जम्मू, नवीन नवाज। वसुधैव कुटुम्बकम... संस्कृत में लिखे इस आदर्श वाक्य से हम भारत की महानता प्रकट करते हैं, लेकिन बहुत कम लोगों को पता होगा कि सदियों पुराने इस कथन के रचयिता कवि उद्भटाचार्य जिन्हें उद्भट भी कहा जाता है, ही हैं। उनका कश्मीर में जन्म हुआ और यह वाक्य भी कश्मीर में ही रचा गया। नीलमत पुराण भी संस्कृत में और वह भी कश्मीर में ही लिखा गया। इसलिए भारत की सदियों पुरानी संस्कृति और सभ्यता जहां कश्मीर से बंधी है, वहीं जम्मू कश्मीर की संस्कृति को जानने और समझने के लिए संस्कृत को जानना-समझना जरूरी है।

कश्मीर विश्वविद्यालय में संस्कृत विभाग में सहायक प्रोफेसर केसी शर्मा ने दैनिक जागरण इस बारे में विस्तार से बातचीत की। उन्होंने कहा कि जम्मू कश्मीर और संस्कृत का नाता तभी से है जबसे यह भाषा है। कोई भी प्राचीन ग्रंथ लें, उसका कश्मीर से नाता जरूर है। हमारे कई प्राचीन धर्मग्रंथों में कश्मीर का उल्लेख मिलता है। यहां 14वीं सदी तक संस्कृत राजभाषा थी। कश्मीरी और संस्कृत दोनों ही शारदा लिपि में लिखी जाती थी। यहां विद्वानों के बीच विचार-विमर्श संस्कृत में होता था। यहां दर्शन, काव्य और श्रृंगार रस पर कई ग्रंथ लिखे गए जो संस्कृत में ही हैं। कवि कुंतक कश्मीर में ही हुए हैं। अलंकार, रीति और ध्वनि काव्य के रचयिता आचार्य भामा, वामन और आनंदवर्धन कश्मीर के ही थे। कश्मीर में रिंचेन शाह के सत्तासीन होने के बाद संस्कृत का प्रभाव घटा और मुस्लिम शासकों के प्रभावी होने के बाद यहां फारसी का चलन बढ़ा।

केसी शर्मा कहा कि नीलमत पुराण का संबंध भी कश्मीर से ही है। इस पुराण के आधार पर ही हम भारत के पौराणिक इतिहास और उसकी भौगोलिक परिस्थितियों को समझते हैं। यह रामायण और महाभारत काल में कश्मीर और भारत के रिश्तों की पुष्टि भी करता है। दुनिया में अगर किसी स्थान विशेष का कोई प्रमाणिक लिखित इतिहास है तो वह कश्मीर का है, जिसे हमें राजतरंगिनी कहते हैं। कवि कल्हण ने इसे संस्कृत में ही लिखा है और कई जगह उन्होंने इसमें नीलमत पुराण का भी उल्लेख किया है। बाद में जोनराजा ने उनके इस कार्य को आगे बढ़ाया।

केसी शर्मा ने कहा कि ज्योतिष शास्त्र के प्रवर्तक लगध मुनि, बौद्ध दार्शनिक रविगुप्त, मनुस्मृति के टीकाकार मेधातिथी, गणितज्ञ उत्पल, संगीतशास्त्री शारंग देव भी कश्मीर ही जन्मे हैं या फिर कश्मीर से संबंधित रहे हैं। शैवदर्शन की दो प्रमुख विचारधाराएं प्रत्यभिज्ञा दर्शन और सिद्धांत शैव को कश्मीर की ही देन माना जाता है। महान संत और दार्शनिक अभिनव गुप्त भी कश्मीर में ही हुए हैं । क्षेमेंद्र कश्मीरी थे। वह संस्कृत के विद्वान और प्रतिभा संपन्न कवि थे। क्षेमेंद्र ने तंत्रशास्त्र के विद्वान अभिनव गुप्त से साहित्यशास्त्र का अध्ययन किया था। वह परिहास कथा के धनी थे और संस्कृत में आज तक उनके बराबर को कोई दूसरा परिहास कथा लेखक नहीं हुआ है। प्रो. केसी शर्मा ने कहा कि कश्मीर और संस्कृत दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे हैं।

