथि। (फोटो जागरण)

देवघर में राज्यस्तरीय विधिक सेवा सह सशक्तीकरण शिविर में भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और अन्य अतिथि। (फोटो जागरण)

HighLights

  1. न्यायपालिका गरीबों की पीड़ा समझे, कानूनी सहायता उन तक पहुंचे।

  2. विधिक सेवा प्राधिकार स्वयं गरीब व्यक्तियों तक पहुंचकर न्याय दिलाए।

  3. आर्थिक अभाव के कारण कोई भी व्यक्ति न्याय से वंचित न हो।

संवाददाता, देवघर। भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि देश के किसी गरीब व्यक्ति के साथ होने वाला अन्याय उन्हें भी उतना ही दुखी करता है। आर्थिक अभाव के कारण गरीबों को कानूनी सहायता नहीं मिल पाती। वहीं, शैक्षणिक योग्यता की कमी के कारण वे कानून की जानकारी और अपने अधिकारों से भी अनजान रह जाते हैं।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या हम यह उम्मीद करें कि गरीब व्यक्ति शहर आए, वकील से मिले, विधिक सहायता कार्यालय जाए, कानूनी सलाह ले और फिर मुकदमा दायर कर अपने अधिकारों की लड़ाई लड़े? इसका बेहतर विकल्प यह है कि विधिक सेवा प्राधिकार खुद गरीब व्यक्ति तक पहुंचे, उसकी समस्याओं और पीड़ा को समझे तथा विधिक सहायता अधिवक्ताओं के माध्यम से उसे न्याय दिलाने में मदद करे।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत सोमवार को देवघर में झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकार (झालसा), रांची और जिला प्रशासन, देवघर के संयुक्त तत्वावधान में सिविल कोर्ट परिसर में आयोजित राज्यस्तरीय विधिक सेवा सह सशक्तीकरण शिविर का उद्घाटन करने के बाद संबोधित कर रहे थे।

उन्होंने कहा कि भारत के मुख्य न्यायाधीश के तौर पर वे अपनी ओर से जो भी भूमिका निभा सकते हैं, उसे निभाएंगे। कहा कि उन्हें इस बात की खुशी और गर्व है कि पूरे भारत में राज्य विधिक सेवा प्राधिकार और जिला विधिक सेवा प्राधिकार उस भावना के साथ काम कर रहे हैं, जिस भावना से विधिक सेवा प्राधिकार अधिनियम बनाया गया था।

देश में इस कानून के तहत जिस आंदोलन की शुरुआत की गई थी, उसके माध्यम से न्याय को हर द्वार तक पहुंचाने के लिए विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है। ऐसे कार्यक्रमों में शामिल होकर उन्हें भी काफी प्रसन्नता होती है। इससे यह आत्मविश्वास पैदा होता है कि देश के किसी भी गरीब व्यक्ति को न्याय प्रणाली से न्याय पाने से वंचित नहीं रखा जा सकता।

उन्होंने कहा कि पिछले वर्ष नवंबर में वे रांची आए थे। इसके बाद उन्हें भारत के मुख्य न्यायाधीश की भूमिका संभालनी थी। उस समय उन्होंने कहा था कि अब समय आ गया है कि भारतीय न्यायपालिका किसी व्यक्ति के दर्द को उसी तरह समझे और उसे मदद पहुंचाए, जैसे अस्पताल में किसी मरीज का इलाज किया जाता है।

न्यायपालिका में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जिसमें आम लोगों, विशेषकर आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए न्याय के दरवाजे 24 घंटे सातों दिन खुले रहें।

उन्होंने अस्पताल के उदाहरण के माध्यम से अपनी परिकल्पना समझाते हुए कहा कि जब कोई मरीज अस्पताल पहुंचता है तो नर्स या स्वास्थ्यकर्मी उसे भरोसा दिलाते हैं कि आप चिंता मत कीजिए, आपका इलाज हो जाएगा। इससे उसकी आधी समस्या और बीमारी का दर्द वहीं कम हो जाता है। इसी परिकल्पना के तहत उन्होंने कहा था कि विधिक सहायता से जुड़े अधिवक्ता और विधिक समन्वयक भी उसी तरह गरीब व्यक्ति तक पहुंचें।

वह गरीब व्यक्ति बुजुर्ग, महिला, बच्चा, दिव्यांग या आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़ा कोई भी हो सकता है। जरूरत इस बात की है कि हमारी पहुंच उन तक हो।

उन्होंने विधिक स्वयंसेवकों से कहा कि वे उन गरीब लोगों को न्याय दिलाने के सूत्रधार हैं, जिन्हें न्याय से वंचित रखा गया है या जिनके साथ अन्याय हुआ है। वे गरीब व्यक्ति का मार्गदर्शन करेंगे, उसे वकील के पास लेकर जाएंगे और अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिए उचित सलाह देंगे। ऐसे में उनके ऊपर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है।

इस जिम्मेदारी को निभाने के लिए जरूरी है कि वे गरीब व्यक्ति की भाषा में उसकी समस्या समझें और उसी की भाषा में उसे समझाएं। यदि आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े व्यक्ति से उसकी भाषा में बात नहीं करेंगे तो उसके और हमारे बीच दूरी बनी रहेगी। इस दूरी को मिटाना हमारा सबसे बड़ा संकल्प होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि जरूरी है कि गरीब व्यक्ति की बात ध्यान से सुनें, उससे उसकी भाषा में संवाद करें, उसके दर्द को समझें और उसे समस्या के समाधान का रास्ता बताएं।

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