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Jammu News: अब इस गांव में युद्ध की छाया नहीं, जगमग है आशा का आकाश

भारत-पाकिस्तान सीमा पर स्थित जम्मू-कश्मीर के सुचेतगढ़ गांव की कहानी सभी को प्रेरणा देती हुई प्रतीत होती है। यहां पर सीमांत गांवों के विकास की योजना से अब छवि बदल रही है। बॉर्डर टूरिज्‍म ने पर्यटन की राह खोली है तो बासमती ने यहां को विश्व में नई पहचान दी है। अब रोजगार के अवसर और सुविधाएं बढ़ने से जीवन स्तर बेहतर हो रहा है। पढ़िए डिटेल में।

By Jagran News Edited By: Monu Kumar Jha Published: Tue, 21 May 2024 06:43 PM (IST)Updated: Tue, 21 May 2024 06:43 PM (IST)
Jammu News: सीमांत गांवों के विकास की योजना से बदल रही सुचेतगढ़ गांव की तस्वीर।

दलजीत सिंह, आरएसपुरा (जम्‍मू)। पाकिस्‍तान सीमा से सटा छोटा सा गांव सुचेतगढ़। सीमा पर खेतों के साथ हुई तारबंदी और हर तरफ सीमाप्रहरियों की चौकस निगाहें बताती हैं क‍ि यहां का जीवन सहज नहीं रहा। दुश्‍मन की हर साजिश और पड़ोसी के धोखे को इस गांव के लोगों ने काफी करीब से महसूस किया है। पर आज जीरो लाइन पर गूंजते देशभक्‍त‍ि के तराने और उन पर थि‍रकते युवाओं की टोली को देखकर यह साफ है क‍ि दशकों तक युद्ध की छाया में रहे इस प्रथम गांव की तस्‍वीर बदली है।

पर्यटक सीमा तक पहुंच रहे हैं तो आधारभूत ढांचे का विकास हुआ है और सुविधाएं भी बढ़ी हैं। 1947 तक जम्‍मू-स‍ियालकोट के रेलवे ट्रैक के किनारे बसे छोटे से गांव सुचेतगढ़ की कहानी भी देश के अन्‍य गांवों से ज्‍यादा जुदा नहीं थी। पर देश के विभाजन के साथ ही सीमाएं खिंच गई और इस गांव ने रिश्‍तों को बंटते और लुटते देखा।

कबाइलियों के हमले के बाद जम्‍मू कश्‍मीर के महाराजा ने भारत में विलय की घोषणा के बाद इस प्रथम गांव के नागरिकों के कष्‍ट भी बढ़ गए। पाकिस्‍तान की क्षेत्र में अस्‍थ‍िरता पैदा करने की साजिशें और अकारण गोलाबारी के कारण यहां के लोगों ने तरह-तरह के कष्‍ट झेले। पर प्रथम मोर्चे पर वह बेखौफ हो डटे रहे।

पाकि‍स्‍तान की घुसपैठ की साजिशों को यहां के ग्रामीण प्रथम प्रहरी की तरह नाकाम बनाने में सुरक्षाबल के साथ खड़े दिखते हैं। दस वर्षों में देश के सीमावर्ती क्षेत्रों की स्थित‍ि किस तरह बदली है। यह करीब से समझना है तो जम्‍मू शहर से 28 किलोमीटर दूर सुचेतगढ़ गांव में पहुंचा जा सकता है। आज वास्तव में यह गांव और अधिक जीवंत हो रहा है।

एक दशक पहले तक सरहदी गांव सुचेतगढ़ आए दिन पाकिस्तानी गोलीबारी से छलनी होता था। सत्‍ता क्‍या बदली अब यह पयर्टकों के आकर्षण का केंद्र बन गया है। अब किसान बिनी किसी डर के अपनी फसल काट रहे हैं।

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रिट्रीट सेरेमनी से बढ़ा पर्यटकों का आकर्षण

वाघा बॉर्डर की तर्ज पर बीएसएफ की रिट्रीट सेरेमनी आरंभ होते ही इस गांव का माहौल और जीवंत हो गया। मां वैष्‍णो देवी की यात्रा और जम्‍मू में आने वाले पर्यटक अब सीमा पर इस अनोखे अनुभव का लाभ उठाने पहुंचने लगे हैं।

सीमांत क्षेत्रों का सड़क संपर्क मजबूत होने से उनकी राह आसान हो गई है। इस दौरान सरहद पर गूंजते देशभक्‍त‍ि के तराने पाक‍िस्‍तान के दिल को शायद छलनी कर जाते हैं, यही वजह है कि‍ वह यहां रिट्रीट सेरेमनी में शामिल होने को तैयार नहीं हुआ।

रंग भर सुनहरे सपने

आधारभूत योजनाएं जमीन पर उतरी और सीमांत क्षेत्रों का सड़क ढांचा मजबूत हुआ तो यहां के ग्रामीणों की आंखों में सुनहरे सपने उभरने लगे हैं। गांव की आबादी करीब 1300 है। यहां के जैवि‍क बासमती चावल की देश-दुनिया में मांग है। अब सीमा पर फायरिंग बंद होने से किसाने अपनी फसल आसानी से काट पा रहे हैं।

वाइब्रेंट विलेज के तहत सीमावर्ती गांवों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाने के प्रयास यहां दिख रहे हैं और पारंपरिक ज्ञान और विरासत को बढ़ावा देने का प्रयास किया जा रहा है। गांव में अधिकांश लोग किसान हैं या फ‍िर सेना में कार्यरत हैं। यहां स्‍थापित घराना वेटलैंड पक्षी प्रेमियों के आकर्षण का केंद्र हैं और देशभर से पक्षी प्रेमी प्रवासी पक्ष‍ियों के अध्‍ययन के लिए यहां पहुंचते हैं।

मॉडल विलेज के रूप में विकसित हो रहा सुचेतगढ़

पूर्व सरपंच स्वर्ण लाल भगत बताते हैं कि गांव का नाम सुचेतगढ़ डोगरा शासन के सेनापति सुचेत सिंह के नाम पर महाराजा ने उनके शौर्य से प्रभावति होकर रखा था। आज भी सुचेत सिंह की याद में जम्मू में स्मारक बना हुआ है।

सुचेतगढ़ गांव का महत्व इतना है कि जम्मू कश्मीर सरकार ने वर्ष 1996 में एक सीमांत विधानसभा का नाम इसके नाम पर रखा था। इसके बाद राजस्व तहसील, ब्लॉक का नाम भी सुचेतगढ़ गांव के नाम पर रखा था। गांव में एक सीमा सुरक्षा बल चौकी भी है जो वर्ष 1958 में तत्कालीन सरकार ने स्थापित की थी।

सरहद पर भी श्रीराम

सुचेतगढ़ गांव की मिट्टी में भी श्रीराम के नाम महक बिखेरी है। सूर्यवंशी डोगरा शासकों ने पूरे जम्‍मू कश्‍मीर में रघुनाथ मंदिरों का निर्माण कराया था। इनमें से एक मंदिर सुचेतगढ़ में भी बना है।

आजादी के पूर्व तक सभी रघुनाथ मंदिरों में एक साथ पूजा होती थी और जब इन मंदिरों में घंट‍ियां गूंजती थी जो पूरे माहौल को राममय कर देती है। रामनवमी के अवसर पर यहां विशेष आयोजन होता था और उस दौरान सियालकोट से लेकर आसपास के कई क्षेत्रों से लोग इस उत्‍सव में पहुंचते थे।

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