सोलन, मनमोहन वशिष्ठ। हिमालयी क्षेत्रों में यूं तो कंदराओं (गुफा) का होना आम बात है क्योंकि कहीं न कहीं पहाड़ों में कंदराओं को देखा जा सकता है। ये कंदराएं सदियों से बनी हुई हैं और आज भी अपना ऐतिहासिक वर्चस्व बनाए हुए है। ऐसी ही गुफा सोलन शहर के साथ लगते ऊंचे करोल पर्वत में है जिसका संबंध पांडवों से जुड़ा हुआ है। पांडव काल की यह गुफा विश्व की सबसे पुरानी व हिमालयी क्षेत्र की सबसे प्राचीनतम व लंबी गुफा है। करोल की गुफा आज भी अपने अंदर कई इतिहासों को छिपाए हुए है जो आज भी रहस्य बने हुए हैं। इसलिए इस गुफा को रहस्यमयी गुफा के नाम से भी जाना जाता है। करोल पर्वत दूर से देखने पर गड़वे (लोटा) की तरह नजर आता है। सोलन की महि पंचायत के तहत आने वाले करोल टिब्बा के बारे में जब इतिहास खंगाला तो कई रोचक बातें सामने आईं।

पाडवों से जुड़ा है इतिहास जनश्रुतियों के अनुसार इस गुफा को पांडवों ने बनाया था। कहते हैं कि जब अज्ञातवास के दौरान पिंजौर में लाक्षागृह में पांडवों को जलाने का षड्यंत्र रचा गया था तो फिर इसी गुफा (सुरंग) से होकर वह बच निकले थे। हालांकि पिंजौर में लाक्षागृह के कोई प्रमाण नहीं मिलते हैं। हालांकि चंडीगढ़ शिमला हाइवे पर स्थित पिंजौर (हरियाणा) के पास विराट नगर था जहां पांडवों ने अज्ञातवास व्यतीत किया था और उसी दौरान एक वर्ष का अज्ञातवास इसी गुफा व करोल के घने जंगलों में बिताया था। इस गुफा को पार करने वाले पांडव अंतिम मानव थे। इसी कारण इस गुफा को पांडव गुफा के नाम से जाना जाता है। भाषा एवं संस्कृति विभाग सोलन द्वारा 1996 में प्रकाशित 'हमारा सोलन' पुस्तक में भी करोल की पांडव गुफा का इतिहास उल्लेखित है।

जामवंत भी रहते थे इस गुफा में

हिमाचल पर्यटन विभाग से मिली जानकारी के अनुसार इस गुफा का संबंध जामवंत से भी रहा है। कहते हैं कि लंका युद्ध के बाद जब श्रीराम ने सबकी विदाई की तो जामवंत ने कहा था कि लंका में इतने बडे योद्धाओं के साथ मलयुद्ध करके भी मेरी भुजाएं संतुष्ट नहीं हुई हैं तो श्रीराम ने उन्हें जामवंत की यह इच्छा द्वापर युग में पूरी होने की बात कही थी। उसके बाद से जामवंत इसी गुफा में रहने लगे थे। द्वापर युग के अंत में श्रीकृष्ण के साथ जामवंत का युद्ध हुआ तो फिर श्रीकृष्ण ने उन्हें त्रेता युग में उनकी इच्छा के बारे में बताया। उसके बाद जामवंत को अपनी भूल का एहसास हुआ था। मान्यता है कि करोल गुफा ही जामवंत की गुफा है। संस्कृत के शब्दकोष में करोली शब्द का अर्थ 'रीछ की गुफा' है। गुफा के मुहाने पर प्राचीन ठाकुरद्वारा मंदिर व आषाढ़ माह के पहले रविवार को लगने वाला मेला सिद्ध बाबा करोल इस घटना से जुड़े हैं। बताते हैं कि आषाढ़ माह के पहले रविवार को ही श्रीकृष्ण का जामवंती से इसी गुफा में विवाह हुआ था। 

