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    Manimahesh Yatra: 30 साल बाद डल झील से चंबा तक फिर वही तबाही, 10 हजार लोग फंसे हैं यात्रा मार्ग पर, सड़कें व पुल बहे

    Updated: Sat, 30 Aug 2025 02:00 PM (IST)

    Manimahesh Yatra चंबा में 30 साल बाद फिर मणीमहेश यात्रा त्रासदी हुई है। भारी बारिश के कारण चंबा-भरमौर मार्ग पूरी तरह से तबाह हो गया है जिससे डल झील से हड़सर तक का क्षेत्र प्रभावित हुआ है। पांच दिनों से भरमौर में बिजली मोबाइल और इंटरनेट सेवाएं ठप हैं जिससे हजारों श्रद्धालु फंसे हुए हैं।

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    चंबा से भरमौर मार्ग बुरी तरह से क्षतिग्रस्त। जागरण

    सुरेश ठाकुर, चंबा। Manimahesh Yatra, बारिश की बूंदें जब आसमान से बरसती हैं तो पहाड़ों के दिल को चीरकर नदियों में समा जाती हैं, लेकिन कभी-कभी यही बूंदें आशीर्वाद नहीं, बल्कि अभिशाप बनकर प्रलय का मंजर खड़ा कर देती हैं। चंबा व भरमौर क्षेत्र आज ठीक उसी भयावह मंजर का गवाह बन रहा है, जिसने वर्ष 1995 में मणिमहेश यात्रा के दौरान हजारों जिंदगियों को दहला दिया था।

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    उस समय रावी नदी अपने रौद्र रूप में बह निकली थी। जलस्तर इतना बढ़ गया था कि पुराने शीतला पुल के ऊपर से पानी बहने लगा था और पुल को क्षति पहुंची। एक माह तक चंबा-भरमौर मार्ग बंद रहा। श्रद्धालु बेसहारा और संपर्कविहीन होकर पहाड़ों में फंसे रहे। न मोबाइल था, न इंटरनेट सिर्फ अनिश्चितता और भय। लोग अपने परिजनों की सलामती की दुआएं करते रहे और घरों तक पहुंचने में हफ्तों लग गए।

    डल झील से हड़सर तक तबाही, प्रशासन के पास नहीं पुख्ता जानकारी

    आज लगभग 30 साल बाद हालात कुछ अलग नहीं हैं। भारी बारिश ने फिर वही त्रासदी दोहरा दी है। चंबा–भरमौर मार्ग का नामोनिशान मिट चुका है। डल झील से हड़सर तक का इलाका तबाही की चपेट में है, पर प्रशासन के पास अब तक पुख्ता जानकारी नहीं।

    भरमौर पांच दिन से अंधेरे में

    पांच दिन से भरमौर अंधेरे और सन्नाटे में डूबा पड़ा है। न मोबाइल काम कर रहा है, न इंटरनेट, न बिजली। लोग कटे हुए टापुओं में फंसे हैं। प्रशासन के आंकड़े बताते हैं कि अब तक 12 लोगों की मौत हो चुकी है और आठ लोग लापता हैं लेकिन हकीकत इन आंकड़ों से कहीं ज्यादा भयावह है। 11 लोग इस त्रासदी से पहले यात्रा के दौरान जान गंवा चुके हैं। 

    10 हजार से ज्यादा श्रद्धालु भरमौर में फंसे

    हजारों श्रद्धालु भरमौर में कैद हैं, जबकि चंबा शहर में ही 10 हजार से अधिक यात्री फंसे पड़े हैं। उनकी आंखों में वही डर तैर रहा है जो 1995 के श्रद्धालुओं में दिखा था। उस समय रावी की लहरें मौत बनकर दौड़ी थीं, आज फिर वही खतरा मुंह फैलाए खड़ा है। रावी नदी में बाढ़ की स्थिति इस बात का सुबूत है कि यह पहाड़ी नदी बारिश में कितनी विकराल हो जाती है। पैदल यात्रा मार्ग पर रास्ते व पुल बहने से कई लोग फंसे हुए हैं। 

    तैयारियों पर उठ रहे सवाल

    मणिमहेश यात्रा आस्था का पर्व है, परंतु प्रकृति जब रौद्र रूप धारण करती है तो यह आस्था अग्निपरीक्षा बन जाती है। 1995 की त्रासदी अब तक लोगों के दिलों में ताजा है और इस बार की बरसात ने उस घाव को फिर से हरा कर दिया है। सवाल यह है कि क्या हमने इन 30 वर्षों में सबक सीखा। क्या हमारी तैयारियां इस पहाड़ी आपदा से लड़ने के लिए पर्याप्त थीं। आज जब हजारों श्रद्धालु भोजन, दवा और आश्रय के लिए प्रशासन की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रकृति से छेड़छाड़ करने की कीमत हमेशा भारी पड़ती है। मणिमहेश यात्रा का यह दौर फिर साबित कर रहा है कि हिमालय की गोद में बसी रावी और उसके किनारे बसे लोग हर बारिश के साथ मौत से जंग लड़ रहे हैं।