मंडी, हंसराज सैनी। हिंदी व इंग्लिश की जगह हिंग्लिश ले रही है। देश में अधिकतर लोग न तो शुद्ध हिंदी

बोल रहे हैं, न ही इंग्लिश। अब हिंग्लिश ही आम लोगों की भाषा बनती जा रही है। जनगणना में हिंदी व इंग्लिश बोलने वालों की संख्या बढ़ने के आंकड़े दिखाए गए हैं, वे सही नहीं हैं। यह दावा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) मंडी की सहायक प्रोफेसर डॉ. नीतू कुमारी ने शोध में किया है।

वर्ष 1961 से 2011 तक की जनगणना में दावा किया गया था कि हिंदी व इंग्लिश बोलने वालों के साथ बहुभाषियों की संख्या बढ़ी है। क्या देश में हिंदी व इंग्लिश बोलने वालों की संख्या जनगणना में दिखाए गए

आंकड़ों के अनुरूप है या नहीं। डॉ. नीतू कुमारी ने अमेरिका के दो नामी शिक्षण संस्थानों के शोधकर्ताओं के साथ इस पर शोध किया। भारत में 26 फीसद ग्रामीण व 13 प्रतिशत शहरी लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं। इंग्लिश इन लोगों की पहुंच से दूर है। हिंदी बहुल कई राज्यों में भी लोग शुद्ध हिंदी नहीं बोलते हैं। हिंग्लिश ने अंग्रेजी के व्याकरण की अनिवार्यता को भी काफी संकुचित कर दिया है।

शोध में कई टेलीविजन शो व इंटरव्यू का अध्ययन किया गया। इसमें बिग बॉस के दो सीजन का शो भी शामिल था। बोलचाल के दौरान लोग ऐसे शब्द बोलते पाए गए, जिससे न तो शुद्ध हिंदी का आभास हो रहा था, न इंग्लिश का। लोग हिंदी व इंग्लिश का मिश्रण कर हिंग्लिश का रूप दे रहे हैं। जैसे...जहां उनका ट्रांसफर हुआ है...राहुल टेंशन में हैं...ऐसे वाक्यों का प्रयोग हो रहा है। हिंग्लिश के बढ़ते प्रचलन को देख अब

मोबाइल फोन निर्माता कंपनियां मोबाइल फोन पर भी हिंग्लिश की-बोर्ड उपलब्ध करवा रही हैं।

सोशल मीडिया पर पोस्ट 

फेसबुक पर हर मिनट 50 लाख से ज्यादा लोग टिप्पणियां व पोस्ट करते हैं। 30 लाख से ज्यादा लोग स्टेटस अपडेट करते हैं। इंस्टाग्राम पर प्रति मिनट करोड़ों पोस्ट किए जाते हैं। मोबाइल से 50 लाख से ज्यादा ट्वीट होते हैं। एक मिनट में इंटरनेट की दुनिया में डेढ़ लाख से ज्यादा टेक्स्ट का आदान-प्रदान होता है।  

क्या है हिंग्लिश

हिंग्लिश, हिंदी व इंग्लिश के शब्दों का मिश्रण है। इसका अधिकतर इस्तेमाल हिंदी-भाषी राज्यों के शहरी व अर्ध-शहरी क्षेत्रों में देखा जा रहा है। टेलीविजन, मोबाइल फोन तथा मौखिक संपर्क के जरिये ग्रामीण तथा दूरदराज के क्षेत्रों में हिंग्लिश फैल रही है।

जनगणना में देश में हिंदी व इंग्लिश बोलने वालों की संख्या बढ़ने के जो दावे किए गए हैं, वे शोध में गलत पाए गए हैं। देश में हिंदी व इंग्लिश की बजाय हिंग्लिश बोलने वालों की संख्या बढ़ रही है। यह हिंदी

व इंग्लिश के लिए खतरे की घंटी है। 

-डॉ. नीतू कुमारी, सहायक प्रोफेसर, स्कूल ऑफ बेसिक साइंसेज, आइआइटी मंडी

Posted By: Babita