संजवनी का भी है भंडार

मान्यता है कि हिमालय से संजीवनी बूटी का पहाड़ उठा लेकर जा रहे थे तो उसमें से कुछ हिस्सा यहां भी गिरा था, जिससे आज भी यहां पर संजीवनी बूटी होने की बात कही जाती है। सोलन की महि पंचायत के प्रधान नंद किशोर कहते हैं कि यह सिद्ध बाबा करोल गुफा है जिसे जामवंत की गुफा के नाम से भी जाना जाता है। किशोर कहते हैं कि बुजुर्गो से अकसर सुना करते थे कि यहां पांडवों ने एक वर्ष के अज्ञातवास के दौरान कुछ समय यहां भी बिताया था, जिस कारण इसे पांडव गुफा भी कहते है। वह कहते हैं कि आज इसे पर्यटन के रूप में उभारने की जरूरत है।

पिंजौर निकलती है गुफा

इस गुफा के हरियाणा के पिंजौर निकलने के भी प्रमाण हैं। गुफा से बह कर जाने वाले बान के पत्ते पिंजौर के मुहाने पर निकलते हैं। इसका अंदाजा स्वत: ही लगाया जा सकता है क्योंकि बान के पेड़ करोल से आगे कहीं भी नहीं है। करोल गुफा के रहस्य को जानने के लिए पहले से ही खोज का कार्य चलता रहा है, लेकिन इससे पर्दा नहीं उठ सका है। बताते हैं कि 1982 में जर्मनी के कुछ खोजकर्ताओं ने जब इस गुफा के अंदर रंगीन पानी डाला तो यह पिंजौर गार्डन के पानी के प्राकृतिक चश्मों में निकला जिससे एक बात तो साबित होती है कि गुफा पिंजौर में ही निकलती है। जानकारों का मानना है कि इस गुफा के अंदर बड़ी झील हो सकती है।

क्या है गुफा के अंदर

गुफा के अंदर प्रवेश करते ही शिवलिंग, शेषनाग जैसी आकृतिया दिखने लगती हैं। सोलन में इसे करोल टिब्बा के नाम से भी जाना जाता है। लोगों का मानना है कि गुफा के अंदर अलौकिक शक्तिया हैं जिनका रहस्य अभी तक वैज्ञानिक भी नहीं सुलझा पाए हैं। इस गुफा के अंदर 50 फीट तक ही जाया जा सकता है। गुफा के अंदर पानी के कारण काफी फिसलन है। अंधेरे में पत्थरों से सिर टकराने व सांप बिच्छुओं जैसे जहरीले कीडों से भी सामना करना पड़ता है। इस गुफा में जिसने भी अंदर तक घुसने की हिम्मत की है उनके साथ अनहोनी घटनाएं जरूर हुई है।

शिमला व चंडीगढ़ के होते हैं दीदार

करोल पर्वत का सौंदर्य इतना है कि हर कोई यहां आने की चाहत रखता है। सोलन में कालका-शिमला हाईवे के समुद्र तल से करीब सात हजार फीट की ऊंचा करोल टिब्बा दूर से ही दिखाई देता है। करोल पर खड़े होकर एक तरफ हिमालय तो दूसरी ओर मैदानी राज्यों के दर्शन होते है। यहां से शिमला, चायल, कसौली, अपर हिमाचल की बर्फ से ढ़की पहाड़ियां और धौलाधार रेंज भी नजर आती है। वहीं चंडीगढ़ व अन्य मैदानी क्षेत्रों को भी देखा जा सकता है।

कैसे पहुंचे करोल

खुम्ब सिटी के नाम से मशहूर सोलन शहर करोल पर्वत की गोद में बसा हुआ है। जनवरी माह में बर्फबारी के दौरान पूरा पहाड़ बर्फ की सफेद चादर में लिपट जाता है। करोल पर्वत जाने के लिए सोलन के चंबाघाट से भी रास्ता जाता है। सोलन शहर से आगे कालका शिमला एनएच पर डेडघराट क्षेत्र के पास से पांडव गुफा के लिए रास्ता जाता है। इसमें करीब साढ़े पांच किलोमीटर की चढ़ाई बान व देवदार के घने जंगलों के बीच से तय करनी पड़ती है। अन्य राज्यों से आने वाले सोलन तक रेलगाड़ी के माध्यम से भी आ सकते हैं। उसके आगे बस या गाड़ियों के माध्यम से भी जा सकते हैं।