जम्मू, दिनेश महाजन। केंद्र शासित प्रदेश बनने के साथ ही वीरवार से जम्मू कश्मीर के सभी थानों में अब भारतीय दंड संहिता (आइपीसी) के तहत आपराधिक मामले दर्ज किए जाएंगे। अब तक रणबीर दंड संहिता (आरपीसी) के तहत केस दर्ज किए जाते थे। जम्मू कश्मीर देश का अकेला ऐसा राज्य था जो कानूनी कार्रवाई में आरपीसी का प्रयोग करता था। 31 अक्टूबर से जम्मू कश्मीर का दो केंद्र शासित राज्यों जम्मू कश्मीर और लद्दाख में पुनर्गठन होने के साथ ही रणबीर दंड संहिता इतिहास बन जाएगी। इसका स्थान भारतीय दंड संहिता ले लेगी।

वर्ष 1932 में डोगरा शासक रणबीर सिंह ने रणबीर दंड संहिता को जम्मू कश्मीर राज्य में लागू किया था। भारतीय संविधान में अनुच्छेद 370 के बिंदुओं के तहत भारतीय दंड संहिता (आइपीसी) जम्मू-कश्मीर राज्य में लागू नहीं हो सकती, लेकिन अब पुनर्गठन के बाद आइपीसी के तहत केस दर्ज किए जाएंगे। आरपीसी और आइपीसी की कई धाराओं में सजा की अवधि में अंतर है। आइपीसी में अपराध के तहत जो सजा तय है, आरोप साबित होने के बाद अरोपित को उसी के हिसाब से न्यायालय में सजा दी जाएगी। हालांकि, आरपीसी और आइपीसी में बहुत अधिक अंतर नहीं है।

आइपीसी की प्रमुख धाराएं आरपीसी में नहीं थी

  • आइपीसी की धारा 4: साइबर अपराधों से जुड़े मामले दर्ज किए जाते हैं, लेकिन आरपीसी में यह धारा नहीं है। कंप्यूटर अपराध से जुड़े मामले जम्मू कश्मीर में इंफारमेशन टेक्नालाजी एक्ट के तहत दर्ज होते हैं।
  • आइपीसी की धारा 153 सीएए : सार्वजनिक सभाओं या जमावड़ों के दौरान जानबूझकर शस्त्र लेकर आने को दंडनीय अपराध मानती है, आरपीसी में यह धारा भी नहीं है। ऐसे मामलों को आम्र्स एक्ट के तहत दर्ज किया जाता है।
  • आइपीसी की धारा 195-ए : इसके तहत अगर कोई किसी को झूठी गवाही या बयान देने के लिए प्रताडि़त करता है तो वह दण्ड का हकदार है। आरपीसी में इस संबंध में कोई निर्देश नहीं मिलते हैं।
  • आइपीसी की धारा 304-बी: दहेज के कारण होने वाली मौतों से संबंधित है, रणबीर दंड संहिता में इसका कोई उल्लेख नहीं है। ऐसे मामले आत्महत्या के लिए उकसाने के तहत दर्ज किए जाते हैं।
  • रणबीर दंड संहिता की धारा 190 के तहत सरकार ऐसे किसी भी व्यक्ति को सजा दे सकती है जो ऐसी सामग्री प्रकाशित या वितरित करे जिसे सरकार द्वारा प्रतिबंधित किया गया हो।

आरपीसी की धाराएं जो आइपीसी में नहीं हैं

  • आरपीसी की धारा 167-ए - इसके मुताबिक जो भी सरकारी कर्मचारी किसी ठेकेदार को उसके घटिया काम के लिए भुगतान करते हैं, वह कानूनी तौर पर सजा के हकदार हैं। रिश्वतखोरी से जुड़ी यह महत्वपूर्ण धारा आइपीसी में मौजूद नहीं है।
  • आरपीसी की धारा 420-ए: सरकारी और वरिष्ठ अधिकारी द्वारा छल अथवा धोखाधड़ी की सजा का निर्धारण करती है। यह धारा आइपीसी में नहीं है।
  • आरपीसी की धारा 204-ए : आपराधिक मामले के अहम सबूतों को नष्ट करने के मामले में प्रयोग होती है। आइपीसी में यह धारा भी नहीं है।  

Posted By: Rahul Sharma

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