NC छोड़ते ही आगा सैयद का बड़ा दांव, उमर अब्दुल्ला को चुनौती देने की तैयारी; युवाओं के साथ तलाशेंगे नया सियासी विकल्प
रुहुल्ला मेहदी ने नेशनल कॉन्फ्रेंस और लोकसभा सदस्यता से इस्तीफा देकर जम्मू-कश्मीर में नई राजनीतिक पारी के संकेत दिए हैं।

नेशनल कॉन्फ्रेंस से आगा सैयद ने दिया इस्तीफा (फाइल फोटो)
HighLights
रुहुल्ला मेहदी ने नेशनल कॉन्फ्रेंस से इस्तीफा दिया
लोकसभा सदस्यता छोड़ नई राजनीतिक पारी के संकेत
ईमानदार युवाओं संग जम्मू-कश्मीर में नया विकल्प तलाशेंगे
नवीन नवाज, श्रीनगर। नेशनल कॉन्फ्रेंस से 24 वर्ष पुराना रिश्ता तोड़ने और लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा देने के बाद आगा सैयद रुहुल्ला मेहदी ने जम्मू-कश्मीर की राजनीति में अपनी नई पारी के संकेत दिए हैं।
उन्होंने ईमानदार और संवेदनशील युवाओं को राजनीति में लाकर नया विकल्प खड़ा करने की बात कही है। हालांकि उन्होंने अभी नई पार्टी बनाने या किसी अन्य दल में शामिल होने का फैसला स्पष्ट नहीं किया है, लेकिन उनके संबोधन से साफ है कि वह सक्रिय राजनीति से दूर होने के बजाय अपनी अलग राजनीतिक जमीन तैयार करना चाहते हैं।
मंगलवार को बडगाम के बेहिश्त-ए-जेहरा पार्क में अपने पिता आगा सैयद मेहदी की 26वीं बरसी पर आयोजित जनसभा में रुहुल्ला ने नेशनल कान्फ्रेंस से अलग होने की घोषणा करते हुए कहा, 'यह मेरा इस्तीफा नहीं, आजादीनामा है। आज मैं आजाद हो गया हूं।' उन्होंने लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफे का पत्र भी ईमेल के जरिए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को भेजा।
मंच पर इस्तीफे के दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने के बाद उन्होंने इसे मोहम्मद अशरफ मट्टू को सौंपा, जो वर्ष 2010 में कथित पुलिस गोलीबारी में मारे गए 17 वर्षीय तुफैल मट्टू के पिता हैं। इस प्रतीकात्मक कदम के जरिए रुहुल्ला ने कश्मीर में नागरिक मौतों और मानवाधिकारों से जुड़े सवालों को भी अपने राजनीतिक विमर्श से जोड़ने का संकेत दिया।
युवाओं के सहारे नई राजनीति
रुहुल्ला ने कहा कि वह ऐसे ईमानदार, संवेदनशील और सिद्धांतवादी युवाओं की तलाश करेंगे, जिनमें दूसरों के प्रति करुणा हो और जो अपने लोगों के अधिकारों तथा सम्मान की लड़ाई लड़ने के लिए तैयार हों।
उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों को राजनीति में लाने के लिए उन्हें जहां तक भी जाना पड़ेगा, वह जाएंगे। उनका तत्काल उद्देश्य केवल नई पार्टी बनाना नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर के अधिकारों और राजनीतिक पहचान के लिए व्यापक आंदोलन खड़ा करना है। यह आंदोलन आगे चलकर राजनीतिक संगठन या पार्टी का रूप भी ले सकता है।
मजहब और मानवाधिकार का सियासी आधार?
