बोकारो, निज संवाददाता : शुक्रवार को सिटी सेंटर में पूर्व मुख्यमंत्री सह पूर्व मंत्री स्व. बिन्देश्वरी दुबे की 19वीं पुण्यतिथि मनायी गयी। वक्ताओं ने कहा कि स्व. दुबे ने अपना सारा जीवन समाज के लिए समर्पित कर दिया। एक स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ-साथ मजदूरों के हितैषी थे। मजदूरों के अधिकार की लड़ाई के लिए उन्होंने देश स्तर पर आंदोलन चलाया।

देश में कैबिनेट मंत्री व राज्य सभा सांसद बनकर उन्होंने बिहार का नाम रौशन किया। इसके अलावा वे संयुक्त बिहार के मुख्यमंत्री भी बने। इससे पूर्व लोगों ने उनके चित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी।

स्व. दुबे के नाती शिवाशीष चौबे, रीतेश चौबे, कांग्रेस जिलाध्यक्ष रामाराउत, कांग्रेस नेता निर्मल सिंह, भुवनेश्वर पाठक, पीएन पांडेय, रघुवर यादव, हरिनंदन यादव, जफर इमाम, राम हरिलाल श्रीवास्तव, शकील अहमद, एसके मिश्रा, मुरारी चौबे, विमल चौबे, आदित्य नाथ झा, रामजी पाठक, मनोज कुमार, हरेंद्र सिंह, इंद्रदेव प्रसाद, रघुनंदन यादव, कौशल किशोर, एचएस खान, रघुवीर यादव आदि ने अपने विचार व्यक्त किए।

मजदूर आंदोलन से लेकर मुख्यमंत्री तक का सफर

बोकारो, निसं : स्व. बिन्देश्वरी दुबे ने अपनी विशिष्ट कार्यशैली, लगन व परिश्रम के बल पर सिर्फ बिहार ही नहीं बल्कि देश के राजनीतिक पटल पर एक अमिट छाप छोड़ी। उन्होंने मजदूर आंदोलन से लेकर मुख्यमंत्री तक का सफर तय किया। उनका जन्म 14 जनवरी 1921 एवं मृत्यु 20 जनवरी 1993 को हुई। वे स्वतंत्रता सेनानी थे। आजाद भारत में मजदूर नेता के रूप में उनकी अलग पहचान बनी। वे 1985 से लेकर 1988 तक संयुक्त बिहार के मुख्यमंत्री रहे। इसके पूर्व वे बिहार के शिक्षा, परिवहन एवं स्वास्थ्य मंत्री भी रहे। 1980 में वे गिरिडीह लोकसभा क्षेत्र से सांसद बने। राजीव गांधी के शासन में वे कैबिनेट मंत्री भी रहे। वे 1988 से 1993 तक राज्यसभा के सदस्य रहे।

उनका जन्म भोजपुर जिला के महुआंव गांव के ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिता शिव नरेश दुबे थे। चार भाइयों में ये दूसरे स्थान पर थे। स्व. दुबे की दूसरी बेटी मनोरमा दुबे एवं दामाद चंद्रेश्वर दुबे की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गयी। इसके बाद उन्होंने इनके बच्चे शिवाशीष चौबे, शोभा चौबे, राकेश चौबे व रीतेश चौबे को अपना वारिस घोषित किया। जो बोकारो स्टील सिटी के सिटी सेंटर सेक्टर 4 स्थित उनके आवास में रहते हैं।

ट्रेड यूनियन

स्व. दुबे ने अपने जीवन काल में कोयला, इस्पात, ऊर्जा आदि औद्योगिक संस्थानों के मजदूरों के अधिकार के लिए लड़ाई लड़ी। इसके बाद इनकी ख्याति इतनी बढ़ी की उन्हें 1981 में इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस के अध्यक्ष बनाया गया।

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