हीमोफीलिया रक्तस्राव (ब्लीडिंग) से सबधित एक आनुवशिक रोग है, जिसमें खून के थक्के बनने की प्रक्रिया धीमी हो जाती है। चोट लगने के बाद हीमोफीलिया के रोगियों को अन्य रोगियों की तुलना में अधिक समय तक रक्तस्राव होता रहता है। इसके अलावा उनके शरीर में आतरिक रूप से घुटनों और कोहनियों के अंदर भी रक्तस्राव हो सकता है। यह रक्तस्राव अंगों और ऊतकों को भी नुकसान पहुंचा सकता है। यह स्थिति जीवन के लिए घातक हो सकती है।'' यह कहना है डॉ. सेसिल रॉस का, जो 'हीमोफीलिया फेडरेशन इंडिया' के वाइस प्रेसीडेंट (मेडिकल) हैं।

अब यह रोग अभिशाप का पर्याय नहीं है। आज हीमोफीलिया से पीड़ित रोगी लगभग सामान्य उम्र तक जी सकते हैं। हालाकि अभी तक इस रोग का सपूर्ण उपचार हमसे दूर है, लेकिन आधुनिक चिकित्सा विज्ञान हीमोफीलिया के प्रबधन और इसके प्रभावी उपचार में काफी सहायक सिद्ध हुआ है।

प्रकार

हीमोफीलिया दो प्रकार का होता है। हीमोफीलिया ए और हीमोफीलिया बी। हीमोफीलिया ए में 'फैक्टर 8' की कमी होती है। दूसरी ओर फैक्टर के शून्य या बहुत कम होने से हीमोफीलिया बी होता है। सहज शब्दों में कहें, तो रक्त का थक्का (क्लॉट) जमाने के लिए आवश्यक तत्व को फैक्टर कहा जाता है।

लगभग 80 प्रतिशत हीमोफीलिया रोगी, हीमोफीलिया ए से पीड़ित होते हैं। हीमोफीलिया के कम गंभीर मामलों में पीड़ित को कभी-कभी रक्तस्राव होता है जबकि इस रोग के गभीर मामलों में अचानक व लगातार रक्तस्राव हो सकता है।

आनुवशिक कारण

लिग-निर्धारण(बच्चा या बच्ची) के लिए महिलाओं में एक ही प्रकार के दो गुणसूत्र (क्रोमोसोम्स) होते हैं जबकि पुरुषों में भी दो अलग-अलग क्रोमोसोम्स होते हैं। शिशु को गुणसूत्र के जोड़े का आधा भाग मा से और आधा पिता से मिलता है। इन गुणसूत्रों का जोड़ा किसी भी बच्चे का लिग निर्धारित करता है। इस सदर्भ में डॉ. सेसिल रॉस कहते हैं, ''गुणसूत्र में ही हीमोफीलिया पैदा करने वाले जीन्स होते हैं। अधिकतर मामलों में महिलाओं की तुलना में पुरुष ही हीमोफीलिया से कहींज्यादा ग्रस्त होते हैं। वहीं महिलाएं इस रोग की वाहक होती हैं। वे अपने बच्चों में हीमोफीलिया का प्रसार कर सकती हैं।''

उपचार

नई दिल्ली स्थित 'एम्स' में हीमैटोलॉजी विभाग की प्रमुख डॉ. रेणु सक्सेना के अनुसार हीमोफीलिया का प्राथमिक उपचार रिप्लेसमेंट थैरेपी है। इस थेरैपी के अंतर्गत जिस फैक्टर की कमी होती है, उसे रिप्लेस या उसकी भरपाई की जाती है। हीमोफीलिया के प्रकार के आधार पर फैक्टर को पूरा किया जाता है। थक्का जमाने वाले क्लॉटिंग फैक्टर्स का उपचार दवाओं से किया जाता है। इन दिनों उपलब्ध सर्वो8म उपचार 'एंटी हीमोफीलिक फैक्टर' है, जिसे 'एएचएफ' कहा जाता है।

लक्षण

हीमोफीलिया के लक्षण चोट लगने के बाद दिखायी देते हैं। फिर भी इन लक्षणों पर ध्यान देना जरूरी है

-किसी चोट या शारीरिक आघात के बाद अत्यधिक रक्त निकलना।

-सामान्यत: बार-बार नाक से खून बहना।

-किसी भी सर्जरी के बाद अत्यधिक रक्तस्राव होना।

-दात निकालने के बाद अत्यधिक रक्तस्राव।

-जोड़ों व मासपेशियों में अंदरूनी रक्तस्राव होने से जोड़ों में दर्द होना।

अगर किसी व्यक्ति में उपर्युक्त लक्षण प्रकट होते हैं, तो इस स्थिति में चिकित्सक रोगी को सी.बी.सी. (कम्पलीट ब्लड काउंट) आदि जाचें कराने की सलाह देते हैं।

भारत की स्थिति

नई दिल्ली स्थित मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज में क्लीनिकल हीमैटोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. नरेश गुप्ता के अनुसार देश में लगभग 1 लाख लोग हीमोफीलिया से पीड़ित हैं। इनमें से 50,000 को गभीर रोगियों की श्रेणी में रखा जा सकता है। लगभग 13000 पजीकृत रोगी हैं। तमाम रोगी हीमोफीलिया के समुचित उपचार से वचित हैं। देश में हीमोफीलिया के उपचार की समुचित प्रक्रिया विलब से शुरू हुई, लेकिन इस स्थिति में अब सुधार हुआ है। सुधार की इस प्रक्रिया में अन्य राज्यों की तुलना में दिल्ली राज्य आगे है।'

हीमोफीलिया के उपचार के मामले में विकसित और विकासशील देशों के बीच काफी बड़ा फर्क है। भारत में सबसे बड़ा मुद्दा ग्रामीण क्षेत्र की जनता के अलावा शहरों के शिक्षित वर्ग के लोगों में भी हीमोफीलिया के मामले में जागरूकता का अभाव है।

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