गजब की परंपरा! न धुआं, ना प्रदूषण... हिमाचल के किसान पराली से बना रहे नन्हें पशुओं का 'विंटर बेड', तरीका देख दंग रह जाएंगे
जसवां-परागपुर, कांगड़ा में किसान धान की पराली जलाने के बजाय सदियों से उसका संरक्षण और बहुआयामी उपयोग करते आ रहे हैं।
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फोटो एआई द्वारा जनरेट की गई है।
HighLights
जसवां-परागपुर में किसान पराली को जलाते नहीं, सहेजते हैं
पराली का उपयोग पशुओं के चारे और बिस्तर के लिए होता है
ग्रामीण आयोजनों में बैठने और दरियां बनाने में भी काम आती
साहिल ठाकुर, कांगड़ा। पड़ोसी राज्यों में धान की पराली जलाने से फैलने वाले प्रदूषण को लेकर हर साल सरकारों को सख्त हिदायतें जारी करनी पड़ती हैं। न्यायालय भी इस गंभीर समस्या पर कई बार संज्ञान ले चुके हैं।
वहीं, जिला कांगड़ा के जसवां-परागपुर क्षेत्र में पराली संरक्षण की एक ऐसी परंपरा देखने को मिलती है, जहां किसानों ने कभी इसे जलाने की जरूरत ही महसूस नहीं की।
यहां के किसान पराली को बेकार समझकर आग के हवाले करने के बजाय उसकी उपयोगिता को समझते आए हैं। यही वजह है कि डाडा सीबा तहसील के अंतर्गत आने वाले अनेक गांवों में आज भी पराली को सहेजने और सालभर इस्तेमाल करने की परंपरा कायम है।
सदियों से हो रहा गांव-गांव में इस्तेमाल
टिप्परी, सियूल लग, गुराला, कस्बा जागीर, स्वानता, गुरनबाड़, पधां, डाडा सीबा, चनौर और मलोट सहित आसपास के गांवों में धान की पराली का सदियों पुराना उपयोग ग्रामीण जीवन का अहम हिस्सा रहा है। बुजुर्गों के अनुसार, पहले धान और पराली को अलग करने के लिए बैलों का सहारा लिया जाता था।
धान की फसल को बड़े-बड़े मुट्ठों में बांधकर जमीन पर बिछाया जाता था और फिर बैलों को गोलाकार घेरे में रातभर घुमाया जाता था। इससे धान के दाने अलग हो जाते थे और बैलों के पैरों तले दबकर पराली नरम हो जाती थी।
स्थानीय किसान हमीर चंद, सुरजीत कुमार और बुजुर्ग किसान चन्द लाल बताते हैं कि धान की कटाई और मड़ाई के बाद पराली को तीन से चार दिन तक धूप में सुखाया जाता था।
जब उसमें मौजूद नमी पूरी तरह निकल जाती थी तो उसे बांधकर सुरक्षित रख लिया जाता था। इस तरह पूरे साल पशुओं के चारे की व्यवस्था हो जाती थी। पराली केवल पशुओं के चारे तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि ग्रामीण जीवन में इसके कई अन्य उपयोग भी थे।
नन्हे पशुओं के लिए गर्म बिस्तर का काम करती पराली
ग्रामीण परिवेश में पराली का इस्तेमाल भेड़-बकरियों और कुत्तों के छोटे बच्चों को ठंड से बचाने के लिए भी किया जाता था। पराली को जमीन पर बिछाकर उसके ऊपर छोटे बच्चों को रात के समय बड़ी टोकरी के नीचे रखा जाता था।
बुजुर्गों का मानना था कि पराली की गर्माहट से नन्हे पशुओं को ठंड से बचाव मिलता है। इस तरह पराली उनके लिए किसी गर्म बिस्तर से कम नहीं होती थी।
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जागरण और कीर्तन में भी थी पराली की खास जगह
समय के साथ ग्रामीण जीवनशैली में भी बदलाव आया है। आज जहां घरों के बरामदों और आंगनों में कार्यक्रमों के दौरान मैट बिछाना चलन बन गया है, वहीं कुछ दशक पहले पराली ही बैठने का प्रमुख साधन हुआ करती थी।
गांवों में जागरण, कीर्तन और अन्य मनोरंजन कार्यक्रमों के दौरान लोग पराली बिछाकर रातभर बैठते और कार्यक्रमों का आनंद लेते थे। इतना ही नहीं, बुजुर्ग महिलाएं और पुरुष पराली से घरों के लिए दरियां तक तैयार करते थे। इन दरियों पर सोने, बैठने और आराम करने का अपना अलग ही आनंद था।
आधुनिकता की दौड़ में सिमट रहा बुजुर्गों का हुनर
समय बदलने के साथ पराली के पारंपरिक उपयोग भी धीरे-धीरे सीमित होते जा रहे हैं। अब अधिकांश किसान इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से पशुओं के चारे के लिए ही करते हैं।
पराली से दरियां बनाने और घरेलू जरूरतों के लिए इसका इस्तेमाल करने वाला बुजुर्गों का हुनर भी धीरे-धीरे अतीत का हिस्सा बनता जा रहा है। हालांकि, क्षेत्र के कई घरों में आज भी पराली से तैयार पुरानी दरियां और अन्य पारंपरिक वस्तुएं इस विरासत की गवाही दे रही हैं।
जसवां-परागपुर के किसानों की यह परंपरा संदेश देती है कि जिसे कहीं समस्या समझकर जलाया जा रहा है, वही पराली सही उपयोग और संरक्षण से ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पशुपालन का महत्वपूर्ण आधार बन सकती है। जरूरत केवल इसके महत्व को समझने और पुरानी उपयोगी परंपराओं को जीवित रखने की है।
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