हिमाचल की इस पहाड़ी से भी होते हैं मणिमहेश कैलाश पर्वत के दर्शन! चंबा में ये खास जगह पर्यटकों की बनी पहली पसंद
हर ओर हरियाली ऊंचे-ऊंचे पहाड़ और प्रकृति का एक मनोरम दृश्य। महानगरों के शोर-शराबे और भीड़भाड़ के क्षेत्रों से इतर एक शांत और अलौकिक सुंदरता का प्रमाण देता है चंबा जिला का भरमौर। यह क्षेत्र वन्य प्राणी संरक्षित क्षेत्र है। यहां के मशहूर कार्तिकेय स्वामी मंदिर में रोज दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। कुगति में स्थित केलंग वजीर मंदिर तक पहुंचने के लिए यात्री पैदल यात्रा भी कर सकते हैं।

मिथुन ठाकुर, चंबा। देवभूमि हिमाचल में कई स्थान ऐसे हैं, जो श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। ऐसा ही एक स्थान कुगति जिला चंबा के जनजातीय उपमंडल भरमौर में है।
कुगति वन्य प्राणी संरक्षित क्षेत्र हैं, यहां पर मौजूद भगवान केलंग वजीर (कार्तिकेय स्वामी) श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। भगवान केलंग वजीर भोलेनाथ के ज्येष्ठ पुत्र कार्तिकेय का ही दूसरा नाम है, जिसे देवताओं का सेनापति भी कहा गया है।
हरे-भरे पहाड़ी क्षेत्र से घिरे इस मंदिर में जैसे ही श्रद्धालु पहुंचते हैं तो वे यहां आलौकिक अनुभव प्राप्त करते हैं। मंदिर ऐसे स्थान पर है, जहां से मणिमहेश कैलाश पर्वत के भी दर्शन होते हैं।
भगवान केलंग वजीर की पूजा-अर्चना करते पुजारी
मंदिर मणिमहेश कैलाश पर्वत के पिछली तरफ की पहाड़ी पर स्थित है। मंदिर करीब साढ़े सात माह ही श्रद्धालुओं के लिए खुला रहता है। इस मंदिर के कपाट नवंबर के अंत में बंद कर दिए जाते हैं। मंदिर को अप्रैल में बैसाखी वाले दिन खोला जाता है।
मान्यता है कि इस अंतराल के दौरान देवता स्वर्ग लोक चले जाते हैं। मान्यता यह भी है कि इस स्थान पर कार्तिकेय स्वामी की स्वयंभू मूर्ति प्रकट हुई थी। यह मूर्ति आज भी मंदिर में है। इसके साथ ही एक संगमरमर की मूर्ति एक भक्त द्वारा मंदिर में स्थापित करवाई गई और एक मूर्ति 1972 में मंदिर के पुजारियों ने भी स्थापित करवाई है।
मंदिर के गर्भगृह में गड़वी में पानी भरा मिले तो होती है बारिश
मंदिर के कपाट बंद करने से पहले मंदिर के गर्भगृह में पानी की गड़वी अर्थात कलश रखा जाता है। जब अप्रैल में मंदिर के कपाट खोले जाते हैं तो सर्वप्रथम उस कलश को देखा जाता है।
अगर लोटा पानी से भरा मिले, तो उस वर्ष इलाके में अच्छी बारिश और सुख-समृद्धि होने की उम्मीद रहती है। अगर लोटा आधा या इससे कम मिले तो सूखे की आशंका रहती है।
जिला चंबा के जनजातीय उपमंडल भरमौर के कुगति में स्थित कार्तिक स्वामी मंदिर।
पास ही मौजूद है माता मराली मंदिर
कार्तिकेय स्वामी मंदिर के समीप थोड़ी चढ़ाई चढ़कर माता मराली का मंदिर है। माता मराली को अशोकसुंदरी या मनसा देवी भी कहा जाता है। माता मराली भगवान कार्तिकेय की बहन हैं।
जहां भी भगवान कार्तिकेय का मंदिर होता है, उसके पास माता मराली का मंदिर भी अवश्य होता है। मणिमहेश यात्रा के दौरान भी कई श्रद्धालु यात्रा शुरू करने से पहले केलंग वजीर के मंदिर में माथा टेकते हैं और कुगती होकर मणिमहेश पहुंचते हैं। इसे परिक्रमा करना कहा जाता है।
वन्य जीवों का भी बसेरा
कुगती वन्यजीव अभयारण्य में वन्य जीवों की कई प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें आइबेक्स, तीतर, कस्तूरी मृग, मोनाल, स्नो काक, बुलबुल, सफेद गाल वाली बुलबुल, भूरा भालू आदि शामिल हैं। यहां के ऊंचे पर्वत व खूबसूरत नजारे पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं।
यहां ऐसे पहुंचें
कुगति में स्थित केलंग वजीर मंदिर तक पहुंचने के लिए वाहनों के अलावा पैदल यात्रा भी करनी पड़ती है। सबसे पहले पर्यटकों को पठानकोट आना होगा। इसके बाद चंबा तक बस या टैक्सी से पहुंच सकते हैं।
चंबा से कुगति करीब 88 किलोमीटर दूर है। चंबा से भरमौर की दूरी 62 किलोमीटर और भरमौर से कुगति की दूरी करीब 26 किलोमीटर है। जबकि कुगति से केलंग बजीर मंदिर की दूरी करीब छह किलोमीटर है। यह सफर पूरी तरह पैदल होता है।
यहां ठहर सकते हैं पर्यटक
चंबा जिला में आने वाले पर्यटकों को ठहरने की पर्याप्त व्यवस्थाएं हैं। चंबा शहर व जिले के अन्य स्थानों पर ठहरने के लिए होटल व विश्रामगृह है। यहां पर ऑनलाइन व ऑफलाइन बुकिंग की सुविधा है।
होटल के एक कमरे का किराया एक हजार से तीन हजार रुपये तक रहता है। भरमौर में भी होटल व विश्रामगृह की सुविधा है। चंबा पहुंचने पर लोग ढाबों पर पारंपरिक चंबयाली धाम और भरमौर में देसी राजमाह का स्वाद ले सकते हैं। भरमौर मुख्य बाजार में देसी ढाबों के अलावा पंजाबी ढाबा व चाइनीज खाना उपलब्ध होता है।
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