उमर अब्दुल्ला की नई कैबिनेट में घाटी का पलड़ा भारी, जम्मू फिर हाशिये पर; 9 में से 7 मंत्री कश्मीर से बने
उमर अब्दुल्ला की नई कैबिनेट विस्तार में कश्मीर घाटी का पलड़ा भारी रहा, जबकि जम्मू प्रांत को हाशिये पर धकेल ...और पढ़ें

शपथ ग्रहण समारोह के दौरान चार नए कैबिनेट मंत्री।
HighLights
उमर कैबिनेट में चार नए मंत्री, सभी कश्मीर घाटी से।
जम्मू के सतीश शर्मा को हटाया, क्षेत्रीय संतुलन बिगड़ा।
जम्मू संभाग के आठ जिलों को कैबिनेट में जगह नहीं।
नवीन नवाज, श्रीनगर। केंद्र शासित जम्मू कश्मीर प्रदेश की पहली निर्वाचित सरकार के मंत्रिमंडल में हुए पहले विस्तार ने एक बार फिर क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व की बहस को केंद्र में ला दिया है। 16 अक्टूबर 2024 को मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने के बाद उमर अब्दुल्ला ने अपनी कैबिनेट में पहली बार हुए इस विस्तार में चार नए चेहरों को जगह दी, लेकिन जम्मू प्रांत की हिस्सेदारी बढ़ाने के बजाय घटा दी। परिवहन मंत्री सतीश शर्मा को मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखाए जाने के बाद जम्मू के मैदानी इलाकों से लेकर उधमपुर-रियासी और चिनाब घाटी तक का प्रतिनिधित्व कैबिनेट से समाप्त हो गया है।
जम्मू संभाग से अब मंत्रिमंडल में केवल उपमुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी और जावेद अहमद राणा बचे हैं, दोनों राजौरी-पुंछ क्षेत्र से आते हैं। मुख्यमंत्री के इस फैसले ने मंत्रिमंडल के क्षेत्रीय संतुलन पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
घाटी के विभिन्न क्षेत्रों को प्रतिनिधित्व देने के लिए चार नए मंत्रियों को शामिल किया गया, लेकिन जम्मू प्रांत के किसी नए नेता को जगह नहीं मिली। उलटे, छंब से निर्दलीय विधायक सतीश शर्मा की विदाई के साथ जम्मू के मैदानी क्षेत्र की कैबिनेट में मौजूदगी भी खत्म हो गई। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि प्रदेश की सरकार में जम्मू के उन क्षेत्रों की आवाज कितनी प्रभावी रह गई है, जहां से नेशनल कॉन्फ्रेंस को विधानसभा चुनाव में अपेक्षित राजनीतिक समर्थन नहीं मिला।
घाटी के चार नए चेहरे, जम्मू के लिए खाली हाथ
मंगलवार को लोकभवन में आयोजित समारोह में उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने चार नए मंत्रियों को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई। इनमें सात बार के विधायक अली मोहम्मद सागर, शमीमा फिरदौस, मीर सैफुल्ला और अल्ताफ अहमद वानी उर्फ अल्ताफ अहमद कालू शामिल हैं। अली मोहम्मद सागर और मीर सैफुल्ला पहले भी मंत्री रह चुके हैं।
श्रीनगर के खानयार से विधायक अली मोहम्मद सागर और हब्बाकदल से विधायक शमीमा फिरदौस मध्य कश्मीर का प्रतिनिधित्व करते हैं। उत्तरी कश्मीर के त्रेहगाम से विधायक मीर सैफुल्ला और दक्षिण कश्मीर के पहलगाम से विधायक अल्ताफ कालू को भी कैबिनेट में जगह मिली है। इस चयन से घाटी के अलग-अलग क्षेत्रों और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को साधने का प्रयास दिखाई देता है। शमीमा फिरदौस के शामिल होने से मंत्रिमंडल में महिला मंत्रियों की संख्या भी दो हो गई है।
कैबिनेट में जम्मू की भागीदारी दो मंत्रियों तक सिमटी
इस पूरी कवायद में जम्मू संभाग से किसी नए चेहरे को जगह नहीं मिली। सतीश शर्मा को हटाने के बाद कैबिनेट में जम्मू की भागीदारी दो मंत्रियों तक सिमट गई है। दोनों ही राजौरी-पुंछ क्षेत्र से हैं। न जम्मू के मैदानी इलाकों को प्रतिनिधित्व मिला, न उधमपुर-रियासी को और न ही रामबन, डोडा तथा किश्तवाड़ की चिनाब घाटी को।
जम्मू के दस में आठ जिले कैबिनेट से बाहर
मंत्रिमंडल की नई तस्वीर में जम्मू संभाग के दस जिलों में से आठ जिलों का कोई प्रतिनिधि नहीं है। जम्मू, सांबा, कठुआ, उधमपुर, रियासी, रामबन, डोडा और किश्तवाड़ को कैबिनेट में जगह नहीं मिली है। राजौरी और पुंछ से ही दोनों मंत्री मंत्रिपरिषद में शामिल हैं।
