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NC में 50 साल की सबसे बड़ी बगावत, आज सांसद पद और पार्टी छोड़ेंगे आगा रुहुल्ला; CM उमर संभाल पाएंगे संकट?

By Naveen SharmaEdited By: Prince Sharma
Published: Tue, 03 Nov 2026 11:03 AM (IST)

आगा सैयद रुहुल्ला मेहदी नेशनल कॉन्फ्रेंस और लोकसभा सदस्यता से इस्तीफा देने वाले हैं, जिससे पार्टी में 50 साल का सबसे बड़ा संकट खड़ा हो गया है।

फारूर अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और आगा सैयद (फाइल फोटो)

फारूर अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और आगा सैयद (फाइल फोटो)

HighLights

  1. आगा रुहुल्ला 3 नवंबर को नेकां और सांसद पद छोड़ेंगे।

  2. पार्टी पर वादों से मुकरने और भाजपा से गठबंधन का आरोप।

  3. उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व के लिए यह बड़ी राजनीतिक परीक्षा।

नवीन नवाज, श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर की राजनीति में आगा सैयद रुहुल्ला मेहदी का त्यागपत्र केवल नेशनल कॉन्फ्रेंस (नेकां) में ही उथल-पुथल का कारण नहीं है, यह स्वयं उनके राजनीतिक भविष्य की भी बड़ी परीक्षा साबित हो सकता है।

रुहुल्ला पार्टी नेतृत्व से मतभेद के चलते तीन नवंबर को लोकसभा की सदस्यता और पार्टी से इस्तीफा देने वाले हैं। त्यागपत्र से पहले उन्होंने बड़गाम में पिता की बरसी पर एक रैली का आयोजन किया है।

उनका त्यागपत्र कई मायने में अहम है। लगातार नेकां नेतृत्व के लिए चुनौती बने रुहुल्ला ऐसे समय में पार्टी नेतृत्व से किनारा कर रहे हैं, जब मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला व पार्टी नेतृत्व को अपने विधायकों की नाराजगी झेलनी पड़ रही है। ऐसे में उनका त्यागपत्र सत्ताधारी नेशनल कॉन्फ्रेंस पार्टी नेतृत्व की मुश्किल बढ़ाने वाला होगा।

स्वतंत्रता के बाद से आज तक नेकां ने कई झटके झेले पर वह बार-बार इस चुनौती को पार पाने में सफल रही। पहली बार उमर के समक्ष पार्टी को इस संकट से उबारने का जिम्मा है। बीते 50 वर्ष में पहली बार पार्टी नेतृत्व को खुलेआम चुनौती मिली है।

वादों से पीछे हटने का आरोप

रुहुल्ला की नाराजगी की जड़ 2024 के चुनावों में नेशनल कॉन्फ्रेंस द्वारा किए गए वादे हैं। उनके मुताबिक, पार्टी ने भाजपा के खिलाफ जम्मू-कश्मीर के लोगों के अधिकारों की रक्षा, पूर्ववर्ती राज्य का दर्जा और विशेष संवैधानिक स्थिति बहाल करने और आरक्षण नीति में बदलाव जैसे वादे किए थे पर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली सरकार ने सत्ता में आने के बाद इन्हें भुला दिया और मुख्यमंत्री की कुर्सी के लालच में नेकां ने कश्मीर में यथास्थिति बनाए रखने में मदद की।

नेकां और भाजपा अब राजनीतिक एवं वैचारिक विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे की सहयोगी हैं। वह चाहते हैं कि राज्य के दर्जे के साथ अनुच्छेद 370 और 35-ए का मुद्दा भी पार्टी उठाए।

सैफुद्दीन सोज और देवेंद्र राणा अपना प्रभाव कायम रख पाए

हालांकि, सैफुद्दीन सोज ने नेकां छोड़कर कांग्रेस में महत्वपूर्ण राजनीतिक मुकाम हासिल किया और केंद्र सरकार में भी जिम्मेदारियां निभाईं। देवेंद्र सिंह राणा इसका एक और महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।

जम्मू में नेकां के प्रमुख चेहरों और पार्टी के प्रांतीय अध्यक्ष रहे राणा ने 2021 में सुरजीत सिंह सलाथिया के साथ पार्टी छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया।

उन्होंने 2024 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के टिकट पर नगरोटा से जीत दर्ज की और 30,472 वोटों के अंतर से अपने प्रतिद्वंद्वी को हराया। राणा का उदाहरण बताता है कि किसी स्थापित पार्टी को छोड़ने के बाद भी नेता अपना राजनीतिक प्रभाव बनाए रख सकता है, खासकर जब उसे दूसरी राजनीतिक पार्टी का संगठनात्मक समर्थन मिले।

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बड़े विद्रोह, लेकिन पार्टी कायम

नेशनल कॉन्फ्रेंस का इतिहास बताता है कि उससे अलग होने वाले कई बड़े नेता अपनी अलग पहचान कायम नहीं रख सके। मिर्जा अफजल बेग इसका उदाहरण हैं। शेख अब्दुल्ला के करीबी सहयोगी रहे बेग ने 1978 में मतभेदों के बाद उपमुख्यमंत्री पद छोड़ा और बाद में इंकलाबी नेशनल कन्फ्रेंस बनाई।

लेकिन उनका संगठन बड़ी राजनीतिक ताकत नहीं बना। शमीम अहमद शमीम और अब्दुल रशीद काबली जैसे प्रभावशाली नेता भी पार्टी से अलग होने के बाद वैसी पार्टी खड़ी नहीं कर पाए।

1984 में गुलाम मोहम्मद शाह की बगावत ने नेकां को सबसे बड़ी चुनौती दी। शाह मुख्यमंत्री बने, लेकिन उनकी सरकार 1986 में गिर गई। गुलाम हसन मीर और दिलावर मीर भी नेकां का राजनीतिक प्रभाव खत्म नहीं कर सका।

रुहुल्ला के 3.56 लाख वोट

2024 के लोकसभा चुनाव में श्रीनगर सीट से रुहुल्ला की बड़ी जीत उनकी लोकप्रियता का पैमाना बताती है। उन्हें 3,56,866 वोट मिले और यह आज तक के इतिहास में श्रीनगर सीट से किसी भी प्रत्याशी को सबसे अधिक वोट हैं और 1,88,416 वोट से जीत दर्ज की।

रुहुल्ला समर्थक इसे उनकी लोकप्रियता बताते हैं और नेकां समर्थक संगठन, चुनाव चिह्न और दशकों से बने राजनीतिक प्रभाव का परिणाम? 2024 के विस चुनाव में नेशनल कान्फ्रेंस ने 90 में से 42 सीटें जीतीं। लेकिन रुहुल्ला की नाराजगी के कारण बडगाम सीट उपचुनाव में नेकां के हाथ से निकल कर पीडीपी के हाथ चली गई।

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