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    'ऐसा लगा मौत का मंजर हमारी तरफ...', मणिमहेश यात्रियों ने सुनाई आपदा की आपबीती

    Updated: Sat, 30 Aug 2025 08:15 PM (IST)

    जम्मू से चंबा पहुंचे श्रद्धालुओं ने मणिमहेश यात्रा के दौरान हड़सर में फंसे रहने की आपबीती सुनाई। उन्होंने बताया कि कैसे भूस्खलन के कारण वे तीन दिन तक मौत के साए में रहे। कमरे के दोनों तरफ पहाड़ दरक रहे थे और लंगर स्थल भी बह गया। श्रद्धालुओं को प्रशासन से कोई मदद नहीं मिली और भरमौर में भी उन्हें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा।

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    हड़सर में तीन दिन मौत के साए में रहे मणिमहेश यात्री (फोटो: जागरण)

    संवाद सहयोगी, चंबा। 'ऐसा लगा जैसे मौत का मंजर हमारी ओर बढ़ रहा हो… कमरे के दोनों ओर पहाड़ दरक चुके थे और हर पल जान जाने का डर था। बस भोलेनाथ से यही प्रार्थना कर रहे थे हे शिव, रहम कर।'

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    यह आपबीती है जुम्मू के श्रद्धालु नरेश चमन सुनीता व कमल श्रद्धालुओं की, जो मणिमहेश यात्रा के दौरान हड़सर में तीन दिन तक मौत के साए में कैद रहे।

    श्रद्धालुओं ने बताया कि जिस कमरे में वे ठहरे थे, उसके दोनों तरफ भारी भूस्खलन हो गया। चारों ओर गूंजती पहाड़ टूटने की आवाज़ें और बारिश का शोर ऐसा था कि हर पल लगता था, अगला पल शायद आखिरी हो।

    श्रद्धालुओं ने बताया कि उनकी आंखों के सामने लंगर स्थल बह गया। जो जगह श्रद्धालुओं के लिए जीवन का सहारा बनी थी, वह कुछ ही पलों में तेज बहाव में समा गई। लंगर का सामान, तंबू और रसोई सब नदी में बह गया।

    भूख-प्यास से बेहाल श्रद्धालु सिर्फ भगवान शिव से प्रार्थना करते रहे। उनका कहना है कि इस दौरान प्रशासन की ओर से कोई मदद नहीं मिली।

    उपायुक्त एक बार मौके पर पहुंचे तो राहत की उम्मीद जगी। उन्होंने मशीनरी लगवाकर मार्ग खोलने का आदेश दिया। मगर उनके जाने के बाद न कोई अधिकारी लौटा, न पुलिस और न ही कोई कर्मचारी।

    श्रद्धालुओं का दर्द था कि उन्हें प्रकृति के साथ-साथ लापरवाही से भी जूझना पड़ा। हालात से मजबूर होकर जब श्रद्धालु भरमौर पहुंचे, तो यहाँ भी परेशानी ने पीछा नहीं छोड़ा। श्रद्धालुओं ने बताया कि रहने के लिए उन्हें कमरे लेने पड़े और हर श्रद्धालु से कम से कम 150 रुपये वसूले गए।

    कई श्रद्धालु ऐसे थे जिनकी जेबें खाली हो चुकी थीं। मोबाइल नेटवर्क ठप होने से परिवारों से संपर्क टूट गया और हर कोई अपने घरवालों के लिए बेचैन था।

    सबसे बड़ी समस्या यह रही कि भरमौर में केवल एक लंगर ही चल रहा था। श्रद्धालुओं के अनुसार, स्थानीय आपत्तियों के कारण अधिक लंगर नहीं लगाए जा सके।

    ऐसे में हजारों श्रद्धालुओं को पेट भरने के लिए घंटों मशक्कत करनी पड़ी और कई बार भूखा ही सोना पड़ा। हालात इतने बिगड़े कि श्रद्धालुओं को एक दिन प्रशासन के खिलाफ सामूहिक प्रदर्शन करना पड़ा।