कश्मीर की राजनीति में मजहबी पहचान, राजनीतिक स्वायत्तता और मानवाधिकारों से जुड़े मुद्दे लंबे समय से प्रभावशाली रहे हैं। रुहुल्ला की शिया समुदाय में पहचान और अगस्त 2019 के बाद जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक स्थिति पर उनकी मुखरता को देखते हुए ये विषय उनकी भावी राजनीति का आधार बन सकते हैं।
अपनी स्वतंत्र राजनीतिक जमीन तैयार करने के लिए वह मजहबी पहचान और कश्मीर में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों के मुद्दों को जनसमर्थन जुटाने के माध्यम के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं।
हालांकि, उनकी राजनीतिक स्वीकार्यता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह इन मुद्दों को व्यापक लोकतांत्रिक अधिकारों की लड़ाई के रूप में कितना प्रस्तुत करते हैं और विभिन्न समुदायों को साथ जोड़ने में कितने सफल होते हैं।
फारूक को कुरान पढ़ने की सलाह
अपने संबोधन में रुहुल्ला ने नेशनल कॉन्फ्रेंस अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला पर तीखे हमले किए। उन्होंने फारूक अब्दुल्ला को कुरान पढ़ने की सलाह देते हुए पार्टी नेतृत्व के राजनीतिक आचरण और उसके सिद्धांतों पर सवाल उठाए। उनका आरोप था कि नेशनल कान्फ्रेंस अपने मूल राजनीतिक एजेंडे और जनता से किए गए वादों से दूर हो गई है।
उन्होंने भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को भी निशाने पर लिया। रुहुल्ला ने कहा कि जम्मू, कश्मीर और लद्दाख के लोग अपनी गरिमा और सम्मान से समझौता नहीं करेंगे।
उन्होंने दोटूक कहा कि कश्मीर अपनी शर्तों पर बातचीत करेगा, किसी दूसरे के तय किए हुए एजेंडे पर नहीं। इससे संकेत मिलता है कि उनकी भावी राजनीति में केंद्र सरकार की नीतियों, आरएसएस की विचारधारा और जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक स्थिति प्रमुख मुद्दे रह सकते हैं।
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रैली में नहीं दिखी बड़ी लामबंदी
रुहुल्ला की रैली में जिस बड़े राजनीतिक जमावड़े और नेशनल कान्फ्रेंस के असंतुष्ट नेताओं की मौजूदगी के कयास लगाए जा रहे थे, वह नजर नहीं आई।
न पार्टी के असंतुष्ट नेता उनके साथ मंच पर दिखे और न कोई बड़ा सियासी चेहरा समर्थन में सामने आया। अंगद सिंह और डाउनटाउन के अशरफ मट्टू जैसे कुछ चेहरे जरूर मौजूद थे।लगभग 80 मिनट के संबोधन में उनका मुख्य निशाना फारूक और उमर अब्दुल्ला रहे।
उन्होंने आरोप लगाया कि 2024 के चुनावों में अनुच्छेद 370 की बहाली, संवैधानिक अधिकारों, आरक्षण के युक्तिकरण और 200 यूनिट मुफ्त बिजली जैसे वादे किए गए, लेकिन सत्ता में आने के बाद नेतृत्व इन मुद्दों से पीछे हट गया।
3.56 लाख वोटों की परीक्षा
वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में श्रीनगर सीट से रुहुल्ला ने 3,56,866 वोट हासिल कर जीत दर्ज की थी। अब उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह साबित करना होगा कि यह जनसमर्थन उनका व्यक्तिगत आधार था या इसमें नेशनल कॉन्फ्रेंस के संगठन और चुनाव चिह्न की भी बड़ी भूमिका थी।
नई पार्टी बनाने के लिए मजबूत संगठन, समर्पित कार्यकर्ताओं और लगातार जनसंपर्क की आवश्यकता होगी। केवल लोकप्रियता और जनसभाओं में भीड़ जुटाना राजनीतिक संगठन खड़ा करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि रुहुल्ला नया संगठन बनाएंगे, किसी अन्य दल से जुड़ेंगे या आंदोलन के रास्ते पर आगे बढ़ेंगे। नेशनल कान्फ्रेंस से अलग होना उनके राजनीतिक सफर के एक अध्याय का अंत जरूर है, लेकिन असली परीक्षा अब शुरू हुई है।
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