Trending

    Move to Jagran APP
    pixelcheck
    विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

    Kashmir News : पीडीपी युवा इकाई प्रधान वहीद परा एक साल बाद एमसीसी उल्लंघन के आरोप से मुक्त

    Updated: Sat, 05 Jul 2025 07:49 PM (IST)

    पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के वहीद उर रहमान परा के खिलाफ आदर्श आचार संहिता उल्लंघन का मामला अदालत ने खारिज कर दिया है। अदालत ने कहा कि बिना अनुमति रोड शो करने के आरोप में धारा 188 के तहत मामला दर्ज किया गया था लेकिन दंड प्रक्रिया संहिता के तहत यह जरुरी है कि किसी सरकारी अधिकारी द्वारा औपचारिक शिकायत की जाए जो कि नहीं की गई।

    Hero Image
    अदालत ने कहा कि पारा पर लगे आदर्श आचार संहिता को वैधानिक समर्थन प्राप्त नहीं है।

    राज्य ब्यूरो,जागरण, श्रीनगर। पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की युवा इकाई के प्रधान और पुलवामा के विधायक वहीद उर रहमान परा के खिलाफ आदर्श आचार संहिता एमसीसी) के कथित उल्लंघन का मामला अदालत ने खारिज कर दिया है।

    वहीद उर रहमान परा ने विधानसभा चुनाव से पहले श्रीनगर-बडगाम संसदीय सीट के लिए वर्ष 2024 में चुनाव लड़ा था और उसी दौरान 27 अप्रैल को उनके खिलाफ बिना अनुमति पुलवामा में रोड शो करने के आरोप में आईपीसी की धारा 188 के तहत मामला दर्ज किया गया था।

    विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

    अतिरिक्त विशेष मोबाइल मैजिस्ट्रेट अवंतीपोर, मुनीर अहमद बट की अदालत मे गत शुक्रवार को इस मामले की सुनवाई की। अदालत ने पुलिस चालान काे खारिज करते हुए कहा कि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 188 के तहत कोई संज्ञान नहीं लिया जा सकता है क्योंकि किसी भी सरकारी अधिकारी द्वारा औपचारिक शिकायत नहीं की गई है, जबकि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 195(1)(ए)(आई) के तहत यह जरुरी है।

    अदालत ने अपने निर्णय में चालान खारिज करते हुए आरोपित के जमानत बांड और व्यक्तिगत बांड को खारिज किया जाता है। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि किसी भी जब्त किए गए दस्तावेज़ या लेख को अपीलीय अदालत के किसी भी निर्देश के अधीन व्यक्तिगत बांड के निष्पादन पर सही मालिक को वापस कर दिया जाए।

    अदालत ने कहा कि आदर्श आचार संहिता को वैधानिक समर्थन प्राप्त नहीं है और इसे आईपीसी की धारा 188 के अर्थ में "आदेश" के रूप में नहीं माना जा सकता है। अदालत ने कहा कि आदर्श आचार संहिता केवल पार्टियों और उम्मीदवारों के लिए मार्गदर्शन के रूप में कार्य करती है... इसमें वैधानिक समर्थन का अभाव है और इसके कई प्रावधान कानूनी रूप से लागू करने योग्य नहीं हैं।

    महत्वपूर्ण बात यह है कि मजिस्ट्रेट ने कहा कि भले ही आदर्श आचार संहिता को धारा 188 के तहत एक आदेश के रूप में स्वीकार कर लिया जाए, लेकिन आरोप सही नहीं होंगे, क्योंकि शिकायत सक्षम प्राधिकारी द्वारा दर्ज नहीं की गई थी।

    अदालत ने कहा, "आचार संहिता स्वयं यह निर्दिष्ट नहीं करती कि किस लोक सेवक ने यह आदेश जारी किया है। धारा 188 आईपीसी के तहत किसी अपराध का संज्ञान केवल उस लोक सेवक की शिकायत पर लिया जा सकता है जिसके आदेश का उल्लंघन किया गया था या उसके वरिष्ठ अधिकारी की।

    एमसीसी जारी करने वाले संवैधानिक प्राधिकरण के रूप में भारत के चुनाव आयोग की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए, अदालत ने रेखांकित किया कि "किसी भी अभियोजन को आदर्श रूप से चुनाव आयोग की शिकायत पर ही आधारित होना चाहिए।

    अदालत ने निष्कर्ष निकाला, "चूंकि तत्काल चालान लिखित शिकायत के बिना है, इसलिए सीआरपीसी की धारा 195 की आवश्यकताएं पूरी नहीं होती हैं, जिससे अभियोजन केवल एक औपचारिकता बन जाता है।"