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    जम्मू-कश्मीर में इंजीनियर रशीद की रणनीति से बौखलाईं सभी पार्टियां, समझें कैसे बदल सकता है घाटी में चुनावी गणित

    Updated: Tue, 17 Sep 2024 05:19 PM (IST)

    Jammu and Kashmir Elections 2024 जम्मू-कश्मीर में 18 सितंबर को पहले चरण का मतदान होना है। चुनाव से पहले बीते रविवार को बारामूला सासंद इंजीनियर रशीद ने प्रतिबंधित पार्टी जमात-ए-इस्लामी के सदस्यों से हाथ मिला लिया। ऐसे में इस नए गठबंधन ने अन्य पार्टियों की टेंशन बढ़ा दी है। घाटी में नेकां और पीडीपी का गठबंधन के कारण वोट बैंक खिसक सकता है।

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    इंजीनियर रशीद के आने से घाटी में चुनावी समीकरण बदल गए हैं।

    जेएनएन, श्रीनगर। Jammu Kashmir Election 2024: जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव के लिए 18 सितंबर को पहले चरण का मतदान होना है। पहले फेज में 24 सीटों पर वोटिंग होंगी। खास बात है कि इस चुनाव में बारामूला संसदीय सीट से सांसद इंजीनियर रशीद (Engineer Rashid's strategy) ने अन्य पार्टियों व राजनेताओं की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।

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    दरअसल, इंजीनियर रशीद की पार्टी अवामी इत्तिहाद पार्टी (AIP) ने बीते रविवार को प्रतिबंधित जमात-ए-इस्लामी के सदस्यों के साथ गठजोड़ कर लिया है। ऐसे में चुनावी प्रक्रिया (J&K Elections 2024) के बीच राजनीतिक समीकरण बन-बिगड़ रहे हैं।

    दोनों के एक साथ आने से जम्मू-कश्मीर में क्या सियासी बदलाव हो सकते हैं और पार्टियों के लिए क्या चुनौतियां सामने आ सकती हैं। आइए, इनके बारे में विस्तार से जानते हैं।

    रशीद की रिहाई से बदला माहौल

    पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) की चुनाव से पहले परेशानी बढ़ गई है। अब अवामी इत्तेहाद पार्टी का जमात-ए-इस्लामी के नेताओ से गठबंधन है। रशीद का मुकाबला लोकसभा चुनाव के दौरान बारामूला संसदीय सीट से नेकां उपाध्यक्ष उमर अब्दुल्ला से था।

    रशीद ने उन्हें एक लाख से भी ज्यादा वोटों से शिकस्त दी थी। उस दौरान रशीद जेल से चुनाव लड़े थे। अब वह अंतरिम जमानत पर जेल से बाहर हैं और घाटी में उनका प्रभुत्व देखा जा सकता है। ऐसे में उनके बढ़ते दबदबे और प्रसिद्धी के बीच अन्य पार्टियों में तनाव है।

    जमात-ए-इस्लामी से किया इत्तेहाद पार्टी ने गठबंधन

    इंजीनियर रशीद अवामी इत्तेहाद पार्टी के चीफ हैं। उन्होंने प्रतिबंधित संगठन जमात-ए-इस्लामी के सदस्यों के साथ गठबंधन किया है। जमात-ए-इस्लामी ने 1987 के बाद से कोई विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा। लेकिन इस बार पार्टी ने घाटी में सात उम्मीदवराों को उतारा है। अब जमात-ए-इस्लामी के साथ रशीद भी है। ऐसे में अन्य पार्टियों के लिए टेंशन हैं कि कहीं ये गठबंधन सियासी समीकरणों को न बिगाड़ दे।

    नेकां और पीडीपी का वोट बैंक खिसक सकता है

    पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की पकड़ दक्षिण कश्मीर में काफी मजबूत मानी जाती है। यह इसलिए भी क्योंकि पीडीपी को हमेशा से ही जमात का समर्थन मिलता रहा है।

    अब क्योंकि जमात के प्रत्याशी खुद मैदान में हैं। ऐसे में पीडीपी का वोट बैंक प्रभावित हो सकता है। वहीं, गठबंधन से उत्तरी और मध्य कश्मीर में भी नेकां की चुनौती बढ़ गई है। इंजीनियर रशीद जब से जेल से बाहर आए हैं, घाटी में उनका दबदबा इस बात की ओर इशारा कर रहा है।

    नए गठबंधन ने दी नई टेंशन

    गठबंधन मे तय हुआ कि जिन विधानसभा क्षेत्रों में दोनों संगठनों के प्रत्याशी मैदान में हैं, वहां वह दोस्ताना मुकाबला लड़ेंगे और जिन क्षेत्रों में एक ही संगठन का प्रत्याशी है, वहां दूसरा उसका साथ देगा। चुनाव से ऐन मौके पर अपनाई गई गठबंधन की इस रणनीति ने अन्य पार्टियों को सोचने-विचारने का भी समय नहीं दिया है।

    कश्मीर में पनपेगा अलगाववाद: रमीज मखदूमी

    दोनों पक्षों ने कश्मीर मुद्दे को हल करने और क्षेत्र में स्थायी और सम्मानजनक शांति को बढ़ावा देने में एकता के महत्व पर जोर दिया। इस संबंध में कश्मीर मामलों के जानकार रमीज मखदूमी ने कहा कि रशीद की पार्टी और प्रतिबंधित जमात का यह गठजोड़ उन्हें चुनाव में लाभ पहुंचाए या न पहुंचाए, लेकिन जम्मू कश्मीर की राजनीति में इस्लामिक कट्टरवाद और अलगाववाद की राजनीति को जड़ें जमाने का मौका देगा।

    उन्होंने कहा कि यह जम्मू-कश्मीर में अलगाववाद की समाप्त होती विचारधारा को फिर से गति दे सकता है। इस गठजोड़ के बाद कई राजनीतिक दल रशीद की रिहाई को साजिश बताने से नहीं चूकेंगे।

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