क्या एक मंच पर आएंगे आजाद, इंजीनियर रशीद और रुहुल्ला? जम्मू-कश्मीर में तीसरे मोर्चे की सुगबुगाहट तेज
नेशनल कॉन्फ्रेंस से आगा सैयद रुहुल्ला मेहदी के इस्तीफे ने जम्मू-कश्मीर में एक वैकल्पिक राजनीतिक मंच के गठन की चर्चाओं ...और पढ़ें

रुहुल्ला की पहल से जम्मू-कश्मीर में नए सियासी मोर्चे की सुगबुगाहट। (फाइल फोटो)
HighLights
रुहुल्ला मेहदी ने नेशनल कॉन्फ्रेंस और सांसद पद से इस्तीफा दिया।
जम्मू-कश्मीर में नए राजनीतिक मंच की संभावना पर चर्चा तेज।
गुलाम नबी आजाद, इंजीनियर रशीद भी संभावित गठबंधन में शामिल।
नवीन नवाज, श्रीनगर। नेशनल कान्फ्रेंस के वरिष्ठ नेता आगा सैयद रुहुल्ला मेहदी के पार्टी से इस्तीफे और श्रीनगर के सांसद पद से त्यागपत्र देने के फैसले ने जम्मू-कश्मीर की राजनीति में नए समीकरणों की संभावना को हवा दे दी है। उनके इस कदम के बाद प्रदेश में एक वैकल्पिक राजनीतिक मंच के गठन को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। राजनीतिक हलकों में ऐसी संभावनाएं तलाशी जा रही हैं, जिनके तहत अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं और पृष्ठभूमि वाले नेताओं को साझा मुद्दों पर एकजुट किया जा सके।
इस संभावित राजनीतिक पहल में पूर्व मुख्यमंत्री एवं डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव आजाद पार्टी (डीपीएपी) के अध्यक्ष गुलाम नबी आजाद और अवामी इत्तेहाद पार्टी (एआईपी) के प्रमुख तथा बारामुला के सांसद इंजीनियर शेख अब्दुल रशीद के नाम भी चर्चा में हैं। हालांकि, इन नेताओं के बीच किसी संयुक्त बैठक या साझा मंच के गठन को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
रुहुल्ला की पहल से बदला सियासी विमर्श
नेकां से अलग होने के बाद रुहुल्ला ने सिद्धांतों, जन अधिकारों और युवाओं की भागीदारी पर आधारित नए राजनीतिक आंदोलन की पैरवी की है। बडगाम में अपने संबोधन में उन्होंने जम्मू, कश्मीर और लद्दाख के युवाओं से सत्ता की राजनीति से आगे बढ़कर आम जनता के मुद्दों पर केंद्रित संघर्ष का हिस्सा बनने का आह्वान किया था।
उन्होंने तीन नवंबर के बाद संगठित आंदोलन शुरू करने की मंशा भी जाहिर की थी, लेकिन तत्काल राजनीतिक पार्टी बनाने से इन्कार किया था। उनका कहना था कि वह पहले से ही ऐसे लोगों के संपर्क में हैं, जो पुरानी राजनीतिक प्रतिबद्धताओं से मुक्त होकर नई राजनीतिक सोच को आगे बढ़ाने में योगदान दे सकें।
आजाद और इंजीनियर रशीद पर नजर
संभावित राजनीतिक पुनर्संयोजन में गुलाम नबी आजाद और इंजीनियर रशीद की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। दोनों के अपने राजनीतिक संगठन, समर्थक वर्ग और अलग-अलग राजनीतिक प्राथमिकताएं हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वे किसी साझा पहल का हिस्सा बनने को तैयार होते हैं। इस संभावित कवायद में युवा नेताओं, निर्दलीय आवाजों और जम्मू, कश्मीर तथा लद्दाख के प्रतिनिधियों को भी जोड़ने की चर्चा है।
नेकां की अंदरूनी हलचल भी अहम
दूसरी ओर, नेकां के भीतर भी राजनीतिक गतिविधियां तेज हैं। करीब दस विधायकों की फारूक शाह के हैदरपोरा स्थित आवास पर हुई बैठक ने पार्टी में असंतोष की अटकलों को बल दिया है। वहीं, विधायकों सलमान सागर और सज्जाद शहीन की प्रस्तावित प्रेस वार्ता पर भी नजरें टिकी हैं।
फिलहाल किसी नए राजनीतिक मोर्चे के गठन की औपचारिक घोषणा नहीं हुई है। यदि ऐसी पहल आगे बढ़ती है तो उसके सामने वैचारिक मतभेदों, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और नेतृत्व की संरचना को लेकर चुनौतियां होंगी।
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