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न भूस्खलन की फिक्र, ना बर्फबारी की टेंशन... जम्मू-श्रीनगर हाईवे पर बन रही खास सुरंग, कब तक पूरा होगा काम?

Published: Tue, 03 Nov 2026 10:32 AM (IST)

जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर डिगडोल-मरोग ट्विन ट्यूब टनल का निर्माण कार्य धीमा है, जो भूस्खलन से राहत देने के लिए ...और पढ़ें

फोटो एआई द्वारा जनरेट की गई है।

फोटो एआई द्वारा जनरेट की गई है।

HighLights

  1. डिगडोल-मरोग ट्विन ट्यूब टनल निर्माण गति धीमी

  2. परियोजना का केवल 36% काम अब तक पूरा हुआ

  3. भूस्खलन से राहत के लिए 2030 तक इंतजार करना होगा

राज्य ब्यूरो, श्रीनगर। जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएच-44) पर सफर करने वाले वाहन चालकों को भूस्खलन और पहाड़ों से गिरने वाले पत्थरों के खतरे से राहत मिलेगी। हालांकि, इसमें थोड़ा समय लगेगा।

रामबन-बनिहाल मार्ग के सबसे संवेदनशील हिस्सों को सुरक्षित बनाने के लिए बनाई जा रही डिगडोल-मरोग ट्विन ट्यूब टनल का निर्माण चार साल से अधिक समय बीतने के बावजूद महज 36 प्रतिशत पूरा हुआ है।

मौजूदा रफ्तार जारी रही तो बैटरी चश्मा मोड़, मंकी मोड़ और अनोखीफॉल जैसे खतरनाक स्थानों से पूरी राहत के लिए वर्ष 2030 तक इंतजार करना पड़ सकता है।

2028 तक रखा गया लक्ष्य

भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) के परियोजना निदेशक शुभम यादव ने बताया कि जम्मू की ओर जाने वाली टनल को दिसंबर 2028 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है, जबकि दोनों ट्यूब का निर्माण 2029 के अंत तक पूरा करने की योजना है। हालांकि, परियोजना से जुड़े अधिकारियों का मानना है कि काम की मौजूदा गति रही तो समयसीमा 2030 तक खिसक सकती है।

सुंरग की लंबाई 4.38 KM

करीब 4.38 किलोमीटर लंबी इस परियोजना का ठेका नवंबर 2021 में दिया गया था और अगस्त 2022 में निर्माण शुरू हुआ था। इसे अगस्त 2025 तक पूरा किया जाना था, लेकिन समयसीमा चूकने के बाद लक्ष्य 30 जून 2027 कर दिया गया। अब तक केवल 36 प्रतिशत काम पूरा होने से इस समयसीमा पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

परियोजना में जम्मू और श्रीनगर की ओर जाने के लिए दो अलग-अलग ट्यूब, दोनों तरफ एप्रोच रोड और अतिरिक्त 0.6 किलोमीटर का हिस्सा शामिल है। इसके पूरा होने से लगभग पांच किलोमीटर के संवेदनशील हाईवे हिस्से को बाइपास किया जा सकेगा।

बारिश, बाढ़ और निर्माण में देरी बनी बाधा

रामबन-बनिहाल मार्ग पर वर्ष 2015 में फोरलेन निर्माण शुरू हुआ था। शुरुआती चरण में बड़े पैमाने पर पहाड़ों की कटाई की गई, जिससे ढलान कमजोर हुए और भूस्खलन की घटनाएं बढ़ीं।

अधिकारियों ने जमीन की बनावट और पर्यावरण की जांच में कमियों और ढलानों को स्थिर करने के अपर्याप्त इंतजामों को भी समस्या की वजह बताया। इसी कारण कई स्थानों पर सड़क की प्रस्तावित दिशा बदलकर सुरंगों और पुलों के माध्यम से सुरक्षित रास्ता तैयार करने का फैसला हुआ।

परियोजना की धीमी रफ्तार के पीछे कठिन जमीन की बनावट, ठेकेदार की सुस्ती, मशीनरी और श्रमिकों की तैनाती में देरी, स्थानीय बाधाएं तथा बेमौसम बारिश जैसे कारण भी गिनाए गए हैं।

वर्ष 2025 में भारी बारिश, बादल फटने और अचानक आई बाढ़ ने भी निर्माण प्रभावित किया। अप्रैल में भूस्खलन और सड़क बहने से हाईवे तीन सप्ताह से अधिक समय बंद रहा, जबकि अगस्त-सितंबर में भी यातायात बाधित हुआ। इसका असर कश्मीर की आपूर्ति और सेब से लदे ट्रकों की आवाजाही पर पड़ा।

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कई संवेदनशील स्थानों को किया जा रहा बाईपास

रामबन-बनिहाल सेक्शन में खतरनाक स्थानों से बचने के लिए सुरंगों, ऊंचे पुल, फ्लाईओवर और पुलों का सहारा लिया जा रहा है। पंथियाल-डिगडोल और पंथियाल-खूनी नाला ट्विन ट्यूब सुरंगों का काम भी अंतिम चरण के करीब बताया जा रहा है।

शैतानी नाला को काजीगुंड-बनिहाल मार्ग के 2022 में पूरा होने के बाद बाइपास किया जा चुका है। दलवास के चिह्नित स्लाइडिंग जोन में 2.2 किलोमीटर सुरंग और ऊंचे पुल का काम दिसंबर 2025 में पूरा किया गया था।

जम्मू-श्रीनगर हाईवे की फोरलेन परियोजना के छह प्रमुख हिस्सों में से अधिकांश पर यातायात शुरू हो चुका है। इनमें श्रीनगर-काजीगुंड, काजीगुंड-बनिहाल, बनिहाल-रामबन, रामबन-ऊधमपुर, चिनैनी-नाशरी और जम्मू-ऊधमपुर शामिल हैं। अब सबसे कठिन रामबन-बनिहाल सेक्शन का शेष काम बड़ी चुनौती बना हुआ है।

आपको बता दें कि वर्ष 2011 में शुरू हुई पूरी फोरलेन परियोजना का उद्देश्य जम्मू और श्रीनगर के बीच सड़क दूरी करीब 50 किलोमीटर घटाना और यात्रा समय लगभग नौ घंटे से चार घंटे करना है।

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