Jammu: 13 अगस्त को मनाई जाएगी श्री गुग्गा नवमी, जानिए इस दिन क्यों होती है गोगा जी की पूजा!
गुरू गोरखनाथ गोगामंडी के टीले पर तपस्या कर रहे थे। बाछल देवी उनकी शरण मे गईं तथा गुरू गोरखनाथ ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया और एक गुगल नामक फल प्रसाद के रूप में दिया।
जम्मू, जागरण संवाददाता: डोगरों के मुख्य पर्वों में से एक श्री गुग्गा नवमी का पर्व वीरवार 13 अगस्त को मनाया जाएगा। यह पर्व भाद्रपाद कृष्ण पक्ष की नवमी को मनाया जाता है। लोकमान्यता व लोककथाओं के अनुसार गोगा जी को साँपों के देवता के रूप में भी पूजा जाता है। लोग उन्हें गोगाजी, गुग्गा वीर, जाहिर वीर, राजा मण्डलिक अन्य नामों से पुकारते हैं। यह गुरु गोरख नाथ के प्रमुख शिष्यों में से एक थे। राजस्थान के छह सिद्धों में गोगाजी को समय की दृष्टि से प्रथम माना गया है।
श्री कैलख ज्योतिष एवं वैदिक संस्थान ट्रस्ट के प्रधान ज्योतिषाचार्य महंत रोहित शास्त्री ने बताया कि इस दिन जम्मू-कश्मीर में राजा मण्डलिक, राजा मण्डलिक के वजीर बाबा काली वीर, बावा सुरगल, मल माता अन्य कुलदेव स्थानों पर हवन यज्ञ, यात्र एवं भंडारा होता है। इस दिन श्रद्धालु इन देवस्थानों पर आकर न केवल धोक आदि लगाते हैं बल्कि वहां अखाड़े, ग्रुप में बैठकर इनकी और इनके शिष्य आदि की जीवनी के किस्से अपनी-अपनी भाषा में गाकर सुनाते हैं। प्रसंगानुसार जीवनी सुनाते समय वाद्य यंत्रों में ढोल, डैरूं व कांसी का कचौला विशेष रूप से बजाया जाता है। इस दौरान अखाड़े के श्रद्धालुओं में से एक जातरू अपने सिर व शरीर पर पूरे जोर से लोहे की सांकले मारता है।
गोगा नवमी के दिन होती है नागों की पूजा: गोगा देवता की पूजा करने से सांपों से रक्षा होती है। गोगा जी की पूजा श्रावण मास की पूर्णिमा यानी रक्षाबंधन के दिन से शुरू होती है। नौ दिनों तक यानी नवमी तक चलती है। इसलिए इसे गोगा नवमी भी कहा जाता है। गोगा नवमी के दिन नागों की पूजा करते हैं क्योंकि इन्हें सांपों का देवता माना गया है। गोगाजी राजस्थान के लोक देवता हैं। जिन्हे जहरवीर गोगा जी के नाम से भी जाना जाता है। जम्मू कश्मीर, पंजाब और हरियाणा समेत हिमाचल प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में इस पर्व को बहुत श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाया जाता है।
श्रीगुग्गा नवमी की मान्यता: श्रीगुग्गा नवमी की ऐसी मान्यता है कि पूजा स्थल की मिट्टी को घर पर रखने से सर्प भय से मुक्ति मिलती है। राजस्थान के महापुरूष गोगाजी का जन्म गुरू गोरखनाथ के वरदान से हुआ था। गोगाजी की माँ बाछल देवी निःसंतान थी। संतान प्राप्ति के सभी यत्न करने के बाद भी संतान सुख नहीं मिला। गुरू गोरखनाथ गोगामंडी के टीले पर तपस्या कर रहे थे। बाछल देवी उनकी शरण मे गईं तथा गुरू गोरखनाथ ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया और एक गुगल नामक फल प्रसाद के रूप में दिया। प्रसाद खाकर बाछल देवी गर्भवती हो गई तदुपरांत गोगाजी का जन्म हुआ। गुगल फल के नाम से इनका नाम गोगाजी पड़ा। कहा जाता है कि श्री जाहरवीर गोगादेवजी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। नवमी तिथि का दिन जाहरवीर की जोत कथा के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन घरो में जहारवीर की पूजा और हवन किया जाता है। साथ ही खीर और पुआ का भोग लगाया जाता है। लोग अपनी अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए भी पूजा करते है।
गोगा नवमी की पूजन विधि: भाद्रपद कृष्ण पक्ष की नवमी को सुबह जल्दी उठ कर नहा धोकर खाना, खीर, चूरमा, गुलगुले आदि बनाकर जब मिट्टी की मूर्तियां लेकर महिलाएं आती हैं तो इनकी पूजा होती है। रोली, चावल से टीका कर बनी हुई रसोई का भोग लगाएं, गोगाजी के घोड़े के आगे दाल रखी जाती है और रक्षा बंधन की राखी खोल कर इन्हें चढ़ाई जाती है। कहा जाता है कि रक्षा बंधन के दिन बहनें अपने भाइयों को जो रक्षासूत्र बांधती हैं वह गोगा नवमी के दिन खोल कर गोगा जी महाराज को चढ़ा दिए जाते हैं। कई जगह तो गोगा जी की घोड़े पर चढ़ी हुई वीर मूर्ति होती है। हर जगह इनकी पूजा के तरीके में अंतर तो जरूर है।
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