सोलन, सुनील शर्मा। इस यंत्र का एक सिरा कमरे के वातावरण में मौजूद दूषित कणों को सोख कर दूसरी तरफ से ताजा हवा को कमरे में छोड़ेगा। जैसे-जैसे यंत्र दूषित हवा को ग्रहण करेगा, इसके अंदर मौजूद शैवाल का आकार बढ़ता जाएगा। हिमाचल के सोलन स्थित शूलिनी विश्वविद्यालय द्वारा तैयार किया यह इंडोर ग्रीन एयर प्यूरीफायर अप्रैल तक बाजार में होगा। वही, लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड एजुकेशन एंड रिसर्च के वैज्ञानिकों द्वारा तैयार शैवाल आधारित इनडोर एयर प्यूरीफायर सितंबर तक बाजार में आएगा।

शूलिनी विवि ने इसका पेटेंट करा लिया है और दिल्ली की माइक्रो एलगी कंपनी के साथ उत्पादन के लिए करार हो चुका है। विवि का दावा है कि शैवाल युक्त यह फिल्टर भारतीय बाजार में उतरने जा रहा अपनी तरह का पहला उपकरण है। कीमत 10 से 15 हजार रुपये होगी। विवि का कहना है कि गुणवत्ता के साथ इसे आकर्षक बनाया जा रहा है ताकि यह घर की सजावट में भी योगदान दे सके। यंत्र बिजली से चलेगा। इसमें डाले गए शैवाल को दो माह बाद बदलना पड़ेगा, ताकि वह ताजा हवा देने का कार्य बेहतर ढंग से करता रहे। 

शोधकर्ता डॉ. प्रदीप ने बताया कि बाहरी और घरेलू वायु प्रदूषण के संयुक्त प्रभाव से हर वर्ष कई लोगों की मौत हो रही है। वायु प्रदूषण से दिल के रोग, फेफड़ों में कैंसर व तीव्र श्वास संक्रमण से मृत्यु दर लगातार बढ़ रही है। यही वजह है कि विज्ञानी भी प्रदूषण की चुनौतियों से निपटने के लिए तैयारी में जुटे हैं। प्रदूषण की समस्या न केवल बाहरी वातावरण में है बल्कि घर या दफ्तर के अंदर भी समस्या कम नहीं है।

करेगा बायोमास का उत्पादन भी...

लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी (पंजाब दिल्ली) और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड एजुकेशन एंड रिसर्च द्वारा भी काई (शैवाल) आधारित एयर प्यूरीफायर विकसित किया गया है, जो सितंबर तक बाजार में होगा।कीमत होगी करीब 25 हजार रुपये। यह उपकरण भी कमरे के वातावरण में से 98 प्रतिशत तक हानिकारक गैसों को बेअसर करने और हवा में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाने में सक्षम है। यह उपकरण बायप्रोडक्ट के रूप में बायोमास का उत्पादन भी करता है, जिसे 800 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से ऊर्जा उत्पादन के लिए बेचा जा सकता है। विवि ने इसके पेटेंट के लिए आवेदन किया है। टीम अब शैवाल आधारित फेस मास्क पर काम कर रही है, यह भी इसी साल विकसित कर लिया जाएगा।

कोरोला पायरनडोसा

प्रजाति का शैवाल इस यंत्र के लिए इस्तेमाल होने वाला शैवाल कोरोला पायरनडोसा प्रजाति का है। इसमें प्रदूषक तत्वों को हजम करने की अधिक क्षमता है।

-डॉ. प्रदीप भारद्वाज, प्रोजेक्ट हेड, शूलिनी विश्वविद्यालय।

ये है खासियत...

अनेक एयर प्यूरीफायर बाजार में उपलब्ध हैं, लेकिन वे सभी एक ही सिद्धांत पर काम करते हैं-कार्बन और अन्य कणों को केवल फिल्टर करते हैं। जबकि इस उपकरण में काई (शैवाल) में मौजूद रोगाणु प्रकाश संश्लेषण का संचालन करते हैं और धूप, पानी और कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग करके ऑक्सीजन का उत्पादन करते हैं।

-नवीन लूथरा, स्टार्टअप विभाग प्रमुख, लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी

कोरोला पायरनडोसा प्रजाति का शैवाल इस यंत्र के लिए इस्तेमाल होने वाला शैवाल कोरोला पायरनडोसा प्रजाति का है। इसमें प्रदूषक तत्वों को हजम करने की अधिक क्षमता है।

-डॉ. प्रदीप भारद्वाज, प्रोजेक्ट हेड, शूलिनी विश्वविद्यालय।

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Posted By: Babita kashyap

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