सम्राट अशोक का भी कश्मीर से नाता

कश्मीर के साहित्यकार हसरत गड्डा ने कहा कि सम्राट अशोक का भी कश्मीर से नाता रहा है। उनके शासनकाल में यहां बौद्ध धर्म आया, लेकिन जहां तक मैंने पढ़ा है, उसके आधार पर कह रहा हूं कि यहां बौद्ध धर्म से जुड़े कई ग्रंथ और उसकी शिक्षाएं संस्कृत में ही लिखी गई हैं। जम्मू कश्मीर की भौगोलिक परिस्थितियों के आधार पर यही वह क्षेत्र है जहां से संस्कृत का प्रचार प्रसार ईरान-ईराक तक हुआ है। यहां संस्कृत पढ़ने के लिए दूर दूर से छात्र आते थे। यहां शारदापीठ के पास एक विश्वविद्यालय था जो संस्कृत और अध्यात्म का एक बड़ा केंद्र था। कुछ इतिहासकारों के मुताबिक, चीनी यात्री ह्वेनसांग ने कश्मीर में रहकर ही संस्कृत के माध्यम से ही बौद्ध धर्म और यहां की संस्कृति-सभ्यता का अध्ययन किया था।

आदि शंकराचार्य भी आए थे अध्ययन करने

कश्मीर के वरिष्ठ कवि जरीफ अहमद जरीफ ने कहा कि कश्मीर को कभी शारदा देश कहा जाता था। यहां आदि शंकराचार्य भी अध्ययन के लिए आए थे। बड़गाम में कुछ पुरानी गुफाओं में अभिनव गुप्त ने तपस्या की है। यह संस्कृत का एक बड़ा केंद्र रहा है। यहां इस्लाम के आने के बाद संस्कृत का प्रभाव घटा है। कश्मीर के सभी पुराने ग्रंथ बताते हैं कि यह संस्कृत का एक बड़ा केंद्र था और मैं कह सकता हूं कि अपने समय में कश्मीर में संस्कृत आम लोगों में बहुत लोकप्रिय रही होगी। आमजन इसे अच्छी तरह समझता और बोलता होगा, तभी तो यहां कविता, नाटक, गीत संगीत के ग्रंथ संस्कृत में लिखे गए हैं।

कश्मीर विश्वविद्यालय में दो दर्जन छात्र कर रहे संस्कृत का अध्ययन

प्रो. केसी शर्मा ने कहा कि डोगरा शासकों में महाराजा रणबीर सिंह ने जम्मू कश्मीर में संस्कृत को दोबारा प्रतिष्ठा दिलाने का प्रयास किया। उन्होंने इसके लिए गुरुकुल स्थापित कराया था। कश्मीर विश्वविद्यालय में जो हालात रहे हैं, उससे संस्कृत की पढ़ाई प्रभावित हुई है। आज हमारे पास यहां दो दर्जन के करीब छात्रों के अलावा आठ शोधार्थी हैं।

एक अंग्रेज विद्वान जार्ज बुहलेर ने अपनी कश्मीर यात्रा के संस्मरणों में लिखा है कि कश्मीर में उनकी एक दर्जन से ज्यादा संस्कृत के प्रकांड पंडितों से मुलाकात की। यहां कई ऐसे सरकारी अधिकारी थे जो संस्कृत में कामकाज को भी बखूबी समझ लेते थे। आप जम्मू कश्मीर का पूरा इतिहास पढ़ें, यहां जो ग्रंथ रचे गए हैं, यहां पुरातत्व स्थलों से जो शिलालेख मिले हैं, उनमें भी कई संस्कृत में लिखे हुए हैं।-पंडित रोहित शास्त्री, संस्कृत के अध्येता 

Edited By: Vikas Abrol

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