विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Aug 29, 2021 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

किन्नौर में केसर व हींग की खेती के लिए भेजे बीज व पौधे

By JagranEdited By:
Published: Sun, 29 Aug 2021 08:48 PM (IST)

संवाद सहयोगी पालमपुर सीएसआइबार आइएचबीटी पालमपुर ने कृषि विभाग किन्नौर को केसर एवं ही

किन्नौर में केसर व हींग की खेती के लिए भेजे बीज व पौधे
किन्नौर में केसर व हींग की खेती के लिए भेजे बीज व पौधे

संवाद सहयोगी, पालमपुर : सीएसआइबार आइएचबीटी पालमपुर ने कृषि विभाग किन्नौर को केसर एवं हींग के बीज व पौधे का वितरण किया गया। संस्थान निदेशक डा. संजय कुमार ने विभाग को केसर के बीज की पहली खेप (840 किलोग्राम केसर कोर्म) व 3250 हींग के पौधे सौंपे। यह सामग्री किन्नौर के गैर-पारंपरिक क्षेत्रों के लिए सौंपी गई है। हिमाचल प्रदेश सरकार की महत्वकांक्षी कृषि से संपन्नता योजना के अंतर्गत आइएचबीटी व कृषि विभाग इस वर्ष एक हेक्टयर क्षेत्र को केसर व तीन हेक्टयर क्षेत्र हींग की खेती के अंतर्गत लाने के लक्ष्य पर काम कर रहा है। इस वर्ष किन्नौर जिले में केसर की खेती 0.24 हेक्टयर क्षेत्रफल और हींग की खेती 0.5 हेक्टयर क्षेत्रफल में की जाएगी।

डा. संजय कुमार ने बताया कि वर्तमान में केसर केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर के पंपौर और किश्तवाड़ जिलों में उगाया जाता है। इसका वार्षिक उत्पादन 6-7 टन तक पहुंच जाता है जोकि भारत में 100 टन की वार्षिक मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

इसी प्रकार देश में प्रतिवर्ष 1542 टन से अधिक शुद्ध हींग की खपत होती है तथा देश में प्रतिवर्ष 942 करोड़ रुपये से अधिक हींग के आयात पर खर्च किए जाते हैं। भारत में हींग की आपूर्ति के लिए अफगानिस्तान, उज्बेकिस्तान तथा ईरान प्रमुख देश हैं। देश में हींग का आयात लगभग 90 फीसद अफगानिस्तान से किया जाता है।

अब कृषि विभाग व सीएसआइआर आइएचबीटी मिलकर केसर व हींग की खेती के पायलट प्रोजेक्ट पर काम कर रही है। इस प्रोजेक्ट के अंतर्गत हिमाचल प्रदेश के कुछ चिह्नित क्षेत्रों में जिनकी जलवायु केसर व हींग के लिए उपयुक्त हो सकती है। वहां पर पायलट योजना के अंतर्गत कुछ किसानों द्वारा संस्थान के वैज्ञानिकों एवं कृषि विभाग अधिकारियों की देख रेख में ही खेती कारवाई जा रही है जोकि भारत को केसर व हींग के उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने की और एक कदम है।

संस्थान के वरिष्ठ प्रधान विज्ञानिक एवं केसर परियोजना के समन्वयक डा. राकेश कुमार ने बताया कि प्रदेश के गैर-पारंपरिक क्षेत्रों संस्थान द्वारा केसर की खेती के प्रयास किया जा रहे हैं। किसानों एवं कृषि अधिकारियों को इसकी खेती के तरीके एवं उन्नत कृषि तकनीक का प्रशिक्षण दिया जा रहा है एवं बीज उपलब्ध किया जा रहा है।

हींग परियोजना के समन्वयक डा. अशोक कुमार ने बताया कि हींग (फेरुला एसाफोईटिडा) मूलत: ईरान व अफगानिस्तान के पहाड़ी इलाकों में जंगली रूप में पाया जाता है।