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    जम्मू-कश्मीर : पाक व चीन से प्रदेश का हिस्सा वापस लेने को अपनी पीढ़ियों को बताना होगा इतिहास

    जम्मू कश्मीर पर कब्जा करने के लिए पाकिस्तान ने 1947 में कबाइलियों के साथ मिलकर जम्मू कश्मीर पर हमला किया था। इस हमले के दौरान उसने जम्मू कश्मीर के एक बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया था।भारतीय सेनाओं ने उसे खदेड़ा और संयुक्त राष्ट्र के हस्ताक्षेप पर जंगबंदी हो गई।

    By Vikas AbrolEdited By: Updated: Wed, 23 Feb 2022 10:03 AM (IST)
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    जम्मू कश्मीर पूरा का पूरा भारतवर्ष का है। एलओसी के पार का जम्मू कश्मीर भी भारत का है।

    जम्मू, राज्य ब्यूरो। पाकिस्तान से गुलाम कश्मीर और चीन के कब्जे वाले लद्दाख और भूभाग को अगर वापस लेने है तो हमें अपनी आने वाली पीढ़ियों को अपना इतिहास बताना होगा। भारत की सांस्कृतिक और भौगोलिक सीमाएं कहां तक थी, किस तरह से जम्मू कश्मीर का एक हिस्सा पाकिस्तान और चीन ने हथिया लिया, यह पाठयक्रम का हिस्सा होना चाहिए,तभी इसे प्राप्त करने का हमारा संकल्प मजबूत होगा और इसे लक्ष्य को प्राप्त कर सकेंगे। जब हम स्वतंत्रता का शताब्दी समारोह मनाएं तो तिरंगा सिर्फ कश्मीर में ही नहीं गुलाम कश्मीर की राजधानी मुजफ्फराबाद में भी लहराए।

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    इसी संकल्प के साथ मंगलवार को संकल्प दिवस के सिलसिले में आयोजित व्याख्यान माला का अंतिम व्याख्यान संपन्न हुआ। यह व्याख्यान माला लद्दाख व जम्मू कश्मीर अध्ययन केंद्र ने आयोजित की थी। जम्मू कश्मीर पर कब्जा करने के लिए पाकिस्तान ने 1947 में कबाइलियों के साथ मिलकर जम्मू कश्मीर पर हमला किया था। इस हमले के दौरान उसने जम्मू कश्मीर के एक बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया था। भारतीय सेनाओं ने उसे खदेड़ा और संयुक्त राष्ट्र के हस्ताक्षेप पर जंगबंदी हो गई। इससे पाकिस्तान के कब्जे में जम्मू कश्मीर का एक हिस्सा चला गया। इसमें गिलगित बाल्तिस्तान, स्कर्दु, बाग, मुजफ्फराबाद, रावलाकोट, भिंबर व चकाैटी का इलाका शामिल है। पाकिस्तान ने बाद में काराकोरम और अक्साईचिन का एक इलाका चीन को सौंप दिया था। पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू कश्मीर के हिस्से को गुलाम कश्मीर या फिर पाकिस्तान के अनाधिकृत कब्जे वाला जम्मू कश्मीर कहा जाता है।

    भारतीय संसद ने 22 फरवरी 1994 को सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित कर गुलाम कश्मीर के पाकिस्तान के कब्जे से मुक्त कराने का संकल्प लिया है।संसद द्वारा गुलाम कश्मीर के संदर्भ में पारित प्रस्ताव को स्मरण करने व गुलाम कश्मीर को वापस प्राप्त करने के संकल्प को दोहराने के लिए ही आज संकल्प दिवस मनाया गया। लद्दाख एवं जम्मू कश्मीर अध्ययन केंद्र के निदेशक आशुतोष भटनागर ने अपने संबोधन में कहा कि आज का दिन पीछे देखने का नहीं बल्कि आगे बढ़ने का है। सवाल भावि दिशा का है। बीते 70 साल से हम क्या झेल रहे हैं, उससे ज्यादा यह जानना जरुरी है कि 1947 से पहले क्या हुआ था। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा-संस्कृति और इतिहास की जम्मू कश्मीर के बिना कल्पना भी नहीं की जा सकती। जम्मू कश्मीर शुरु से ही भारत का एक अविभाज्य अंग रहा है।

    आशुतोष भटनागर ने कहा कि 1947 में हमारे साथ जो त्रासदी हुई, उसके लिए तत्कालीन वैश्विक राजनीति और हमारी अपनी कमजोरियां जिम्मेदार रहीं हैं। उसके बाद के भारतवर्ष की एक इंच भी जमीन कोई नहीं ले पाया। उन्होंने कहा कि अब इतिहास लिखा नहीं बल्कि बदला जाएगा। जम्मू कश्मीर पूरा का पूरा भारतवर्ष का है। एलओसी के पार का जम्मू कश्मीर भी भारत का है।