    लेकिन जब कोई राहत नहीं मिली, तो मजबूरी में हजारों श्रद्धालु पैदल ही चंबा की ओर निकल पड़े। उन्होंने बताया कि रास्ता इतना खतरनाक था कि हर कदम मौत को मात देने जैसा था।

    जगह-जगह मलबा, दरकते पहाड़ और खतरनाक ढलान देखकर सांसें अटक जाती थीं। फिर भी वे चलते रहे और आखिरकार कलसुईं पहुँचे। यहां पहुंचकर उन्हें कुछ राहत मिली और फिर बसों के माध्यम से चंबा पहुंचाया गया।

    श्रद्धालुओं ने कहा कि वे मणिमहेश के दर्शन तक नहीं पहुँच सके। लेकिन हड़सर से डल झील की ओर के मार्ग से जो भयावह कहानियाँ सुनने को मिलीं, उन्होंने दिल दहला दिया।

    कोई कह रहा था कि कई श्रद्धालु बह गए, तो कोई बता रहा था कि शव ऊपर की ओर पड़े हैं। हालांकि प्रशासन ने इन सूचनाओं को अफवाह बताया, लेकिन श्रद्धालुओं का कहना था कि जो भय और खौफ उन्होंने अपनी आँखों से देखा, वह उम्रभर नहीं भुलाया जा सकेगा।

    एक श्रद्धालु गोपाल ने कहा कि 'हम जिस दिन हड़सर में पहुंचे, उस दिन भारी वर्षा का दौर शुरू हो गया। हालात दयनीय हो गए, ऐसे में हमें हड़सर से ही वापस घर की तरफ लौटना पड़ा। यदि और रुकते तो कोई हादसा हो सकता था।'

    श्रद्धालु बाबू राम ने बताया कि भारी वर्षा के दौरान स्थिति बहुत भयावह हो गई थी। वे जिस कमरे में हड़सर में ठहरे थे, उसके दोनों ओर भूस्खलन हो गया था।

    अन्य श्रद्धालुओं ने भी लौटना शुरू किया। उनके पास पैसे भी खत्म हो गए थे। ऐसे में पूरी तरह से लंगर पर निर्भर हो गए थे। लेकिन, भरमौर मुख्यालय में महज एक ही लंगर लगा था।

    एक अन्य श्रद्धालु कौलाशो देवी बताती हैें कि हड़सर व भरमौर में फंसने के बाद हालात काफी मुश्किल हो गए थे। वे तुरंत घर वापस लौटना चाहते थे। लेकिन, मार्ग में जगह-जगह भूस्खलन होने के कारण करीब छह दिनों तक वहीं फंसे रहे।

    पुष्पा देवी ने कहा 'स्थानीय लोगों की ओर से हमारी काफी मदद की गई। जबकि, प्रशासन की ओर से किसी भी तरह की कोई भी मदद नहीं मिली। इस यात्रा को हम कभी नहीं भूल पाएंगे। प्रशासन शेष बचे हजारों लोगों को जल्द से जल्द सुरक्षित उनके घरों तक पहुंचाए।'

    वंश राणा ने बताया जब आपदा आई तो वे जहां ठहरे थे, वहीं रुक गए। वर्षा नहीं रुकी तथा हालात और भी दयनीय होते चले गए। जब, आसमान से थोड़ी राहत मिली तो उन्होंने घरों को वापस लौटना ही सही समझा। क्योंकि, मणिमहेश मार्ग पर हालात और भी दयनीय हो चुके थे।

    प्रीतम ने कहा 'मणिमहेश यात्रा के दौरान इस बार काफी भयावह मंजर था। खासकर वर्षा व बादल फटने के दौरान हजारों श्रद्धालु भयभीत थे। हम भरमौर से पैदल ही कलसुईं तक पहुंचे, जहां से चंबा तक का सफर बस में किया। इस दौरान पानी तक खरीद कर पीना पड़ा। खाने के लिए महज एक लंगर का आसरा था, क्योंकि पैसे खत्म हो चुके थे।'