सतीश शर्मा के मंत्रिमंडल में रहने से छंब के जरिए जम्मू के मैदानी क्षेत्र की आवाज भी सरकार में मौजूद थी। उनकी विदाई के बाद यह प्रतिनिधित्व समाप्त हो गया। इसे केवल एक मंत्री की छुट्टी के रूप नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि विविध भौगोलिक और राजनीतिक परिस्थतियों वाले जम्मू कश्मीर में मंत्रिमंडल सरकार के लिए सिर्फ जिम्मेदारियों का बंटवारा नहीं होता, बल्कि यह बताता है कि सरकार के किन वर्गाें को निर्णायक बना रही है। इसलिए मौजूदा विस्तार प्रदेश में विशेषकर जम्मू प्रांत में एक नयी राजनीतिक बहस को गति देगा।
नौ सदस्यीय मंत्रिपरिषद में सात मंत्री घाटी से
90 सदस्यीय जम्मू-कश्मीर विधानसभा के लिए लागू संवैधानिक प्रावधानों के तहत मुख्यमंत्री सहित मंत्रिपरिषद में अधिकतम नौ सदस्य हो सकते हैं। उमर अब्दुल्ला ने सरकार बनने के समय पांच सदस्यीय मंत्रिमंडल का गठन किया था और तीन पद रिक्त रखे थे। इनमें एक पद कांग्रेस के लिए माना जा रहा था, जिसने राज्य का दर्जा बहाल होने तक मंत्रिमंडल में शामिल नहीं होने का फैसला किया था।
अब चार नए मंत्रियों को शामिल करने और सतीश शर्मा को हटाने के बाद मंत्रिपरिषद की कुल संख्या नौ हो गई है। नई संरचना में मुख्यमंत्री समेत सात मंत्री कश्मीर संभाग से और दो जम्मू संभाग से हैं। जम्मू के दोनों मंत्री राजौरी-पुंछ से होने के कारण संभाग के बाकी क्षेत्रों की प्रत्यक्ष भागीदारी नहीं रह गई है।
मुख्यमंत्री ने विस्तार में कश्मीर घाटी में दो-दो के फार्मूले को अपनाते हुए अपने राजनीतिक हित साधने का प्रयास किया है। लेकिन जम्मू संभाग के विभिन्न इलाकों की सामाजिक संरचना, भौगोलिक जरूरतें और राजनीतिक प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं।
मैदानी जम्मू से लेकर पहाड़ी और दूरदराज के चिनाब क्षेत्र तक की समस्याओं को सरकार के भीतर उठाने के लिए क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में कैबिनेट में इन क्षेत्रों की अनुपस्थिति राजनीतिक विमर्श का स्वाभाविक विषय बन गई है।
घाटी के समीकरण साधे, शिया समुदाय को भी जगह नहीं
मंत्रिमंडल विस्तार में उमर अब्दुल्ला ने घाटी के विभिन्न क्षेत्रों और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को समायोजित करने की कोशिश की है। हालांकि, नए मंत्रियों की सूची में शिया समुदाय से किसी नेता को जगह नहीं मिली। इससे समुदाय के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर भी सवाल उठने लगे हैं।
मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार, लेकिन फैसले के राजनीतिक संदेश भी
राजनीतिक मामलों के जानकार तरुण उपाध्याय के अनुसार, मंत्रिमंडल का विस्तार मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार है और वह अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं के आधार पर मंत्रियों का चयन करते हैं। हालांकि, उनके मुताबिक, उमर अब्दुल्ला चाहते तो इस विस्तार में जम्मू संभाग को भी प्रतिनिधित्व दे सकते थे।
उपाध्याय के अनुसार, रामबन, बनिहाल, डोडा, किश्तवाड़ और रियासी क्षेत्र से किसी विधायक को मंत्री बनाने पर दूसरे निर्वाचित विधायकों में असंतोष पैदा होने की आशंका हो सकती थी। इसी तरह कठुआ जिले के बनी क्षेत्र से निर्वाचित निर्दलीय विधायक को भी कैबिनेट में जगह देने का विकल्प था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
उपाध्याय के मुताबिक, जम्मू के उन क्षेत्रों को प्रतिनिधित्व देने का विकल्प मौजूद था, लेकिन अंतिम चयन में घाटी के नेताओं को प्राथमिकता मिली। इससे यह बहस भी उठती है कि क्या जम्मू के उन इलाकों को सरकार के भीतर पर्याप्त स्थान मिल रहा है, जहां नेशनल कान्फ्रेंस की राजनीतिक स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर रही है
