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ऊना, राजेश शर्मा। लसोड़ा पोषक तत्वों और औषधीय गुणों से भरपूर होता है। देश के कई जगहों पर इसे गोंदी और निसोरा भी कहा जाता है। इसके फल सुपारी के बराबर होते हैं। कच्चे लसोड़े का साग और आचार भी बनाया जाता है। पके हुए लसोड़े मीठे होते हैं तथा इसके अंदर गोंद की तरह चिकना और मीठा रस होता है। इसके पेड़ की तीन से चार जातियां होती है पर मुख्य दो हैं जिन्हें लमेड़ा और लसोड़ा कहते हैं। इसका वानस्पतिक नाम कॉर्डिया मायक्सा है। लेकिन तेजी से बदलते खानपान की वजह से यह लोगों से दूर होता जा रहा है। लसोड़ा की लकड़ी बड़ी चिकनी और मजबूत होती है। इमारती काम के लिए इसके तख्ते बनाये जाते हैं और बन्दूक के कुन्दे में भी इसका प्रयोग होता है। इसके साथ ही अन्य कई उपयोगी वस्तुएं बनायी जाती हैं।

लाभ

  • लसोड़े के पेड़ की छाल को पानी में उबालकर छानकर पिलाने से खराब गला भी ठीक हो जाता था। 
  • इसके पेड़ की छाल का काढ़ा और कपूर का मिश्रण तैयार कर सूजन वाले हिस्सों में मालिश करने से आराम मिलता है।
  • इसके बीज को पीसकर दादखाज और खुजली वाले स्थान पर लगाने से आराम मिलता है। लसोड़ा में मौजूद तत्व इसमें दो फीसद प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट,वसा, फाइबर, आयरन, फॉस्फोरस व कैल्शियम मौजूद होते हैं। 
  •  गुजरात के आदिवासी लोग लसोड़ा के फलों को सुखाकर चूर्ण बनाते है और मैदा, बेसन और घी के साथ मिलाकर लड्डू बनाते हैं। इनका मानना है कि इस लड्डू के सेवन शरीर को ताकत और स्फूर्ति मिलती है।
  • लसोड़ा की छाल का काढ़ा पीने से महिलाओं को माहवारी की समस्याओं में आराम मिलता है। 

जब आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं थीं तो लसोड़े के प्रयोग से ही कई बीमारियां दूर की जाती थीं। लगभग हर घर में लसोड़े के बीज, चूर्ण आदि रखा जाता था। जिसे जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल किया जाता था।

 प्रकाश चंद, धार चामुक्खा (ऊना) 

लसोड़ा नम और सूखे जंगलों में बढ़ता है। यह हिमाचल प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, राजस्थान आदि में होता है। जंगल के अलावा लोग अपने खेतों के किनारे पर भी इसे तैयार करते हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण इसके पेड़ लुप्त हो रहे हैं। इसके बीज से पेड़ तैयार करना लगभग असंभव है। औषधीय गुणों से भरपूर इस प्रजाति के संरक्षण की जरूरत है। 

 डॉ. अशोक धीमान, उद्यान विभाग के विषय विशेषज्ञ

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Posted By: Babita kashyap

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